बिहार पंचायत परिसीमन का नया खाका: 50 फीसदी से अधिक SC-ST और OBC आबादी वाले क्षेत्रों में सामाजिक प्रतिनिधित्व के आधार पर तय होगा पंचायत मुख्यालय, 7000 आबादी पर नई पंचायतों की संभावना

बी के झा

NSK news Ind

पटना/बेतिया, 4 अगस्त

बिहार में आगामी पंचायत चुनावों से पहले गांवों की राजनीतिक और प्रशासनिक तस्वीर बदलने की तैयारी शुरू हो गई है। पंचायतों के नए परिसीमन को लेकर राज्य में प्रक्रिया तेज हो गई है। इस बार पंचायतों की सीमाएं केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि वर्ष 2011 की जनगणना, राजस्व गांवों की संरचना, भौगोलिक स्थिति और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर तय की जाएंगी।पंचायत परिसीमन की यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में ग्रामीण सत्ता के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि नई पंचायत सीमाओं के साथ न केवल मुख्यालय बदल सकते हैं, बल्कि कई क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप भी बदलने की संभावना है।

राजस्व गांव और 2011 की जनगणना होंगे आधार

पंचायतों के पुनर्गठन में राजस्व गांवों को मुख्य इकाई माना जाएगा। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार किसी भी गांव को अनावश्यक रूप से विभाजित नहीं किया जाएगा। केवल विशेष परिस्थितियों और प्रशासनिक आवश्यकता होने पर ही सीमाओं में बदलाव किया जाएगा।सीमा निर्धारण के दौरान नदी, नहर, रेलवे लाइन, प्रमुख सड़क, सरकारी संस्थान और अन्य स्थायी पहचान वाले स्थलों को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि भविष्य में पंचायत सीमाओं को लेकर विवाद कम हों।प्रशासन का मानना है कि स्पष्ट भौगोलिक सीमाएं होने से ग्रामीणों को प्रमाण पत्र, विकास योजनाओं और सरकारी सेवाओं से जुड़े कार्यों में सुविधा मिलेगी।

सामाजिक समीकरण के आधार पर पंचायत मुख्यालय का नया नियम

नए परिसीमन में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव पंचायत मुख्यालय के चयन को लेकर माना जा रहा है।सामान्य स्थिति में जिस गांव की आबादी पंचायत क्षेत्र में सबसे अधिक होगी, उसी गांव के नाम पर पंचायत का नाम और मुख्यालय तय किया जाएगा।लेकिन यदि किसी पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग की संयुक्त आबादी 50 प्रतिशत से अधिक होगी, तो पंचायत मुख्यालय के चयन में उस सामाजिक समूह की सर्वाधिक आबादी वाले गांव को प्राथमिकता दी जाएगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह व्यवस्था ग्रामीण प्रशासन में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। हालांकि, इसके प्रभाव को लेकर आने वाले समय में राजनीतिक बहस भी देखने को मिल सकती है।

7000 आबादी पर बन सकती है नई पंचायत

गोपालगंज समेत कई जिलों में पंचायत परिसीमन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार नई पंचायतों के गठन में न्यूनतम सात हजार आबादी को एक संभावित मानक बनाया जा सकता है।यदि दो राजस्व गांवों की संयुक्त आबादी सात हजार या उससे अधिक होती है, तो उन्हें मिलाकर नई पंचायत बनाने की संभावना रहेगी।हालांकि एक राजस्व गांव को दो अलग-अलग पंचायतों में बांटने की अनुमति नहीं होगी।

पूरा राजस्व गांव एक ही पंचायत का हिस्सा रहेगा।इस व्यवस्था का उद्देश्य पंचायतों को प्रशासनिक रूप से अधिक सक्षम और जनसंख्या के लिहाज से संतुलित बनाना है।

बढ़ सकती है पंचायतों की संख्या

गोपालगंज जिले में वर्तमान में 230 ग्राम पंचायतों के मुख्यालयों का निर्धारण किया जा चुका है। प्रशासन ने पंचायतों की मैपिंग कर मुख्यालय चिन्हित कर दिए हैं।जिले में कुल 1538 राजस्व गांव हैं। परिसीमन के बाद जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के आधार पर कई पंचायतों का क्षेत्र बढ़ या घट सकता है। संभावना जताई जा रही है कि जिले में पंचायतों की संख्या में 25 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।

वहीं बेतिया जिले में भी पंचायतों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है।

राजनीतिक असर: बदलेंगे गांवों के समीकरण?

ग्रामीण राजनीति के जानकारों का कहना है कि पंचायत परिसीमन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसका सीधा प्रभाव स्थानीय राजनीति पर पड़ता है।नई पंचायतों के गठन से कई क्षेत्रों में मुखिया, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद की चुनावी रणनीतियां बदल सकती हैं। नए सामाजिक समीकरणों के कारण पुराने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्रों में भी बदलाव की संभावना रहती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायत चुनावों में जातीय और सामाजिक समीकरणों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में आबादी आधारित नए परिसीमन से कई क्षेत्रों में नए नेतृत्व को अवसर मिल सकता है।

शिक्षाविदों और सामाजिक विशेषज्ञों की राय

ग्रामीण विकास विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायतों की सफलता केवल सीमाओं के निर्धारण से नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता, वित्तीय अधिकार और स्थानीय भागीदारी से तय होगी।उनके अनुसार यदि नई पंचायतें जनसंख्या और क्षेत्रफल के संतुलन के आधार पर बनाई जाती हैं तो विकास योजनाओं की निगरानी बेहतर हो सकती है और ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच मजबूत हो सकती है।सामाजिक संगठनों का कहना है कि परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थानीय लोगों की राय को महत्व देना आवश्यक है, ताकि किसी भी वर्ग में उपेक्षा की भावना पैदा न हो।

अधिकारियों का पक्ष

गोपालगंज के जिला पंचायत राज पदाधिकारी धर्मेंद्र कुमार के अनुसार राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश के तहत पंचायतों की मैपिंग कराकर मुख्यालयों का निर्धारण कर दिया गया है। आगे की कार्रवाई आयोग की विस्तृत गाइडलाइन मिलने के बाद शुरू होगी।नए परिसीमन से गांवों की नई राजनीतिक तस्वीरबिहार में पंचायत परिसीमन आने वाले पंचायत चुनावों से पहले ग्रामीण सत्ता के ढांचे में बड़ा बदलाव ला सकता है। आबादी, सामाजिक संरचना और भौगोलिक संतुलन के आधार पर बनने वाली नई पंचायतें जहां प्रशासन को अधिक व्यवस्थित करने का दावा कर रही हैं, वहीं इनके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

अब नजर इस बात पर होगी कि अंतिम परिसीमन में किन गांवों की सीमाएं बदलती हैं और बिहार के ग्रामीण राजनीतिक नक्शे पर इसका कितना व्यापक असर दिखाई देता है।

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