बी के झा
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नई दिल्ली, 7 अगस्त
देश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय बने परिसीमन (Delimitation) को लेकर सियासी हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसदों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें आगामी राजनीतिक रणनीति, संसद की कार्यवाही, युवाओं से संवाद और विकास कार्यों पर विस्तार से चर्चा हुई।
सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए सरकार के पास पर्याप्त समर्थन उपलब्ध है और यदि आवश्यक हुआ तो इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन तथा महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर आगे बढ़ा जा सकता है।हालांकि, सरकार की ओर से विशेष सत्र बुलाने या विधेयक पेश करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए इस संबंध में अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी।
सूत्रों के अनुसार बैठक में यह भी कहा गया कि परिसीमन की प्रक्रिया के दौरान सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों के हितों और जनभावनाओं का ध्यान रखा जाएगा। बताया जा रहा है कि सरकार सहयोगी दलों के साथ निरंतर संवाद बनाए हुए है और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।
युवाओं के बीच सक्रिय रहने का संदेश
बैठक में प्रधानमंत्री ने सांसदों से कहा कि वे Gen-Z और युवा मतदाताओं के बीच लगातार सक्रिय रहें। सरकार की योजनाओं, उपलब्धियों और नीतियों की जानकारी युवाओं तक पहुंचाएं तथा संवाद के माध्यम से किसी भी प्रकार की नाराजगी या भ्रम को दूर करने का प्रयास करें।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के साथ निरंतर संवाद का भी दायित्व है।
सहयोगी दलों को भरोसा
सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री ने सहयोगी दलों को आश्वस्त किया कि एनडीए में हर दल का समान सम्मान है, चाहे उसके सांसदों की संख्या कम हो या अधिक।
शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसदों से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि पार्टी से जुड़े सभी निर्णय संविधान और कानून के दायरे में लिए गए हैं तथा न्यायिक प्रक्रिया पर सरकार को पूरा विश्वास है। उन्होंने सांसदों से कहा कि विकास कार्यों में किसी भी प्रकार की बाधा आने पर वे सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।बैठक में शिवसेना (शिंदे गुट), एनसीपी (अजित पवार गुट), अन्य सहयोगी दलों तथा विभिन्न राज्यों के सांसदों ने भाग लिया।
विकास और जनसंपर्क पर विशेष जोर
प्रधानमंत्री ने सांसदों से अपने संसदीय क्षेत्रों में लगातार सक्रिय रहने, गरीबों, किसानों, श्रमिकों और युवाओं से संवाद बनाए रखने तथा विकास परियोजनाओं की नियमित समीक्षा करने का आग्रह किया।उन्होंने सांसदों को स्वास्थ्य के प्रति भी सजग रहने की सलाह देते हुए योग और नियमित व्यायाम अपनाने का संदेश दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वस्थ जनप्रतिनिधि ही समाज और राष्ट्र की बेहतर सेवा कर सकते हैं।
संसद की कार्यवाही पर चिंता
प्रधानमंत्री ने संसद में लगातार हो रहे हंगामे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि बार-बार व्यवधान के कारण कई नए सांसदों को अपने विचार रखने का अवसर नहीं मिल पाता, जिससे लोकतांत्रिक संवाद प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार संसद को सुचारु रूप से चलाने के लिए विपक्ष से संवाद करने को तैयार रही है।
परिसीमन क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन का प्रभाव केवल चुनावी नक्शे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे राज्यों की राजनीतिक शक्ति, संसदीय प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाती है तो यह आने वाले वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया साबित हो सकती है।उनके अनुसार इसका असर केवल लोकसभा सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राज्यों के राजनीतिक प्रभाव, क्षेत्रीय दलों की रणनीति, सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी समीकरणों पर भी पड़ेगा।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना सरकार और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी होगी।
कानूनविदों की राय
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि परिसीमन पूरी तरह संविधान और संबंधित कानूनों के प्रावधानों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।कानूनविदों का मानना है कि ऐसी किसी भी प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संघीय ढांचे का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी प्रकार का संवैधानिक विवाद उत्पन्न न हो।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
राजनीति विज्ञान और लोक प्रशासन के शिक्षकों का कहना है कि परिसीमन लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक बनाने का संवैधानिक माध्यम है।हालांकि उनका मानना है कि इस विषय पर जनता, विशेषकर युवाओं के बीच तथ्यात्मक जानकारी का अभाव है। इसलिए सरकार, निर्वाचन आयोग और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।
समाजसेवी संगठनों की प्रतिक्रिया
कई सामाजिक संगठनों ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया में केवल जनसंख्या ही नहीं बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों, आदिवासी क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों, सामाजिक संतुलन और प्रशासनिक सुविधा जैसे पहलुओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।उन्होंने व्यापक जनपरामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग की है।
हिन्दू संगठनों की प्रतिक्रिया
कुछ हिन्दू संगठनों ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और यदि परिसीमन संविधान तथा निष्पक्ष मानकों के अनुरूप होता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मर्यादाओं को सर्वोपरि रखने की बात कही।
आम नागरिकों की राय
विभिन्न राज्यों के नागरिकों का कहना है कि यदि परिसीमन से जनसंख्या के अनुपात में बेहतर प्रतिनिधित्व मिलता है और विकास योजनाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा।हालांकि कई लोगों ने यह भी कहा कि प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी क्षेत्र या समुदाय के साथ भेदभाव की भावना न बने।
विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया
विपक्षी दल लगातार यह कहते रहे हैं कि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सभी राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति आवश्यक है। कई विपक्षी नेता पहले भी आशंका जता चुके हैं कि प्रक्रिया में संघीय ढांचे, क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार विधेयक लाती है तो संसद में विस्तृत बहस होनी चाहिए और सभी पक्षों की राय को महत्व दिया जाना चाहिए।
संपादकीय दृष्टिकोण
परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की प्रशासनिक कवायद नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की संरचना को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करने वाली संवैधानिक प्रक्रिया है। इसलिए इस विषय पर राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सहमति, संवैधानिक मूल्यों और संघीय संतुलन को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यदि सरकार और विपक्ष संवाद, पारदर्शिता तथा व्यापक जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ते हैं, तो यह प्रक्रिया लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बना सकती है; लेकिन यदि इसे केवल राजनीतिक दृष्टि से देखा गया, तो अनावश्यक विवाद और अविश्वास भी जन्म ले सकते हैं।
इसलिए देश की निगाहें अब सरकार के अगले आधिकारिक कदम और संसद में होने वाली संभावित चर्चा पर टिकी हैं।
