ट्रंप क्यों झुके? भारत–EU–UK की ट्रेड शतरंज और अमेरिका की मजबूरी —एक राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषण

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 4 फरवरी

पिछले एक वर्ष में भारत की विदेश व्यापार नीति में जो बदलाव दिखा है, वह सिर्फ आर्थिक रणनीति नहीं बल्कि एक सुविचारित भू-राजनीतिक पुनर्संयोजन (geopolitical realignment) है। दशकों तक ठंडे बस्ते में पड़े मुक्त व्यापार समझौते (FTA) अचानक गति पकड़ते हैं, और उसी क्रम में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका को भी अपना रुख नरम करना पड़ता है—

यह संयोग नहीं, रणनीति है।

ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और अंततः अमेरिका—तीनों के साथ समानांतर संवाद ने भारत को उस स्थिति में ला खड़ा किया है जहां वह “ट्रेड टेकर” नहीं बल्कि “ट्रेड शेपर” के रूप में उभरता दिख रहा है।

1. ट्रंप कैसे राज़ी हुए: दबाव नहीं, विकल्पों की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए तैयार होना किसी एक कूटनीतिक जीत का परिणाम नहीं, बल्कि भारत द्वारा बनाए गए विकल्पों के जाल का नतीजा है।अमेरिका ने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर 25% सेकेंडरी टैरिफ का दबाव बनाया। इसके साथ ही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे दावों ने रिश्तों में तल्खी भी पैदा की। एक समय ऐसा लगा कि ट्रेड डील अधर में लटक सकती है।लेकिन यहीं भारत ने अपनी असली ताकत दिखाई।पीएम मोदी और ट्रंप का सीधा संवाद पीयूष गोयल और एस. जयशंकर की निरंतर बैक-चैनल डिप्लोमेसीऔर कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, सर्जियो गोर जैसे मध्यस्थों की भूमिका इन सबने मिलकर यह संकेत दिया कि भारत अमेरिका पर निर्भर नहीं, बल्कि उसके पास यूरोप और ब्रिटेन जैसे ठोस विकल्प मौजूद हैं।

एक वरिष्ठ रणनीतिक मामलों के विद्वान के शब्दों में,“

अमेरिका ने भारत को नहीं झुकाया, बल्कि भारत ने अमेरिका के लिए ‘ना झुक पाने’ की लागत बढ़ा दी।

”2. भारत–EU समझौता: 18 साल बाद पिघला

ब्रुसेल्स यूरोपीय संघ, जो अब तक पर्यावरण मानकों, श्रम कानूनों और IPR पर कठोर रुख अपनाए हुए था, अचानक लचीला क्यों हुआ?

उत्तर साफ है—अमेरिका की सक्रियता।जैसे ही वाशिंगटन ने भारत के साथ ट्रेड डील की दिशा में कदम बढ़ाए, ब्रुसेल्स को यह डर सताने लगा कि यदि भारत-अमेरिका व्यापार गहराया, तो यूरोपीय कंपनियां एशियाई बाजार में पिछड़ जाएंगी। परिणामस्वरूप, 27 जनवरी को 18 वर्षों से अटका भारत-EU FTA आखिरकार आगे बढ़ा।एक यूरोपीय व्यापार विशेषज्ञ ने इसे “डिफेंसिव डिप्लोमेसी” करार दिया—यानी भारत को पाने से ज्यादा, अमेरिका से हार न मानने की कोशिश।

3. WTO की कमजोरी और भारत की नई राह

शिक्षाविद और अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को WTO के पतन की स्वीकृति के रूप में देखते हैं।विश्व व्यापार संगठन की अपीलीय संस्था लगभग निष्क्रिय है। बहुपक्षीय सुधार की उम्मीद धुंधली हो चुकी है। ऐसे में भारत ने साफ संदेश दिया—“अगर नियम वैश्विक स्तर पर नहीं बन सकते, तो हम उन्हें द्विपक्षीय स्तर पर तय करेंगे।”न्यूजीलैंड, इज़राइल, मर्कोसुर जैसे ब्लॉक्स के साथ बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा है। यह मल्टी-एलायनमेंट नहीं, बल्कि मल्टी-ऑप्शन की नीति है।

4. समझौतों की असली आत्मा: सिर्फ टैरिफ नहीं

ये समझौते पुराने जमाने के FTA नहीं हैं। इनके केंद्र में हैं—सेवाएं और डिजिटल व्यापार बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR)MSME और स्टार्ट-अप्सश्रम मानक और सस्टेनेबिलिटीग्रीन सप्लाई चेनआज भारत का लगभग दो-तिहाई निर्यात FTAs के दायरे में आ चुका है और आधा आयात इन्हीं समझौतों से नियंत्रित हो रहा है। कृषि, ऑटोमोबाइल, वाइन-स्पिरिट्स जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी नए रास्ते खुले हैं।एक आर्थिक शिक्षाविद के अनुसार,“भारत पहली बार व्यापार को केवल राजस्व का नहीं, बल्कि औद्योगिक नीति का औजार बना रहा है।

”5. विपक्ष की प्रतिक्रिया: आशंका और अवसर की बहस

विपक्षी दलों ने इस नीति पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है।कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई कि कृषि और छोटे उद्योगों पर विदेशी प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ेगा।

वामपंथी दलों ने श्रम मानकों और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठाए।वहीं कुछ क्षेत्रीय दलों ने इसे राज्यों के निर्यात हितों के लिए सकारात्मक कदम बताया।

हालांकि, कानूनविदों का कहना है कि इस बार के समझौतों में सेफगार्ड क्लॉज पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हैं, जिससे घरेलू उद्योगों को अचानक झटके से बचाया जा सकता है।

6. भविष्य की तस्वीर: बराबरी की मेज पर भारत वाशिंगटन

स्थित भारतीय दूतावास और वाणिज्य मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत—ऊर्जा सुरक्षा (रूसी तेल) पर समझौता नहीं करेगा लेकिन वैश्विक व्यापार में अलग-थलग भी नहीं रहेगा यह नीति न तो गुटनिरपेक्षता है, न ही किसी खेमे में झुकाव—

यह आत्मविश्वासी यथार्थवाद है।

निष्कर्ष

भारत-EU-UK और अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापारिक समझौते यह दिखाते हैं कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनुयायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक खिलाड़ी बन चुका है।ट्रंप का झुकना किसी व्यक्तिगत रसायन का नहीं, बल्कि इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है कि 21वीं सदी की सप्लाई चेन भारत के बिना पूरी नहीं हो सकती।

और यही वह बिंदु है, जहां मेक इन इंडिया एक नारा नहीं, बल्कि वैश्विक यथार्थ बनता दिख रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *