संसद परिसर में ‘चंदा’ को लेकर विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन: पुजारी के वेश में पहुंचे पप्पू यादव, राजनीतिक संग्राम तेज; सत्ता पक्ष ने बताया ‘धार्मिक भावनाओं का अपमान’,लोकसभा अध्यक्ष ने संसद की गरिमा बनाए रखने की दी कड़ी चेतावनी

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 31 जुलाई

संसद के मानसून सत्र के बीच शुक्रवार को संसद परिसर एक बार फिर तीखे राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया। ‘चंदा’ से जुड़े मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने मकर द्वार के बाहर अनोखे अंदाज में विरोध-प्रदर्शन किया। इस दौरान निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पुजारी के वेश में भगवा वस्त्र धारण कर पहुंचे और सांकेतिक नाटक के माध्यम से विरोध दर्ज कराया। इस घटनाक्रम ने संसद से लेकर देश की राजनीति तक नई बहस छेड़ दी।विपक्षी सांसदों ने पहले नारेबाजी की और फिर प्रतीकात्मक रूप से एक दानपात्र रखा, जिसमें कई सांसदों ने सांकेतिक तौर पर धनराशि डाली। प्रदर्शन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव तथा अन्य विपक्षी सांसद मौजूद रहे।

पुजारी के वेश में पहुंचे पप्पू यादव

प्रदर्शन के दौरान पप्पू यादव भगवा वस्त्र पहनकर, हाथ में भगवान श्रीराम का चित्र लेकर दानपात्र के पास बैठ गए। विपक्षी सांसदों ने इसे एक सांकेतिक राजनीतिक प्रस्तुति के रूप में पेश किया। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने दानपात्र में प्रतीकात्मक रूप से राशि डालने का प्रयास किया, जिसके बाद पप्पू यादव ने नाटकीय अंदाज में उस राशि को अपनी जेब में रखने का अभिनय किया।इसके बाद समाजवादी पार्टी के सांसद और अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद भी वहां पहुंचे।

पप्पू यादव ने उन्हें श्रीराम का चित्र दिखाया और उनके चरण स्पर्श किए। कुछ देर बाद अन्य सांसदों ने कथित रूप से दानपात्र से धन वापस लेने का सांकेतिक अभिनय किया और पप्पू यादव दानपात्र लेकर भागने का नाटक करते दिखाई दिए।

लोकसभा अध्यक्ष ने जताई कड़ी नाराजगी

प्रदर्शन के बाद जब पप्पू यादव उसी वेशभूषा में लोकसभा पहुंचे तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बिना किसी सदस्य का नाम लिए कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि संसद की गरिमा और पवित्रता हर सदस्य की जिम्मेदारी है तथा वेश बदलकर सदन में आने जैसी घटनाएं संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं।

उन्होंने संकेत दिया कि यदि ऐसी घटनाएं दोहराई गईं तो नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

सूत्रों के अनुसार, लोकसभा सचिवालय ने भी इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया है और संसद परिसर में विरोध-प्रदर्शनों को लेकर नियमों के कड़ाई से पालन पर विचार किया जा रहा है।

बीजेपी का हमला

भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रदर्शन की कड़ी आलोचना की। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाया कि पुजारी का वेश धारण कर इस प्रकार का प्रदर्शन हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध के लिए धार्मिक प्रतीकों और संत परंपरा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

विश्व हिंदू परिषद का विरोध

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने भी प्रदर्शन पर आपत्ति जताते हुए इसे संत समाज और धार्मिक परंपराओं के सम्मान के प्रतिकूल बताया। संगठन ने घोषणा की कि वह इस मुद्दे पर शनिवार को जंतर-मंतर पर ‘सद्बुद्धि हवन’ आयोजित करेगा।

वीएचपी का कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन धार्मिक वेशभूषा और प्रतीकों का राजनीतिक मंचन उचित नहीं माना जा सकता।

वरिष्ठ धर्माचार्य की प्रतिक्रिया

अयोध्या के एक वरिष्ठ धर्माचार्य ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि किसी धार्मिक वेशभूषा या प्रतीक का उपयोग राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाता है, तो इससे अनेक श्रद्धालुओं की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि लोकतांत्रिक विरोध के दौरान धार्मिक प्रतीकों के उपयोग से बचें और संसद की गरिमा तथा सामाजिक सौहार्द का ध्यान रखें।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय राजनीति में प्रतीकों, वेशभूषा और सांकेतिक प्रदर्शनों का उपयोग नया नहीं है। हालांकि संसद परिसर जैसी संवेदनशील जगह पर ऐसे प्रदर्शनों से राजनीतिक संदेश तो जाता है, लेकिन साथ ही संसदीय मर्यादा और राजनीतिक संवाद की शैली पर भी सवाल उठते हैं। उनके अनुसार आने वाले दिनों में यह मुद्दा सत्ता और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक बहस का कारण बन सकता है।

कानूनविदों की टिप्पणी

संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि सांसदों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन संसद परिसर के भीतर लागू नियमों और संसदीय आचरण संहिता का पालन भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी प्रदर्शन से संसद की कार्यवाही या गरिमा प्रभावित होती है, तो लोकसभा सचिवालय और पीठासीन अधिकारी नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के लिए अधिकृत हैं।

संपादकीय दृष्टि

भारतीय संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहां सत्ता और विपक्ष के बीच तीखा मतभेद स्वाभाविक है। किंतु राजनीतिक संघर्ष की अभिव्यक्ति ऐसी होनी चाहिए जो लोकतांत्रिक गरिमा, संसदीय परंपराओं और सभी समुदायों की धार्मिक संवेदनाओं का सम्मान बनाए रखे। विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन उसकी मर्यादा ही उसकी सबसे बड़ी विश्वसनीयता भी है।

संसद जितनी बहस की जगह है, उतनी ही वह संयम, शिष्टाचार और संवैधानिक मूल्यों का भी प्रतीक है।

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