मोहनिया में शराब तस्करी का बड़ा खेल बेनकाब: 14 चक्का ट्रक में गुप्त तहखाना, 75 लाख की विदेशी शराब बरामद; 550 पेटी शराब, 4,815 लीटर की खेप के साथ हरियाणा के दो आरोपी गिरफ्तार; पंजाब से बिहार पहुंचाई जा रही थी खेप

बी के झा

NSK news Ind

कैमूर/मोहनिया, 11 अगस्त

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद अवैध शराब का कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। शराब माफिया कानून और सुरक्षा एजेंसियों की निगाहों से बचने के लिए लगातार नए-नए तरीके अपना रहे हैं। कैमूर जिले के मोहनिया चेकपोस्ट पर सामने आया मामला इसी संगठित तस्करी की एक और गंभीर तस्वीर पेश करता है।उत्पाद विभाग की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए एक 14 चक्का ट्रक से करीब 550 पेटी विदेशी शराब बरामद की है। बरामद शराब की मात्रा लगभग 4,815 लीटर बताई जा रही है, जिसकी अनुमानित बाजार कीमत करीब 72 से 75 लाख रुपये आंकी गई है। शराब की यह खेप पंजाब से बिहार लाई जा रही थी।

ट्रक में बना था गुप्त तहखाना, ऊपर से गोबर की खाद का सुरक्षा कवच

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू तस्करों द्वारा अपनाया गया तरीका है। उत्पाद विभाग के अनुसार, ट्रक के भीतर बाकायदा एक गुप्त तहखाना तैयार किया गया था। शराब की पेटियों को इसी छिपे हुए हिस्से में रखा गया था।तस्करों ने जांच एजेंसियों और स्कैनर की नजर से बचने के लिए तहखाने के आसपास जैविक खाद यानी गोबर से भरे बोरे लाद रखे थे। पहली नजर में ट्रक खाद की सामान्य खेप लेकर जाता हुआ दिखाई देता था, लेकिन अंदर लाखों रुपये की अवैध शराब छिपी थी।यह तरीका इस बात का संकेत है कि शराब की तस्करी अब महज छोटे स्तर के स्थानीय नेटवर्क तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें ट्रकों को विशेष रूप से तैयार करने और जांच से बचने की रणनीति तक अपनाई जा रही है।

दुर्गावती से शुरू हुआ पीछा, मोहनिया चेकपोस्ट पर पकड़ा गया ट्रक

उत्पाद विभाग के चेकपोस्ट प्रभारी संतोष कुमार के अनुसार, टीम को पहले ही सूचना मिल गई थी कि पंजाब से एक 14 चक्का ट्रक में शराब की बड़ी खेप बिहार लाई जा रही है।सूचना मिलते ही पुलिस और उत्पाद विभाग की टीम सक्रिय हुई और संदिग्ध ट्रक का दुर्गावती से पीछा शुरू किया गया। इसके बाद मोहनिया चेकपोस्ट पर ट्रक को रोककर उसकी गहन जांच की गई।

बाहरी तौर पर सामान्य दिख रहे ट्रक की जब तलाशी ली गई तो उसके अंदर बनाए गए गुप्त तहखाने का पता चला। तहखाना खुलते ही शराब की बड़ी खेप बरामद हो गई।50 हजार रुपये के लिए ट्रक चलाने का दावाइस मामले में पुलिस ने विकास और नितेश कुमार नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। दोनों हरियाणा के रहने वाले बताए गए हैं।पूछताछ में गिरफ्तार आरोपी विकास ने कथित तौर पर बताया कि उसने ट्रक कानपुर से लिया था और उसे पटना पहुंचाना था। इसके बदले उसे 50 हजार रुपये देने की बात कही गई थी।

हालांकि, जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी शराब की खेप के पीछे कौन लोग हैं?

ट्रक किसके निर्देश पर चल रहा था?

शराब बिहार में किसे पहुंचाई जानी थी

और इसके आगे वितरण का नेटवर्क कितना बड़ा है?

उत्पाद विभाग मुख्य शराब कारोबारियों के नाम और पते का पता लगाने में जुटा है।

शराबबंदी के बावजूद करोड़ों का सवाल

मोहनिया की यह बरामदगी बिहार में शराबबंदी के क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है। कानून बनने के बाद भी यदि पंजाब जैसे दूर के राज्य से हजारों लीटर विदेशी शराब बिहार तक पहुंच रही है और तस्कर ट्रकों में गुप्त तहखाने बनाने की हद तक जा रहे हैं, तो यह केवल एक ट्रक या दो आरोपियों का मामला नहीं माना जा सकता।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की बड़ी बरामदगी को केवल पुलिस कार्रवाई के रूप में देखने के बजाय इसके पीछे सक्रिय आपूर्ति श्रृंखला, वित्तीय नेटवर्क, परिवहन तंत्र और स्थानीय संपर्कों की जांच जरूरी है। असली सफलता तभी मानी जाएगी जब पुलिस शराब की खेप के साथ उसके पीछे खड़े पूरे नेटवर्क तक पहुंचे।

विपक्ष के लिए भी सरकार को घेरने का मुद्दा

शराबबंदी बिहार की राजनीति का बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में 75 लाख रुपये की शराब की बरामदगी विपक्षी दलों को सरकार की शराबबंदी नीति और उसके जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल उठाने का अवसर देती है।विपक्ष की ओर से स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि जब शराबबंदी लागू है तो इतनी बड़ी मात्रा में शराब राज्य की सीमा के भीतर कैसे प्रवेश कर रही है?

क्या सीमा क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है?

क्या तस्करों को स्थानीय स्तर पर किसी प्रकार का संरक्षण या सहयोग मिल रहा है?

हालांकि, इस मामले में किसी राजनीतिक दल की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने तक किसी दल या नेता की ओर से बयान देना उचित नहीं होगा।

सत्ता पक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती

दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन के लिए यह बरामदगी कार्रवाई की सफलता के साथ-साथ एक चुनौती भी है। सरकार यह तर्क दे सकती है कि गुप्त सूचना पर त्वरित कार्रवाई कर लाखों रुपये की शराब जब्त की गई और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी रहेगा कि ऐसी खेपें राज्य की सीमा तक पहुंचने से पहले क्यों नहीं पकड़ी जा सकीं।

राजनीतिक रूप से देखें तो शराबबंदी की सफलता का पैमाना केवल कितनी शराब पकड़ी गई, यह नहीं होना चाहिए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि कितनी शराब की खेपें बिहार में प्रवेश करने से रोकी गईं और कितने बड़े तस्करी नेटवर्क ध्वस्त किए गए।

कानूनविदों की नजर में जांच का दायरा बढ़ाना जरूरी

कानून के जानकारों के अनुसार, ऐसे मामले में केवल वाहन चालक या तत्काल पकड़े गए आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। जांच का दायरा उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जिन्होंने शराब की खरीद, परिवहन, भुगतान और संभावित वितरण की व्यवस्था की।

विशेष रूप से यह पता लगाना अहम होगा कि ट्रक किसके नाम पर था, उसे किसने उपलब्ध कराया, शराब कहां से लोड हुई, रास्ते में किन लोगों से संपर्क हुआ, पटना में खेप किसे सौंपनी थी और पूरे सौदे में पैसों का लेन-देन किस माध्यम से होना था।

यदि जांच एजेंसियां इस पूरी कड़ी को जोड़ने में सफल होती हैं तो मोहनिया की यह बरामदगी केवल एक बड़ी शराब जब्ती नहीं, बल्कि एक बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क तक पहुंचने का जरिया बन सकती है।

समाजसेवी संस्थाओं के सामने भी बड़ा सवाल

सामाजिक संगठनों के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शराबबंदी का उद्देश्य केवल शराब की बिक्री रोकना नहीं, बल्कि इसके सामाजिक दुष्परिणामों को कम करना भी है।समाजसेवी संस्थाओं का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि कानून के साथ-साथ लोगों को जागरूक करना, अवैध शराब के नेटवर्क को खत्म करना और युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए सामाजिक अभियान चलाना भी जरूरी है।

मोहनिया में सामने आया मामला यह बताता है कि शराब माफिया आर्थिक लाभ के लिए कानून से बचने के नए रास्ते तलाश रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ सामाजिक स्तर पर भी निरंतर अभियान की आवश्यकता है।

असली कहानी 550 पेटियों से आगे

मोहनिया में पकड़ा गया ट्रक फिलहाल जांच एजेंसियों के कब्जे में है और दो आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। लेकिन इस पूरे मामले की असली कहानी शायद उन 550 पेटियों से कहीं बड़ी हो सकती है।

किसने शराब खरीदी?

किसने ट्रक तैयार कराया?

गुप्त तहखाना किसने बनवाया?

गोबर के बोरों की आड़ में छिपाने की योजना किसकी थी?

शराब पटना में किसे पहुंचानी थी?

और इस पूरे नेटवर्क में कितने लोग शामिल हैं?

इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मोहनिया की कार्रवाई महज एक बड़ी बरामदगी बनकर रह जाती है या फिर बिहार में सक्रिय किसी बड़े अंतरराज्यीय शराब तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश करती है।

फिलहाल दो गिरफ्तार, नेटवर्क की तलाश जारीउत्पाद विभाग और पुलिस की जांच जारी है। गिरफ्तार दोनों आरोपियों से पूछताछ के आधार पर मुख्य कारोबारियों और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है।बिहार में शराबबंदी के बीच 75 लाख रुपये की इस खेप की बरामदगी ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि तस्करों के नए-नए तरीकों के मुकाबले कानून लागू कराने वाली एजेंसियां अपनी निगरानी और खुफिया व्यवस्था को कितनी तेजी से मजबूत कर पा रही हैं।

मोहनिया की कार्रवाई ने एक खेप जरूर रोक दी है, लेकिन अब निगाह इस बात पर है कि जांच एजेंसियां उस नेटवर्क तक कब पहुंचती हैं, जिसने इस पूरी खेप को बिहार तक पहुंचाने की साजिश रची थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *