क्या अमेरिका को अब भारत की ज़रूरत नहीं? ट्रंप–शी की बढ़ती नज़दीकियों पर उठे बड़े सवाल

बी के झा

NSK news Ind

वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 14 अगस्त

अमेरिकी रक्षा एवं विदेश नीति विशेषज्ञ डेरेक ग्रॉसमैन के एक बयान ने भारत–अमेरिका संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति में चीन को संतुलित करने के लिए भारत की प्राथमिकता पहले जैसी नहीं रह गई है और अमेरिका अब “इंडो-पैसिफिक” की बजाय “एशिया-पैसिफिक” रणनीति पर अधिक ज़ोर देता दिखाई दे रहा है।

ग्रॉसमैन के अनुसार, ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच लगातार होने वाली उच्चस्तरीय मुलाकातें तथा औपचारिक सम्मान के साथ स्वागत यह संकेत देती हैं कि दोनों महाशक्तियाँ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ संवाद को भी प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता का अंत नहीं है, बल्कि उसकी शैली में बदलाव है।

ट्रंप–शी समीकरण: क्या दुनिया G-2 की ओर बढ़ रही है?

ग्रॉसमैन का मानना है कि ट्रंप व्यक्तिगत कूटनीति (Personality Politics) में विश्वास रखते हैं। यदि अमेरिका और चीन के शीर्ष नेता एक वर्ष में कई बार मिलते हैं, तो यह केवल औपचारिक कूटनीति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी माना जा सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि G-2 जैसी अवधारणा अभी आधिकारिक नीति नहीं है, लेकिन यदि वॉशिंगटन और बीजिंग वैश्विक आर्थिक एवं सामरिक मुद्दों पर अधिक समन्वय बढ़ाते हैं, तो भारत सहित मध्य शक्तियों के सामने नई रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं।

भारत की भूमिका कमज़ोर हुई या बदली है?

रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का आकलन है कि ट्रंप प्रशासन का तत्काल फोकस जापान, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर अधिक दिखाई देता है। इसे “फर्स्ट आइलैंड चेन” सुरक्षा रणनीति से जोड़ा जा रहा है।हालाँकि भारतीय सामरिक समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि हिंद महासागर क्षेत्र, अंडमान–निकोबार, समुद्री व्यापार मार्ग और क्वाड में भारत की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना अमेरिका के लिए भी व्यावहारिक नहीं होगा।

भारतीय विदेश मंत्रालय का दृष्टिकोण

विदेश मंत्रालय लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि भारत की विदेश नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है। भारत किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान तथा वैश्विक दक्षिण सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाता है।

कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत–अमेरिका संबंध केवल चीन-विरोध तक सीमित नहीं हैं;

रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, व्यापार, शिक्षा और अंतरिक्ष सहयोग भी इस साझेदारी के मजबूत स्तंभ हैं।

विपक्ष का सवाल

विपक्षी दलों का कहना है कि यदि अमेरिका की प्राथमिकताओं में बदलाव दिखाई दे रहा है तो केंद्र सरकार को संसद और देश के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति क्या होगी। उनका मत है कि विदेश नीति का मूल्यांकन व्यक्तिगत नेताओं की मित्रता से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और संस्थागत संबंधों से होना चाहिए।

कानूनविदों और शिक्षाविदों की राय

संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विदेश नीति संविधान के अनुच्छेद 51 की भावना के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय शांति और संप्रभु समानता पर आधारित है। वहीं शिक्षाविदों का मानना है कि वर्तमान विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहाँ भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।

निष्कर्ष

डेरेक ग्रॉसमैन का बयान एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बहस को जन्म देता है, लेकिन इसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी मित्रता या शत्रुता से नहीं, बल्कि बदलते राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है।

ऐसे समय में भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक क्षमता और क्षेत्रीय नेतृत्व होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *