बी के झा
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नई दिल्ली, 4 सितंबर
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और स्कूल परिसर में फोटो-वीडियोग्राफी को लेकर लगाए गए प्रतिबंध फिलहाल बरकरार रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत दाखिल इस याचिका पर सुनवाई करने की इच्छुक नहीं है।मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने की।
याचिका प्रिया मिश्रा की ओर से दाखिल की गई थी। इसमें राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों को लेकर जारी किए गए अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी गई थी।
राजस्थान में प्रधानाचार्य की अनुमति जरूरी
याचिका में राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से 16 अगस्त 2026 को जारी सर्कुलर को चुनौती दी गई थी। इस आदेश के तहत बाहरी व्यक्तियों को सरकारी स्कूल परिसर में प्रवेश करने से पहले प्रधानाचार्य से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।सिर्फ प्रवेश ही नहीं, बल्कि स्कूल परिसर में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति का प्रावधान किया गया है।
यानी कोई बाहरी व्यक्ति अपनी मर्जी से स्कूल परिसर में जाकर वहां की गतिविधियों को रिकॉर्ड या प्रसारित नहीं कर सकता। सरकार की ओर से इस तरह के नियमों का उद्देश्य स्कूलों में अनुशासन बनाए रखने के साथ विद्यार्थियों की सुरक्षा, निजता और गरिमा की रक्षा करना बताया गया है।
यूपी में यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों पर भी शिकंजा
उत्तर प्रदेश में भी सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं। याचिका में अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से 19 अगस्त को जारी आदेश को विशेष रूप से चुनौती दी गई थी।इस आदेश में कहा गया था कि बाहरी लोग, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्ति सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना सरकारी स्कूलों में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा बिना अनुमति स्कूल परिसर में फोटो या वीडियो बनाने पर भी रोक लगाई गई है।
याचिका के मुताबिक, आजमगढ़ के अलावा बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा समेत कई अन्य जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं।याचिकाकर्ता ने बताया मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधयाचिका में इन प्रतिबंधों को संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया गया था। दलील दी गई कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में वैध पत्रकारिता और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़ी सूचनाओं का प्रसार भी आता है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान हैं और वहां होने वाली गतिविधियों के बारे में जानकारी हासिल करना और उसे सामने लाना पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।हालांकि, दूसरी ओर स्कूलों में बच्चों की मौजूदगी इस मामले को संवेदनशील बना देती है।
विद्यार्थियों की पहचान, तस्वीरों और व्यक्तिगत जानकारी के अनधिकृत प्रसार से जुड़े जोखिमों को देखते हुए स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की आवाजाही और रिकॉर्डिंग पर नियंत्रण का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद-32 के तहत याचिका पर सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लागू ये प्रशासनिक प्रतिबंध प्रभावी बने हुए हैं।
वकीलों से कथित मारपीट मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का रुख, हाईकोर्ट जाने को कहा
BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन के दौरान कथित मारपीट का मामला; सीबीआई जांच की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे वकीलों का समूह नई दिल्ली में एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के एक समूह को हाईकोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया।
मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गए प्रदर्शन के दौरान कथित मारपीट से जुड़ा है।वकीलों के समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी।
याचिका में आरोप लगाया गया कि BCI कार्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने प्रदर्शन कर रहे वकीलों के साथ मारपीट की।मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई।वकीलों के समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष आरोप लगाया कि BCI कार्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ कथित गुंडों ने वकीलों के साथ मारपीट की।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया।
दो मामलों में अदालत का एक ही व्यापक संदेश
इन दोनों मामलों में अलग-अलग परिस्थितियां हैं, लेकिन अदालत के रुख से यह संकेत मिलता है कि हर प्रशासनिक या स्थानीय विवाद को सीधे संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट तक लाना उचित रास्ता नहीं माना जा सकता।
सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और निजता से जुड़े नियम हों या किसी संस्था के बाहर कथित हिंसा का मामला—इन विवादों में संबंधित प्रशासनिक और न्यायिक मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख इसी न्यायिक प्रक्रिया को प्राथमिकता देने वाला माना जा रहा है।
