Big news, Sambhal; संभल में 407 बीघा जमीन पर चला ‘कब्जा हटाओ’ अभियान, PAC की जमीन पर बनी मजार भी ध्वस्त; बुलडोजर एक्शन के पीछे सिर्फ जमीन नहीं, कानून-व्यवस्था का बड़ा संदेश

बी के झा

NSK news Ind

संभल ( उत्तर प्रदेश) , 30 अगस्त

उत्तर प्रदेश के संभल में सरकारी और सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित जमीनों से कथित अवैध कब्जे हटाने का अभियान अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां हर कार्रवाई के साथ प्रशासनिक संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। हयातनगर थाना क्षेत्र के दतावली गांव में प्रस्तावित PAC बटालियन की जमीन पर प्रशासन ने बड़ा अभियान चलाते हुए कथित अतिक्रमण हटाया।

कार्रवाई के दौरान जमीन के एक हिस्से में बनी मजार को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, जबकि दूसरे हिस्से में की जा रही खेती को भी हटाया गया।

प्रशासन के अनुसार कार्रवाई के बाद करीब 407 बीघा जमीन PAC अधिकारियों को सौंप दी गई।यह सिर्फ एक निर्माण गिराने की कहानी नहीं है। इसके पीछे संभल की कानून-व्यवस्था, सरकारी जमीन की सुरक्षा, धार्मिक स्थलों के नाम पर होने वाले कथित अतिक्रमण और आने वाले समय में प्रशासन की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति—इन सभी सवालों की परतें जुड़ी हुई हैं।

2019 में तय हुई थी PAC बटालियन, अब जमीन पर कब्जे का सवाल

संभल में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से वर्ष 2019 में PAC वाहिनी स्थापित करने का फैसला लिया गया था। इसके लिए दतावली ऐदलपुर क्षेत्र में जमीन चिह्नित की गई। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक इस जमीन के बड़े हिस्से के बैनामे भी हो चुके हैं और करीब 98 प्रतिशत भूमि की खरीद पूरी होने की बात सामने आई है।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि जमीन पर कौन बैठा था, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि सरकार द्वारा सार्वजनिक सुरक्षा के लिए चिन्हित जमीन पर कथित कब्जा हुआ कैसे?

अगर किसी सरकारी परियोजना के लिए जमीन वर्षों पहले चिन्हित और खरीदी जा चुकी थी, तो उस पर बाद में किसी धार्मिक या निजी निर्माण का सामने आना राजस्व और स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।यही वह बिंदु है जहां इस कार्रवाई को महज ‘बुलडोजर कार्रवाई’ कहकर छोड़ देना पूरी तस्वीर को छोटा कर देगा।

पीपल के पेड़ की जगह मजार बनाने का प्रशासन का दावा

प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक जमीन के एक हिस्से में पुराना पीपल का पेड़ था और करीब दो-तीन साल पहले उसके स्थान पर मजार का निर्माण किया गया। तहसीलदार के हवाले से सामने आई जानकारी में इसे जमीन पर कब्जे से जोड़कर देखा गया है। दूसरी ओर, उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि मजार करीब 0.025 एकड़ जमीन पर बनी थी और PAC की ओर से जमीन को कब्जामुक्त कराने का अनुरोध किया गया था।

यहीं पर पत्रकारिता का सबसे जरूरी सिद्धांत सामने आता है

—धार्मिक पहचान से पहले जमीन का कानूनी रिकॉर्ड देखा जाए।अगर राजस्व अभिलेख में जमीन सरकारी या PAC के लिए निर्धारित है और सक्षम प्राधिकारी ने अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी की है, तो कार्रवाई का आधार धार्मिक पहचान नहीं बल्कि भूमि का कानूनी स्वामित्व होना चाहिए।

लेकिन अगर किसी पक्ष के पास भूमि पर वैध अधिकार का दावा है, तो उसे भी कानून के तहत अपनी बात रखने और न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार है। यही अंतर किसी कार्रवाई को कानून का शासन बनाता है और उसे राजनीतिक विवाद बनने से रोक सकता है।

बुलडोजर के सामने सबसे बड़ा सवाल—क्या कानून सबके लिए बराबर है?

संभल में पिछले कुछ महीनों से सरकारी जमीनों पर कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई लगातार चर्चा में है। मार्च में भी सरकारी जमीन पर मस्जिद, मदरसा, मकान और दुकानों के निर्माण की शिकायत के बाद प्रशासन ने जमीन की पैमाइश की थी। जुलाई में भी सरकारी भूमि पर बने कथित अवैध धार्मिक ढांचों को हटाने की कार्रवाई की गई थी।इसलिए दतावली की कार्रवाई को एक अलग-थलग घटना की बजाय एक बड़े प्रशासनिक अभियान की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

लेकिन इसी के साथ विपक्ष और सामाजिक संगठनों के लिए सबसे बड़ा सवाल भी यही बनता है—क्या ऐसी कार्रवाई में हर मामले में समान प्रक्रिया, समान नोटिस और समान कानूनी कसौटी अपनाई जा रही है?

सरकार के समर्थक इसे सरकारी संपत्ति की रक्षा और कानून के शासन की दिशा में कठोर कदम बता सकते हैं।

विपक्ष स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा सकता है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में कार्रवाई से पहले पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया, सुनवाई और दस्तावेजी जांच कितनी पारदर्शी रही।

यानी असली परीक्षा बुलडोजर चलाने की नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की है जिसके आधार पर बुलडोजर चलाया गया।

मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं के सामने भी खड़ा है एक कठिन सवाल

इस कार्रवाई के बाद स्थानीय मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस खास दतावली कार्रवाई पर उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में किसी प्रमुख स्थानीय मुस्लिम संगठन या मौलाना की सत्यापित प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, इसलिए उनके नाम से बयान देना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

लेकिन सामाजिक दृष्टि से सवाल जरूर गंभीर है।यदि कोई धार्मिक स्थल वास्तव में सरकारी अथवा सार्वजनिक परियोजना की जमीन पर बाद में बनाया गया हो और उसका उद्देश्य धार्मिक आस्था से अधिक जमीन पर दावा मजबूत करना हो, तो ऐसे मामलों में धार्मिक नेतृत्व को भी स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए कि मजहब की आड़ में सरकारी जमीन पर कब्जा स्वीकार्य नहीं हो सकता।

धर्मस्थल आस्था का विषय हैं, लेकिन आस्था को जमीन के स्वामित्व का वैकल्पिक दस्तावेज नहीं बनाया जा सकता।साथ ही प्रशासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है कि वह वास्तविक धार्मिक आस्था और सुनियोजित अतिक्रमण के बीच फर्क करे और कार्रवाई केवल रिकॉर्ड, कानून और सक्षम आदेश के आधार पर करे।

विपक्ष के लिए भी आसान नहीं होगा संभल का यह मुद्दा

संभल पहले से ही राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील जिला रहा है। नवंबर 2024 की हिंसा के बाद यहां कानून-व्यवस्था का सवाल राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा था। ऐसे माहौल में सरकारी जमीन और धार्मिक निर्माण से जुड़े प्रत्येक प्रशासनिक कदम का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है।

विपक्ष के सामने दोहरी चुनौती है।

एक तरफ वह प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाकर प्रभावित पक्ष की आवाज उठाने की कोशिश कर सकता है।

दूसरी तरफ अगर मामला सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का साबित होता है, तो खुलकर कब्जे के समर्थन में खड़ा होना राजनीतिक रूप से मुश्किल होगा।

इसलिए विपक्ष की सबसे मजबूत लाइन संभवतः यह हो सकती है कि कार्रवाई हो, लेकिन कानून के मुताबिक हो; नोटिस, सुनवाई, राजस्व रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया सार्वजनिक हो।

यही मांग लोकतांत्रिक राजनीति में ज्यादा प्रभावी भी होगी और प्रशासन को जवाबदेह भी बनाएगी।

राजनीतिक विश्लेषण: संभल में ‘बुलडोजर’ अब सिर्फ मशीन नहीं, प्रशासनिक प्रतीक बन चुका है

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बुलडोजर पिछले कुछ वर्षों में सिर्फ अतिक्रमण हटाने वाली मशीन नहीं रहा। वह सरकार की कठोर प्रशासनिक छवि का प्रतीक भी बन चुका है।संभल में इसकी राजनीतिक अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है

क्योंकि यहां धार्मिक पहचान और कानून-व्यवस्था का मुद्दा पहले से बेहद संवेदनशील है।ऐसे में PAC की जमीन पर कार्रवाई सरकार के लिए दो संदेश देती है।

पहला—सरकारी जमीन पर कब्जा चाहे किसी भी रूप में हो, प्रशासन पीछे हटने के मूड में नहीं है।

दूसरा—संभल में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने वाली परियोजनाओं के लिए जमीन को किसी भी तरह के अतिक्रमण से मुक्त कराया जाएगा।

लेकिन यही कदम सरकार के लिए एक चुनौती भी पैदा करता है। यदि प्रशासन इसे ‘कानून सबके लिए बराबर’ की नीति के रूप में पेश करता है, तो आगे आने वाली हर कार्रवाई उसी कसौटी पर परखी जाएगी।

कानूनविदों की नजर में असली मुद्दा क्या?

कानूनी दृष्टि से किसी भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में सबसे महत्वपूर्ण तीन चीजें होती हैं—भूमि का राजस्व रिकॉर्ड, सक्षम प्राधिकारी का आदेश और प्रभावित पक्ष को उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया।

उत्तर प्रदेश में सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के मामलों में राजस्व कानून के तहत प्रक्रिया अपनाई जाती है। जुलाई में संभल के दूसरे मामलों में भी प्रशासन ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत कार्रवाई किए जाने की जानकारी दी थी।

इसलिए दतावली मामले में भी सार्वजनिक विमर्श का केंद्र यह होना चाहिए कि जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है, निर्माण कब हुआ, किसके आदेश से कार्रवाई हुई और संबंधित पक्ष को कानून के तहत क्या अवसर मिला।

कानून की मजबूती बुलडोजर की ताकत से नहीं, प्रक्रिया की पारदर्शिता से साबित होती है।

समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी संदेश

सामाजिक संगठनों की भूमिका यहां केवल विरोध या समर्थन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किसी भी समुदाय के लिए अंततः नुकसानदेह है।

आज अगर किसी सरकारी जमीन पर धार्मिक निर्माण के नाम पर कब्जा होता है, तो कल किसी दूसरे समुदाय या किसी अन्य सार्वजनिक परियोजना की जमीन पर भी ऐसा विवाद खड़ा हो सकता है। इसलिए सामाजिक संगठनों के लिए सबसे संतुलित मांग यही होनी चाहिए—सरकारी जमीन सरकारी ही रहे।

धार्मिक आस्था का सम्मान हो, लेकिन आस्था के नाम पर अतिक्रमण को वैधता न मिले। और कार्रवाई हो तो बिना भेदभाव, पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ हो।

407 बीघा की जमीन अब सिर्फ जमीन नहीं, संभल की सुरक्षा का आधार

दतावली की कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि प्रशासन के अनुसार करीब 407 बीघा जमीन PAC अधिकारियों को सौंप दी गई है। इससे प्रस्तावित PAC बटालियन की स्थापना का रास्ता आगे बढ़ने की उम्मीद है।संभल जैसे संवेदनशील जिले में एक मजबूत PAC ढांचा केवल पुलिस बल बढ़ाने का मामला नहीं है। यह भविष्य में दंगा नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, बड़े धार्मिक आयोजनों और संवेदनशील परिस्थितियों में त्वरित बल उपलब्ध कराने की प्रशासनिक क्षमता से जुड़ा विषय है।

यानी जिस जमीन पर आज बुलडोजर चला, वहां कल सुरक्षा व्यवस्था का एक बड़ा ढांचा खड़ा हो सकता है।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

दतावली में बुलडोजर चल गया।

जमीन खाली हो गई।

PAC को कब्जा भी मिल गया।

लेकिन इस कार्रवाई से पैदा होने वाले सवाल अभी बाकी हैं।

सरकारी जमीन पर कथित कब्जा हुआ कैसे?

मजार का निर्माण कब हुआ और प्रशासन को इसकी जानकारी कब मिली?

क्या जमीन की नियमित निगरानी की व्यवस्था थी?

क्या आगे ऐसी जमीनों पर दोबारा कब्जा रोकने की ठोस व्यवस्था होगी?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या संभल में अब सरकारी जमीन पर कब्जे के खिलाफ कार्रवाई वास्तव में ‘बिना भेदभाव’ की स्थायी नीति बनेगी या फिर हर कार्रवाई को धार्मिक और राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता रहेगा?

यही वह कसौटी होगी जिस पर दतावली की कार्रवाई का असली मूल्यांकन किया जाएगा

संभल को फिलहाल बुलडोजर से ज्यादा जरूरत विश्वसनीय प्रशासन, पारदर्शी राजस्व व्यवस्था और ऐसी कानून-व्यवस्था की है जिसमें जमीन का फैसला धार्मिक पहचान नहीं, दस्तावेज और कानून करें।

अगर प्रशासन इस कसौटी पर आगे बढ़ता है, तो 407 बीघा जमीन की यह कार्रवाई सिर्फ एक अतिक्रमण हटाने की घटना नहीं होगी, बल्कि संभल में सरकारी संपत्ति और कानून के शासन को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक संदेश बन सकती है।

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