बी के झा
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नई दिल्ली, 21 अगस्त
देश की निचली न्यायिक सेवा में भर्ती को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि कानून में पोस्ट ग्रेजुएट (LLM) डिग्री को अदालत में वास्तविक वकालत के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश बनने के लिए केवल शैक्षणिक योग्यता पर्याप्त नहीं, बल्कि अदालतों में काम करने का व्यावहारिक अनुभव भी आवश्यक है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं पर यह निर्णय सुनाया।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
पीठ ने कहा: “कानून की डिग्री और अदालत में वकालत का अनुभव समान नहीं हैं। न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए व्यावहारिक विधिक अनुभव का अपना अलग महत्व है।
”हालांकि अदालत ने यह भी माना कि मई 2025 में तीन वर्ष की वकालत की शर्त बहाल होने से हजारों कानून स्नातकों को अचानक कठिनाई हुई। इसी कारण न्यायालय ने संक्रमणकालीन व्यवस्था लागू की है।
2027 तक क्या रहेगा नियम?
अवधि ——————-पात्रता
31 मार्च 2027 तक –सभी लॉ ग्रेजुएट आवेदन कर सकेंगे
चयन के बाद—-1 वर्ष न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण + 1 वर्ष लॉ क्लर्क सेवा
1 अप्रैल 2027 से–परीक्षा से पहले कम से कम 1 वर्ष की वास्तविक वकालत अनिवार्य
कानूनविदों की राय
वरिष्ठ कानून विशेषज्ञों का मानना है कि फैसला न्यायिक गुणवत्ता और अवसरों के बीच संतुलन स्थापित करता है। उनके अनुसार अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किताबी ज्ञान न्यायिक विवेक का विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन लंबे समय से तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के हितों की भी रक्षा की गई है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
कानून विश्वविद्यालयों के शिक्षकों ने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि संस्थागत प्रशिक्षण और न्यायालयी लिपिक सेवा से नए न्यायिक अधिकारियों को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली समझने का अवसर मिलेगा। उनका मानना है कि इससे न्यायिक प्रशिक्षण अधिक व्यावहारिक बनेगा।
विधि मंत्रालय की संभावित दिशा
विधि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, अब राज्यों की न्यायिक भर्ती एजेंसियों और न्यायिक अकादमियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप भर्ती नियमों और प्रशिक्षण ढांचे में आवश्यक संशोधन करने होंगे। इससे पूरे देश में भर्ती प्रक्रिया अधिक समान और व्यवस्थित होने की संभावना है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों के कई नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों की व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए संतुलित फैसला दिया है। उनका कहना है कि अब राज्यों को भर्ती कैलेंडर समय पर जारी कर युवाओं में अनिश्चितता समाप्त करनी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषण
विश्लेषकों के अनुसार यह फैसला केवल भर्ती नियमों का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में योग्यता, अनुभव और संस्थागत प्रशिक्षण के नए मॉडल की शुरुआत है। न्यायालय ने एक ओर वकालत के महत्व को बरकरार रखा, तो दूसरी ओर 2027 तक लाखों विधि स्नातकों को राहत देकर संक्रमण को सहज बनाने का रास्ता भी खोला।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भविष्य की न्यायिक भर्ती व्यवस्था के लिए नई दिशा तय करता है—जहां डिग्री महत्वपूर्ण है, लेकिन न्याय की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अदालत का वास्तविक अनुभव भी उतना ही अनिवार्य माना जाएगा।
