बी के झा
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नई दिल्ली, 23 अगस्त
भारत की पड़ोसी नीति को लेकर विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ऐसा स्पष्ट और संतुलित संदेश दिया है, जिसे दक्षिण एशिया की कूटनीति का नया सूत्र माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि “कोई भी संबंध तभी सफल होता है, जब उसमें दोनों पक्षों का लाभ हो।” यह टिप्पणी बांग्लादेश के साथ चल रही कूटनीतिक चर्चाओं, पाकिस्तान के साथ आतंकवाद के मुद्दे और चीन के साथ आर्थिक संबंधों—तीनों पर भारत की रणनीति को एक साथ परिभाषित करती है।
बांग्लादेश को संदेश: सम्मान, समानता और साझा हित
ईटी वर्ल्ड लीडर्स फोरम में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत यह अपेक्षा नहीं करता कि कोई पड़ोसी देश केवल भारत के हितों के अनुसार चले। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थायी संबंध साझा सहमति और पारस्परिक लाभ पर आधारित होते हैं।यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा और ब्रिक्स आउटरीच सत्र को लेकर कूटनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। भारत ने उन्हें औपचारिक निमंत्रण दिया है, जबकि ढाका ने कुछ द्विपक्षीय मुद्दों पर अपनी प्राथमिकताएं भी सामने रखी हैं।
पाकिस्तान पर दो टूक: आतंक और वार्ता साथ नहीं
विदेश मंत्री ने पाकिस्तान के संदर्भ में भारत की वर्षों पुरानी लेकिन अडिग नीति दोहराई।
“बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते।”उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक सरकार जनता की भावनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकती। यह संदेश स्पष्ट करता है कि भारत किसी भी संवाद की बुनियाद आतंकवाद-मुक्त वातावरण को ही मानता है।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा भी, सहयोग भी
सितंबर में प्रस्तावित SCO और BRICS शिखर सम्मेलन से पहले जयशंकर ने चीन के साथ संबंधों पर भी संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों संबंधों में स्थिरता चाहते हैं तथा दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में व्यापारिक सहयोग भी आवश्यक है।साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि सीमा पर शांति ही द्विपक्षीय संबंधों की असली कसौटी रहेगी। यदि सीमावर्ती हालात स्थिर रहते हैं तो आर्थिक और व्यावसायिक सहयोग स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ सकता है।
कूटनीतिक विश्लेषण: भारत की नई पड़ोसी नीति विदेश नीति
विशेषज्ञों के अनुसार जयशंकर के वक्तव्य में तीन स्पष्ट सिद्धांत उभरकर सामने आते हैं:
बांग्लादेश: बराबरी, सम्मान और साझा हितों पर आधारित साझेदारी।
पाकिस्तान: आतंकवाद समाप्त हुए बिना सामान्य वार्ता संभव नहीं।
चीन: सीमा पर स्थिरता के साथ आर्थिक सहयोग और रणनीतिक सतर्कता।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब भावनात्मक कूटनीति के बजाय हित-आधारित यथार्थवादी विदेश नीति को प्राथमिकता दे रहा है, जहां पड़ोसी देशों के साथ सहयोग का दरवाजा खुला है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं।
निष्कर्ष
जयशंकर का संदेश केवल तीन देशों के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए भारत की रणनीतिक सोच का संकेत है—साझा हितों पर मित्रता, आतंक पर शून्य सहिष्णुता और सीमा की स्थिरता के साथ आर्थिक प्रगति।
यही संतुलन आने वाले समय में दक्षिण एशिया की कूटनीति की दिशा तय कर सकता है।
