मराठी के बहाने फडणवीस का बड़ा सियासी दांव, शिंदे को भी संदेश और यूपी तक असर! “क्या महाराष्ट्र की सत्ता में अब आखिरी फैसला फडनवीस का ?

बी के झा

NSK news Ind

मुंबई , 29 अगस्त

महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा सिर्फ भाषा नहीं है, यह लंबे समय से सत्ता, पहचान और वोट की राजनीति का भी बड़ा हथियार रही है। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी सीखने की अनिवार्यता के फैसले पर एक साल की राहत देकर इस संवेदनशील मुद्दे को जिस तरह संभाला है, उसने महाराष्ट्र की सियासत में कई संदेश एक साथ भेज दिए हैं।ऊपर से देखने पर यह फैसला करीब पांच लाख ऑटो-टैक्सी चालकों को राहत देने वाला प्रशासनिक निर्णय नजर आता है, लेकिन इसके भीतर राजनीति की कई परतें छिपी हैं।

फडणवीस ने एक तरफ उत्तर भारतीय समाज की उस चिंता को शांत किया है, जो रोजगार पर संकट आने की आशंका से बेचैन था, तो दूसरी तरफ अपनी ही सरकार में सहयोगी शिवसेना के मंत्री के फैसले को पलटकर सत्ता के समीकरण पर भी अपनी मुहर लगा दी है।यानी मराठी के मुद्दे पर फडणवीस ने सिर्फ भाषा की राजनीति नहीं संभाली, बल्कि सत्ता की भाषा भी साफ कर दी है।

यूपी से मुंबई तक एक ही फैसले का असर

फडणवीस के इस कदम का असर मुंबई से करीब 1500 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजनीति तक दिखाई देने की संभावना जताई जा रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ मुंबई में रहने वाला उत्तर भारतीय समाज बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह है।मुंबई और पूरे एमएमआर क्षेत्र में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय आबादी रहती है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आए ऐसे परिवार भी शामिल हैं जिनकी रोजी-रोटी ऑटो, टैक्सी, परिवहन, छोटे कारोबार और सेवा क्षेत्र से जुड़ी है।

ऐसे में यदि मराठी भाषा नहीं जानने वाले चालकों के बैज रद्द होने की नौबत आती, तो मामला सिर्फ मुंबई के परिवहन तंत्र तक सीमित नहीं रहता। इसका असर उन परिवारों तक जाता जिनकी आर्थिक निर्भरता इन नौकरियों पर है।फडणवीस ने शायद इसी संभावित राजनीतिक नुकसान को समय रहते भांप लिया।

राजनीतिक संदेश बिल्कुल सीधा है—भाषा का सम्मान अपनी जगह, लेकिन किसी की रोजी-रोटी कीमत नहीं हो सकती।

अखिलेश के ‘मराठी कार्ड’ को भी झटका?

मुंबई में मराठी भाषा को लेकर पैदा हुई बहस को समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठाया था। ऐसे में महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला विपक्ष के लिए भी असहज स्थिति पैदा करता है।यदि यह मुद्दा लंबा खिंचता और बड़ी संख्या में ऑटो-टैक्सी चालकों पर कार्रवाई की आशंका पैदा होती, तो विपक्ष इसे ‘रोजगार बनाम भाषा’ के सवाल में बदल सकता था।फडणवीस ने समय रहते इस संभावना को रोक दिया।इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को यह हो सकता है कि उत्तर भारतीय समाज के बीच यह संदेश जाए कि पार्टी उनकी रोजी-रोटी और आर्थिक हितों को लेकर संवेदनशील है।उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के लिए यह संदेश छोटा नहीं है।

असली कहानी यहीं खत्म नहीं होती…इस फैसले की सबसे दिलचस्प परत महाराष्ट्र सरकार के भीतर है।कुछ दिन पहले ही राज्य सरकार ने ऐसा प्रावधान किया था जिसके तहत मुख्यमंत्री को अपने किसी मंत्री के फैसले को पलटने का अधिकार दिया गया। अब इसी अधिकार का पहला बड़ा इस्तेमाल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के फैसले के मामले में किया है।सरनाईक ने मई में घोषणा की थी कि ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य होगा और इसका पालन नहीं करने पर उनका बैज रद्द किया जा सकता है।फैसला सामने आते ही राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई।

अब मुख्यमंत्री ने इसमें एक साल की राहत देकर साफ कर दिया है कि सरकार की नीति का अंतिम राजनीतिक नियंत्रण मुख्यमंत्री के हाथ में है।और यही वह बिंदु है जहां यह मामला सिर्फ भाषा की राजनीति से निकलकर फडणवीस बनाम शिंदे के शक्ति-संतुलन की कहानी बन जाता है।

शिंदे के लिए संदेश कितना बड़ा?

महाराष्ट्र की मौजूदा सत्ता व्यवस्था में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं और एकनाथ शिंदे उपमुख्यमंत्री। दोनों दल सत्ता में साझेदार हैं, लेकिन दोनों की अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन और महत्वाकांक्षाएं हैं।शिवसेना की राजनीति की जड़ों में मराठी अस्मिता का मुद्दा हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में शिवसेना के मंत्री द्वारा मराठी को लेकर लिया गया फैसला स्वाभाविक रूप से पार्टी की राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा हुआ माना जा सकता है।

लेकिन जब उसी सरकार के मुख्यमंत्री ने उस फैसले को नरम कर दिया, तो एक संदेश स्पष्ट रूप से गया—सरकार में मंत्री अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं रख सकते हैं, लेकिन अंतिम नीति-निर्धारण की शक्ति मुख्यमंत्री के पास है।यही वजह है कि इस फैसले को शिंदे के लिए फडणवीस का अप्रत्यक्ष राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।

फडणवीस ने किसी सार्वजनिक टकराव के बिना यह दिखा दिया कि सरकार के भीतर कौन सा फैसला अंतिम माना जाएगा।

बीजेपी बनाम शिवसेना का नहीं, वोट बैंक का सवाल

फडणवीस के सामने चुनौती बेहद नाजुक थी।एक तरफ शिवसेना की मराठी पहचान से जुड़ी राजनीति है और दूसरी तरफ बीजेपी का व्यापक हिंदुत्व एवं राष्ट्रीय राजनीतिक आधार, जिसमें उत्तर भारतीय मतदाता बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।मुंबई में रहने वाला उत्तर भारतीय समाज लंबे समय से महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऑटो-टैक्सी, होटल, निर्माण, छोटे कारोबार, परिवहन और सेवा क्षेत्र में इस समुदाय की बड़ी भागीदारी है।ऐसे में भाषा को रोजगार की शर्त से जोड़ना बीजेपी के लिए

राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता था।फडणवीस ने उसी जोखिम को काट दिया।उन्होंने भाषा के सम्मान को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन भाषा को रोजगार छिनने का हथियार बनने से रोक दिया।यही संतुलन इस फैसले को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

‘मराठी का सम्मान, लेकिन रोजगार पर वार नहीं’

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुंबई जैसे महानगर में भाषा की राजनीति को बेहद सावधानी से साधना पड़ता है। मुंबई की पहचान सिर्फ मराठी संस्कृति से नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आए करोड़ों लोगों के योगदान से भी बनी है।

राजनीतिक विश्लेषक हरि गोविंद विश्वकर्मा के अनुसार,

ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी सीखना भाषा के सम्मान और प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसे दबाव या भय का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। मुंबई की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान को भी ध्यान में रखना होगा।यानी मराठी सीखने के लिए प्रोत्साहन हो सकता है, लेकिन उसे रोजी-रोटी से जोड़ना राजनीतिक और सामाजिक रूप से उलटा असर डाल सकता है।

फडणवीस ने सिर्फ फैसला नहीं पलटा, नैरेटिव बदल दिया

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सफलता शायद यही है कि फडणवीस ने बहस का केंद्र बदल दिया।पहले सवाल था—‘मुंबई में मराठी अनिवार्य होगी या नहीं?’

अब सवाल बन गया है—‘क्या भाषा के सम्मान के नाम पर किसी की रोजी-रोटी प्रभावित होनी चाहिए?’

यह बदलाव राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।फडणवीस ने खुद को भाषा विरोधी नेता के रूप में पेश किए बिना रोजगार समर्थक निर्णय लिया। यही वजह है कि यह फैसला बीजेपी के लिए महाराष्ट्र के बाहर भी राजनीतिक संदेश पैदा कर सकता है।उत्तर भारतीयों के बीच भरोसे की राजनीतिराजनीतिक मामलों के जानकार निरंजन परिहार के मुताबिक, यह निर्णय सिर्फ भाषा विवाद को शांत करने वाला कदम नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और राजनीतिक असर भी बड़ा है।

उनका मानना है कि यह फैसला मुंबई में रहने वाले लाखों उत्तर भारतीयों के बीच बीजेपी के प्रति भरोसा मजबूत कर सकता है, क्योंकि मुद्दा सीधे उनकी आजीविका से जुड़ा था।और यही वह जगह है जहां महाराष्ट्र की राजनीति का एक फैसला उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड तक अपनी राजनीतिक गूंज पैदा कर सकता है।

क्या फडणवीस ने शिंदे की ‘मराठी राजनीति’ की सीमा तय कर दी?

यह सवाल आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन सकता है।एकनाथ शिंदे की शिवसेना के लिए मराठी अस्मिता स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी है। लेकिन बीजेपी के साथ सत्ता साझेदारी में उसे यह भी देखना पड़ता है कि महाराष्ट्र की राजनीति का असर देश के दूसरे हिस्सों में पार्टी के चुनावी समीकरणों पर न पड़े।फडणवीस ने इसी बिंदु पर अपनी प्राथमिकता स्पष्ट की है।यह संदेश सिर्फ प्रताप सरनाईक तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह सरकार के भीतर मौजूद हर मंत्री के लिए भी एक संकेत है कि किसी मुद्दे पर राजनीतिक निर्णय लेने से पहले उसके व्यापक चुनावी और सामाजिक असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फडणवीस का ‘वीटो’ कितना दूर जाएगा?

फडणवीस का यह कदम आने वाले समय में महाराष्ट्र सरकार के भीतर सत्ता के इस्तेमाल का नया उदाहरण बन सकता है।अब तक मंत्रियों के फैसले उनके संबंधित विभागों की नीतियों के रूप में देखे जाते थे। लेकिन मुख्यमंत्री के पास उन्हें पलटने की शक्ति का इस्तेमाल सार्वजनिक रूप से होने के बाद सत्ता की वास्तविक कमान को लेकर तस्वीर और स्पष्ट हो गई है।यहां सवाल सिर्फ एक फैसले का नहीं है।

सवाल यह है कि क्या महाराष्ट्र की सत्ता में अब बड़े राजनीतिक फैसलों पर अंतिम मुहर मुख्यमंत्री फडणवीस की होगी?

फडणवीस ने पहला जवाब दे दिया है।वह भी ऐसे मुद्दे पर, जहां एक तरफ शिवसेना की राजनीतिक जमीन थी और दूसरी तरफ बीजेपी का बड़ा वोट बैंक।

एक तीर, कई निशाने

फडणवीस के इस फैसले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक साथ कई राजनीतिक लक्ष्य साधे गए हैं।-

ऑटो-टैक्सी चालकों को तत्काल राहत मिली।

– उत्तर भारतीय समाज की रोजगार संबंधी चिंता कम हुई।-

बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक को राजनीतिक भरोसा मिला।-

विपक्ष के लिए भाषा बनाम रोजगार का मुद्दा कमजोर हुआ।-

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के खिलाफ संभावित नैरेटिव को शुरुआती स्तर पर ही रोकने की कोशिश हुई।-

शिवसेना के मंत्री के फैसले को पलटकर मुख्यमंत्री की राजनीतिक सर्वोच्चता का संकेत दिया गया।-

और सबसे महत्वपूर्ण—फडणवीस ने बिना किसी खुले टकराव के एकनाथ शिंदे की राजनीति की सीमा भी रेखांकित कर दी।

अब नजर इस बात पर कि आगे क्या होता है

महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन जितना मजबूत दिखाई देता है, उसके भीतर सत्ता और राजनीतिक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा उतनी ही स्वाभाविक है।फडणवीस का यह फैसला उसी प्रतिस्पर्धा की एक झलक माना जा सकता है।

उन्होंने न तो मराठी भाषा के सम्मान को चुनौती दी और न ही शिवसेना के खिलाफ कोई सीधा राजनीतिक बयान दिया। इसके बजाय उन्होंने प्रशासनिक अधिकार का इस्तेमाल किया और उन्होंने NSK News India द्वारा महाराष्ट्र सरकार पर किए गए सख्त टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए, उस फैसले को और नरम कर दिया जो बीजेपी के लिए चुनावी और सामाजिक जोखिम पैदा कर सकता था।यही फडणवीस की राजनीति की खासियत है—टकराव कम, संदेश बड़ा।

मराठी भाषा का सम्मान महाराष्ट्र की पहचान का हिस्सा है, लेकिन मुंबई की अर्थव्यवस्था में हिंदीभाषी और दूसरे राज्यों से आए लोगों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

फडणवीस ने फिलहाल इसी संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की है।अब देखना यह होगा कि यह फैसला केवल एक प्रशासनिक राहत बनकर रह जाता है या महाराष्ट्र की सत्ता में फडणवीस के ‘अंतिम फैसले’ की शुरुआत साबित होता है।

क्योंकि इस बार मुख्यमंत्री ने सिर्फ एक मंत्री का आदेश नहीं बदला है।उन्होंने सत्ता के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत का भी प्रदर्शन किया है।

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