बी के झा
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‘ नई दिल्ली, 31 जुलाई
देश में संवैधानिक आयोगों की शक्तियों और उनकी संवैधानिक सीमाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) का दायित्व शिकायतों की जांच करना, तथ्य जुटाना और सरकार को सिफारिशें देना है, लेकिन वह किसी अदालत या न्यायाधिकरण की तरह बाध्यकारी आदेश पारित नहीं कर सकता।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि संविधान ने आयोग को सामाजिक न्याय और संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व अवश्य सौंपा है, किंतु उसे न्यायिक अधिकार प्रदान नहीं किए हैं। इसलिए आयोग का कार्य सलाह देना और सरकार का ध्यान अधिकारों के उल्लंघन की ओर आकर्षित करना है, न कि किसी विवाद का अंतिम न्यायिक निपटारा करना।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आयोग संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत स्थापित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों के अधिकारों की रक्षा और उनके हितों की निगरानी करना है। हालांकि, संविधान ने आयोग को किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार के विरुद्ध बाध्यकारी आदेश जारी करने अथवा न्यायिक निर्णय देने का अधिकार नहीं दिया है।
अदालत ने कहा कि आयोग अपनी जांच के आधार पर राज्य सरकार या केंद्र सरकार को आवश्यक कार्रवाई के लिए सिफारिश कर सकता है, लेकिन उसका निर्णय किसी न्यायालय के आदेश की तरह लागू नहीं माना जा सकता।जांच कर सकता है, सबूत मांग सकता है, लेकिन फैसला नहीं सुना सकता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग को शिकायतों की जांच करने, दस्तावेज तलब करने, गवाहों के बयान दर्ज करने और तथ्यों का परीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है। किंतु इन शक्तियों का उद्देश्य केवल वास्तविक स्थिति का आकलन करना है। आयोग इन साक्ष्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर संबंधित सरकार को कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है, लेकिन वह किसी पक्ष के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता।
आयोग की दलील नहीं मानी
सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से यह तर्क दिया गया कि संविधान में प्रयुक्त “सुरक्षा” (Safeguards) शब्द का अर्थ अधिकारों को लागू कराना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि संविधान की भाषा स्पष्ट है और उसमें आयोग को न्यायिक अधिकार देने का कोई संकेत नहीं मिलता। आयोग का दायित्व संरक्षण, निगरानी और अनुशंसा तक सीमित है।
अन्य आयोगों पर भी पड़ सकता है असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का प्रभाव केवल राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तक सीमित नहीं रहेगा। महिलाओं, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों तथा अन्य संवैधानिक एवं वैधानिक आयोगों की शक्तियों की व्याख्या करते समय भी यह फैसला एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत (Precedent) बन सकता है। इससे यह सिद्धांत और स्पष्ट होगा कि ऐसे आयोगों की भूमिका मुख्यतः जांच, निगरानी और सिफारिश तक सीमित है, जब तक कि संबंधित कानून उन्हें विशेष न्यायिक अधिकार न प्रदान करे।
कानूनविदों की राय
संवैधानिक कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के माध्यम से आयोगों और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र के बीच स्पष्ट रेखा खींच दी है। उनके अनुसार यह फैसला “संवैधानिक संस्थाओं के संतुलन” (Institutional Balance) के सिद्धांत को मजबूत करता है। आयोग नागरिकों की शिकायतों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे, लेकिन अंतिम और बाध्यकारी निर्णय देने का अधिकार न्यायालयों और विधि द्वारा स्थापित न्यायाधिकरणों के पास ही रहेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में आयोगों और सरकारों के बीच अधिकारों को लेकर होने वाले विवादों को कम करेगा। इससे यह भी स्पष्ट संदेश गया है कि संवैधानिक संस्थाएं अपने-अपने निर्धारित दायरे में कार्य करेंगी और कोई भी संस्था दूसरे के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर सकती।
शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
संविधान और विधि के अध्येताओं ने कहा कि यह फैसला छात्रों और नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में सहायता मिलेगी कि लोकतंत्र में प्रत्येक संवैधानिक संस्था की भूमिका अलग-अलग और सीमित होती है। शक्तियों का यह पृथक्करण ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता है।
समाजसेवी संगठनों का मत
सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्यरत कई संगठनों ने कहा कि आयोगों की प्रभावशीलता केवल आदेश देने की शक्ति से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, विश्वसनीय रिपोर्ट और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने से भी बढ़ती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकारें आयोगों की सिफारिशों को गंभीरता से लागू करेंगी।
संपादकीय दृष्टि
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है कि प्रत्येक संवैधानिक संस्था की अपनी-अपनी सीमाएं और जिम्मेदारियां हैं। आयोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे समाज के वंचित वर्गों की आवाज सरकार तक पहुंचाते हैं, तथ्यों की जांच करते हैं और सुधारात्मक उपाय सुझाते हैं। वहीं न्यायालयों की भूमिका अंतिम न्यायिक निर्णय देना है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती उनकी सीमाओं के सम्मान में भी निहित है।
जब प्रत्येक संस्था अपने निर्धारित अधिकार क्षेत्र में कार्य करती है, तभी संविधान की मूल भावना—न्याय, समानता और विधि का शासन—और अधिक सुदृढ़ होती है।
