बी के झा
नई दिल्ली, 23 अगस्त
भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस Mk1A की डिलीवरी में लगातार हो रही देरी पर भारतीय वायुसेना के पूर्व उपप्रमुख एयर मार्शल नागेश कपूर (सेवानिवृत्त) ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परियोजना इसी गति से आगे बढ़ी, तो 2030 तक तेजस की कई क्षमताएँ सामरिक दृष्टि से पुरानी पड़ सकती हैं।उन्होंने सवाल उठाया कि जिस विमान को वर्षों पहले तय क्षमताओं के साथ देने का वादा किया गया था, उसकी डिलीवरी बार-बार क्यों टल रही है।
“ऐसा न हो कि 2030 तक तेजस लड़ाकू विमानों की अहमियत ही कम हो जाए।”
देरी की सबसे बड़ी वजह क्या है?
रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार देरी के पीछे कई तकनीकी कारण बताए जा रहे हैं:
अमेरिकी कंपनी GE Aerospace से F404-IN20 इंजन की आपूर्ति में विलंब।
जटिल मिशन सॉफ्टवेयर का परीक्षण और वैलिडेशन।
भारतीय वायुसेना की कठोर परिचालन आवश्यकताएँ।
उत्पादन श्रृंखला और आपूर्ति तंत्र की चुनौतियाँ। HAL का लक्ष्य मार्च 2027 तक पहले चरण के तेजस Mk1A विमानों की डिलीवरी का है।
चीन की रफ्तार बनाम भारत की चुनौती
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एशिया में वायु शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है। चीन पाँचवीं पीढ़ी के J-20 लड़ाकू विमानों का बड़ा बेड़ा विकसित कर रहा है, जबकि भारत अभी 4.5 पीढ़ी के तेजस Mk1A के बड़े पैमाने पर शामिल होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
हालाँकि एयर मार्शल कपूर ने यह भी स्पष्ट किया कि तेजस Mk2 पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं होगा। उनके अनुसार पाँचवीं और छठी पीढ़ी के विमान सीमित संख्या में होंगे, इसलिए मध्यम श्रेणी के आधुनिक लड़ाकू विमान भविष्य में भी आवश्यक रहेंगे।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार लगातार यह कहती रही है कि आत्मनिर्भर भारत के तहत तेजस परियोजना देश की सामरिक स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण स्तंभ है। रक्षा मंत्रालय का दावा है कि इंजन आपूर्ति की समस्या का समाधान किया जा रहा है और उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा रही है।सरकार का तर्क है कि स्वदेशी रक्षा उद्योग में शुरुआती चुनौतियाँ स्वाभाविक हैं, लेकिन दीर्घकाल में यही परियोजनाएँ भारत को आयात पर निर्भरता से मुक्त करेंगी।
विपक्ष का हमला
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने तेजस की देरी को रक्षा प्रबंधन की विफलता बताते हुए सरकार से जवाबदेही की मांग की है। उनका कहना है कि सैनिकों की परिचालन जरूरतों और रक्षा आधुनिकीकरण में समयबद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
रक्षा विशेषज्ञों की राय
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद तेजस बनाम विदेशी विमान का नहीं, बल्कि समय पर डिलीवरी का है। यदि उत्पादन गति नहीं बढ़ी, तो वायुसेना के स्क्वाड्रनों की संख्या और क्षमता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।सैन्य रणनीतिकारों के अनुसार भारत को समानांतर रूप से तेजस, AMCA और इंजन निर्माण जैसी परियोजनाओं पर निवेश बढ़ाना होगा, ताकि भविष्य की वायु शक्ति संतुलित रहे।
शिक्षाविद और कानूनविद क्या कहते हैं?
शिक्षाविदों का मानना है कि स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास में विश्वविद्यालयों, रक्षा प्रयोगशालाओं और उद्योग के बीच गहरा सहयोग आवश्यक है।कानूनविदों के अनुसार रक्षा खरीद और सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में पारदर्शी अनुबंध प्रबंधन तथा समयबद्ध जवाबदेही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रशासनिक दायित्व है।
सामाजिक दृष्टिकोण
पूर्व सैनिकों और समाजसेवी संगठनों का कहना है कि देश की सुरक्षा केवल नए हथियार खरीदने से नहीं, बल्कि सैनिकों को समय पर विश्वसनीय और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने से मजबूत होती है। उनके अनुसार रक्षा परियोजनाओं में देरी का सबसे बड़ा प्रभाव अंततः वायुसेना की परिचालन तैयारी पर पड़ता है।
निष्कर्ष
एयर मार्शल नागेश कपूर की टिप्पणी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है—क्या भारत तेजस परियोजना को समय रहते उस स्तर तक पहुँचा पाएगा, जहाँ वह 2030 के दशक की चुनौतियों का प्रभावी उत्तर बन सके?
सरकार इसे आत्मनिर्भरता की ऐतिहासिक उपलब्धि मानती है, जबकि विशेषज्ञ समयबद्ध क्रियान्वयन को इसकी सबसे बड़ी परीक्षा बता रहे हैं।
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