संभल में मंदिर की जमीन पर मजार और 10 मकानों का विवाद, SDM कोर्ट के फैसले के बाद बुलडोजर की आहट; 53 साल पुराने रिकॉर्ड ने बदली तस्वीर

बी के झा

NSK news Ind

संभल , 8 सितंबर

संभल में जमीन का एक पुराना विवाद अब सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड का मामला नहीं रह गया है। शेर खां सराय में गाटा संख्या 103, 106 और 107 की करीब 3,350 वर्ग मीटर जमीन को लेकर SDM कोर्ट के फैसले के बाद प्रशासनिक कार्रवाई की तलवार लटक रही है। करीब एक साल चली सुनवाई के बाद अदालत ने पुराने चकबंदी और राजस्व अभिलेखों के आधार पर जमीन को आर्य समाज मंदिर और ग्राम समाज के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही मौजूदा 11 नामों को रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया गया है।

मामला इसलिए संवेदनशील है क्योंकि प्रशासन की पैमाइश में इसी जमीन पर करीब 8 से 10 पक्के मकान और एक मजार होने की बात सामने आई है। प्रशासन ने कब्जाधारियों को जमीन खाली करने की चेतावनी दी है। नोटिस और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद बेदखली तथा अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई हो सकती है।

1960 के रिकॉर्ड से शुरू हुई कहानी, 53 साल पुराने विवाद पर आया फैसला

इस विवाद की जड़ आज की राजनीति में नहीं, बल्कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में बताई जा रही है।प्रशासन के मुताबिक, 1960 के दशक की चकबंदी प्रक्रिया में गाटा संख्या 103, 106 और 107 की जमीन आर्य समाज मंदिर के नाम दर्ज थी। जमीन के प्रबंधन की जिम्मेदारी पदेन ग्राम प्रधान को दी गई थी। बाद में आरोप है कि जमीन के हिस्सों की प्लॉटिंग और बिक्री हुई तथा धीरे-धीरे वहां मकान और मजार का निर्माण हो गया।यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को नया मोड़ दिया।आर्य समाज की ओर से शिकायत के बाद मामला SDM सदर विकास चंद्र की अदालत में पहुंचा। दोनों पक्षों के दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड की जांच कराई गई।

तहसीलदार की रिपोर्ट तथा पुराने चकबंदी दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने रिकॉर्ड दुरुस्त करने का आदेश दिया।

11 नाम हटे, लेकिन असली विवाद अब शुरू होगा?

अदालती आदेश के बाद जिन लोगों के नाम रिकॉर्ड में दर्ज थे, उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रशासन का कहना है कि अब जमीन को पुराने रिकॉर्ड के अनुरूप मंदिर और ग्राम समाज के नाम दर्ज किया जाएगा।लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजस्व रिकॉर्ड बदलने के बाद जमीन पर मौजूद निर्माणों का क्या होगा?

यही वजह है कि अब सबकी नजर तहसील प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है।अगर कब्जाधारी स्वयं जमीन खाली नहीं करते हैं तो प्रशासन धारा 67 के तहत बेदखली की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। इसके बाद अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई संभव है।

मजार को लेकर मुस्लिम पक्ष का दावा क्या है?

यहीं से मामला धार्मिक संवेदनशीलता की सीमा में प्रवेश करता है।स्थानीय मौलाना मुशर्रफ हुसैन ने प्रशासन के दावे पर सवाल उठाते हुए मजार को करीब 100 से 150 वर्ष पुराना बताया है। उनका कहना है कि यहां लंबे समय से उर्स और धार्मिक गतिविधियां होती रही हैं। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि उनके बुजुर्ग इस जमीन को खरीदी हुई जमीन बताते रहे हैं।यानी एक तरफ प्रशासन के पास पुराने राजस्व और चकबंदी रिकॉर्ड हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय मुस्लिम पक्ष ऐतिहासिक धार्मिक उपयोग और पुराने दावों का हवाला दे रहा है।

अब इस विवाद का निर्णायक आधार भावनाएं नहीं, बल्कि दस्तावेज और कानून होंगे।

हिंदू पक्ष के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण?

आर्य समाज की ओर से उठाए गए इस मामले को व्यापक हिंदू संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा सकता है। इसका मूल प्रश्न यह है कि यदि किसी धार्मिक संस्था की जमीन राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी और बाद में रिकॉर्ड बदलकर निजी नाम दर्ज हुए, तो क्या पुराने अभिलेखों के आधार पर उसे वापस बहाल किया जा सकता है?

इस मामले में SDM कोर्ट ने उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड और प्रशासनिक जांच को आधार बनाया है। इसलिए हिंदू पक्ष के लिए यह फैसला केवल जमीन वापस मिलने का मामला नहीं, बल्कि पुराने राजस्व अभिलेखों की वैधानिकता की पुनर्स्थापना के तौर पर भी देखा जा रहा है।हालांकि, इस खास मामले पर प्रमुख हिंदू संगठनों या धर्माचार्यों की कोई स्वतंत्र, सत्यापित ताजा प्रतिक्रिया फिलहाल उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनके नाम से बयान जोड़ना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

मुस्लिम संगठनों के सामने भी बड़ा सवाल

मुस्लिम पक्ष के लिए चुनौती इससे अलग नहीं है।यदि किसी धार्मिक स्थल के अस्तित्व और भूमि अधिकार का दावा किया जा रहा है तो उसके समर्थन में पुराने खरीद दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड, वक्फ संबंधी दस्तावेज या अन्य वैधानिक प्रमाण सामने रखना इस विवाद को मजबूत कानूनी आधार दे सकता है।

सिर्फ यह कहना कि मजार बहुत पुरानी है, अपने आप में भूमि के स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, केवल राजस्व रिकॉर्ड में किसी पुराने नाम का होना भी हर परिस्थिति में अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं होता—पूरे रिकॉर्ड और लागू कानून को देखना जरूरी है।‌यही वह जगह है जहां कानून और आस्था के बीच संतुलन की असली परीक्षा होगी।

कानूनविदों की नजर में असली लड़ाई ‘बुलडोजर’ नहीं, प्रक्रिया की होगी

कानूनी विशेषज्ञों के लिए इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि प्रशासन किसी भी निर्माण को हटाने से पहले नोटिस, सुनवाई, बेदखली आदेश और अपील के वैधानिक अवसर जैसी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन करता है या नहीं।यानी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बुलडोजर चलेगा या नहीं।सवाल यह होना चाहिए कि अगर बुलडोजर चलता है तो क्या उसके पीछे अदालत और कानून की पूरी प्रक्रिया खड़ी होगी?

संभल जैसे संवेदनशील जिले में यही अंतर प्रशासनिक कार्रवाई और विवाद को और भड़काने वाली कार्रवाई के बीच रेखा खींच सकता है।

शिक्षाविदों का बड़ा सवाल: विरासत बचेगी या विवाद?

इतिहास और समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो पुराने धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद केवल जमीन के नहीं होते। उनके साथ स्थानीय स्मृतियां, धार्मिक परंपराएं और समुदायों की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं।इसलिए अयोध्या, काशी और संभल जैसे मामलों में प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती होती है—कानून का शासन कायम रखना और सामाजिक शांति बनाए रखना।

शिक्षाविदों के नजरिए से आदर्श स्थिति यही होगी कि पुराने दस्तावेजों का वैज्ञानिक परीक्षण हो, रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाएं और किसी भी समुदाय की धार्मिक भावना को अनावश्यक रूप से उकसाने से बचते हुए न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।

विपक्ष के लिए भी संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा

संभल पहले से ही धार्मिक और राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है। ऐसे में मंदिर की जमीन, मजार और संभावित बुलडोजर कार्रवाई का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाजी का विषय बन सकता है।विपक्ष सरकार से यह सवाल उठा सकता है कि प्रशासनिक कार्रवाई में समानता, पारदर्शिता और कानून की पूरी प्रक्रिया का पालन हो रहा है या नहीं।

वहीं सत्ता पक्ष के लिए जवाब सीधा होगा—यदि जमीन के रिकॉर्ड अदालत में जांचे गए हैं और अवैध कब्जे की पुष्टि हुई है तो कार्रवाई कानून के मुताबिक होनी चाहिए।इस खास ताजा विवाद पर प्रमुख विपक्षी नेताओं की कोई सत्यापित प्रतिक्रिया अभी उपलब्ध नहीं है।

स्थानीय लोगों की चिंता: कार्रवाई हो तो शांति भी रहे

शेर खां सराय में रहने वाले लोगों के लिए मामला सबसे ज्यादा संवेदनशील है। एक तरफ वर्षों से बने मकान और धार्मिक स्थल हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक रिकॉर्ड और अदालत का आदेश।स्थानीय स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कार्रवाई होती है तो उसका असर केवल विवादित निर्माणों तक सीमित रहेगा या आसपास के सामाजिक माहौल पर भी पड़ेगा।

प्रशासन के सामने इसलिए सिर्फ जमीन खाली कराने की चुनौती नहीं है। उसे कानून लागू करने के साथ इलाके में शांति बनाए रखने की भी परीक्षा देनी होगी।

50 करोड़ या 18 करोड़?

जमीन की कीमत पर भी अलग-अलग दावेइस मामले में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। कुछ रिपोर्टों में जमीन की कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गई है, जबकि हिन्दुस्तान ने इसी गाटा संख्या की जमीन का मूल्य करीब 18 करोड़ रुपये रिपोर्ट किया है। अलग-अलग रिपोर्टों में जमीन की अनुमानित कीमत अलग-अलग बताई गई है।आखिर जमीन की वास्तविक सरकारी सर्किल रेट/बाजार कीमत का आधिकारिक आंकड़ा ही इस सवाल का अंतिम जवाब देगा।

एनएसके न्यूज विश्लेषण: संभल में असली परीक्षा बुलडोजर की नहीं, कानून की है

संभल में यह विवाद एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने ला रहा है—किसी जमीन का मालिक कौन है, इसका फैसला इतिहास की मौखिक स्मृतियां करेंगी या दस्तावेज और कानून?

अगर प्रशासन के पास पुराने चकबंदी और राजस्व रिकॉर्ड हैं और अदालत ने उन्हें स्वीकार करते हुए रिकॉर्ड दुरुस्त करने का आदेश दिया है तो आदेश का पालन होना चाहिए।

लेकिन दूसरी तरफ, अगर किसी धार्मिक स्थल या मकान को हटाने की कार्रवाई होती है तो वह भी पूरी कानूनी प्रक्रिया, नोटिस और अपील के अधिकार के बाद ही होनी चाहिए।

क्योंकि संभल में सिर्फ एक जमीन खाली नहीं होगी—एक ऐसा विवाद खुल रहा है जिसमें आस्था, इतिहास, राजस्व रिकॉर्ड, राजनीति और कानून, पांचों एक ही जमीन पर आमने-सामने खड़े हैं।

और अब अगला अध्याय SDM कोर्ट के फैसले से नहीं, प्रशासन की अगली कार्रवाई और संभावित कानूनी चुनौती से लिखा जाएगा।

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