बी के झा
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‘ नई दिल्ली, 4 अगस्त
संसद के मानसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों के अल्प समय में पारित होने को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिन विधेयकों का देश की शिक्षा व्यवस्था, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है, उन्हें पर्याप्त चर्चा के बिना ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
उन्होंने दावा किया कि संसद केवल कानून बनाने की औपचारिक संस्था नहीं है, बल्कि सरकार से जवाबदेही तय कराने और विभिन्न पक्षों की राय सुनने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। ऐसे में यदि महत्वपूर्ण विधेयकों पर गंभीर बहस ही नहीं होगी तो संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होगी।
सार्वजनिक परीक्षा संशोधन विधेयक पर सरकार को घेरा
प्रियंका चतुर्वेदी ने सबसे पहले सार्वजनिक परीक्षा (संशोधन) विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार इसे संगठित पेपर लीक गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का कानून बता रही है। विधेयक में दोषियों के लिए 10 वर्ष तक के कारावास और संस्थागत अपराधों पर 10 करोड़ रुपये तक के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है।हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून समस्या की जड़ों तक नहीं पहुंचता। उनके अनुसार विपक्ष की प्रमुख आपत्ति यह है कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था स्पष्ट नहीं दिखाई देती।
उन्होंने यह भी कहा कि पेपर लीक से प्रभावित लाखों अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा, मुआवजे अथवा पुनर्परीक्षा की स्पष्ट व्यवस्था विधेयक में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं होती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों ने युवाओं के बीच व्यापक असंतोष पैदा किया है। ऐसे में सरकार के लिए केवल कठोर दंड का प्रावधान पर्याप्त होगा या संस्थागत सुधार भी आवश्यक होंगे, इस पर बहस आगे भी जारी रह सकती है।
‘वंदे मातरम्’ संशोधन विधेयक पर वैचारिक बहस
प्रियंका चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 को भी विवाद का विषय बताया। उनके अनुसार संशोधन के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के समान विशेष कानूनी संरक्षण देने तथा इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने या अपमान करने पर तीन वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया है।उन्होंने कहा कि विपक्ष के कई दलों ने इस विधेयक पर संवैधानिक और वैचारिक प्रश्न उठाए।
विपक्ष का तर्क है कि देशभक्ति की भावना स्वैच्छिक होनी चाहिए और उसे दंडात्मक कानून के माध्यम से लागू करने का प्रयास लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। कुछ दलों ने धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत की भाषाई-सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में भी अपनी चिंताएं व्यक्त कीं।
दूसरी ओर सरकार का पक्ष रहा है कि राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय सम्मान के संरक्षण के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान आवश्यक हैं तथा यह कानून राष्ट्रीय एकता और सम्मान को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन पर भी उठे सवाल
प्रियंका चतुर्वेदी ने जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि नए प्रावधानों के अनुसार यदि जन्म या मृत्यु की सूचना दो वर्षों के भीतर दर्ज नहीं कराई जाती है तो अब संबंधित व्यक्ति को स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी से आदेश प्राप्त करना होगा।उनका आरोप है कि इससे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा दूरदराज के नागरिकों के लिए प्रक्रिया अधिक जटिल, समयसाध्य और खर्चीली हो सकती है।
उन्होंने यह आशंका भी जताई कि इससे पहले से लंबित मामलों से जूझ रही न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि पंजीकरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रमाणिक और दुरुपयोग से मुक्त बनाने के उद्देश्य से यह संशोधन किया गया है।’
तीन मिनट में बिल, बहस का अवसर नहीं’
प्रियंका चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक को अत्यंत कम समय में ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष को अपनी आपत्तियां विस्तार से रखने और विधेयक की धाराओं पर सार्थक चर्चा करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।उन्होंने इसे संसदीय परंपराओं के लिए चिंताजनक बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में कानून बनाने की प्रक्रिया केवल संख्या बल का प्रश्न नहीं, बल्कि संवाद, विमर्श और जवाबदेही का विषय भी है।
सरकार का पक्ष
संसदीय कार्यमंत्री और सरकार पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि विपक्ष के लगातार हंगामे और सदन की कार्यवाही बाधित होने के बावजूद महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को पूरा करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। सरकार का कहना है कि सभी विधेयक संसदीय नियमों के अनुरूप प्रस्तुत और पारित किए गए तथा राष्ट्रीय हित में आवश्यक सुधारों को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखा जा सकता।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: क्या संसद में बहस का घटता दायरा लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संसद केवल विधेयकों को पारित करने का मंच नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श का सर्वोच्च संस्थान है। उनका मानना है कि यदि महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तृत चर्चा का अवसर सीमित होता है, तो विपक्ष की भूमिका कमजोर पड़ने के साथ-साथ जनता के विभिन्न वर्गों की चिंताओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता।
विश्लेषकों के अनुसार संसद में बहस जितनी व्यापक होगी, कानून उतने ही अधिक परिपक्व, व्यावहारिक और न्यायसंगत बनेंगे। उनका कहना है कि सरकार के पास बहुमत होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन बहुमत के साथ संवाद, सहमति और विपक्ष की बात सुनना भी संसदीय परंपरा की मूल भावना है।
दूसरी ओर, उनका यह भी कहना है कि यदि विपक्ष लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही बाधित करता है, तो सरकार पर विधायी कार्य आगे बढ़ाने का दबाव भी रहता है। ऐसे में दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि संसद को संवाद का मंच बनाए रखें।
कानूनविदों का दृष्टिकोण: कानून केवल पारित होना पर्याप्त नहीं, न्यायिक कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए
संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन प्रत्येक कानून संविधान की मूल भावना, मौलिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए।
कानूनविदों के अनुसार यदि किसी विधेयक पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता के अधिकार अथवा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न उठते हैं, तो उन पर संसद में गंभीर और विस्तृत चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूत बनाती है। उनका कहना है कि बहस से कानून की संभावित कमियां सामने आती हैं और आवश्यक संशोधन का अवसर मिलता है, जिससे भविष्य में न्यायालयों में कानूनी विवादों की संभावना भी कम होती है।
संसदीय विशेषज्ञों की टिप्पणी
संसदीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारतीय संसद का इतिहास बताता है कि कई ऐतिहासिक कानून लंबी और गंभीर बहस के बाद बने हैं। उनके अनुसार विधेयकों को शीघ्र पारित करना कभी-कभी प्रशासनिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन व्यापक जनहित से जुड़े कानूनों पर पर्याप्त चर्चा लोकतंत्र की गुणवत्ता को मजबूत करती है।विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की यह समान जिम्मेदारी है कि संसद को टकराव का नहीं, बल्कि विचार-विमर्श और नीति निर्माण का प्रभावी मंच बनाए रखें।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संख्या बल में नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और जवाबदेही की संस्कृति में निहित है।
आगे और तेज हो सकता है टकराव
प्रियंका चतुर्वेदी ने संकेत दिया कि आगामी दिनों में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, परिसीमन और अन्य महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो सकता है। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर सरकार से जवाबदेही मांगने की लड़ाई जारी रहेगी और वह प्रमुख विधायी घटनाक्रम पर लगातार अपनी आवाज उठाती रहेंगी।
लोकतंत्र की कसौटी पर संसद
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र की मजबूती केवल कानून बनने से नहीं, बल्कि उस कानून पर हुई सार्थक बहस, विपक्ष की भागीदारी और संसदीय विमर्श की गुणवत्ता से भी मापी जाती है। मानसून सत्र के दौरान विधेयकों को लेकर उठा यह विवाद एक बार फिर इस प्रश्न को केंद्र में ले आया है कि तेजी से कानून पारित करने और व्यापक संसदीय चर्चा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
आने वाले दिनों में यही मुद्दा संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
