मोदी-जिनपिंग की 50 मिनट की मुलाकात, BRICS ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश; नई दिल्ली घोषणापत्र में ‘ग्लोबल साउथ’ की बराबर हिस्सेदारी की हुंकार, पुराने वैश्विक संस्थानों पर पीएम मोदी का सीधा सवाल; चीन के साथ रिश्तों में ‘आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और हित’ का मंत्र

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 12 सितंबर

भारत की राजधानी में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने एक साथ दो महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच करीब 50 मिनट तक चली द्विपक्षीय बैठक ने भारत-चीन संबंधों में आगे बढ़ती कूटनीतिक गर्माहट के संकेत दिए, तो दूसरी तरफ नई दिल्ली ब्रिक्स घोषणापत्र ने वैश्विक व्यवस्था के मौजूदा ढांचे पर सवाल खड़ा करते हुए विकासशील देशों की बराबर भागीदारी की जोरदार पैरवी की।

भारत मंडपम में जारी ब्रिक्स घोषणापत्र में ‘ग्लोबल साउथ’ की भूमिका को केंद्र में रखा गया।

संदेश साफ है—दुनिया बदल चुकी है, लेकिन वैश्विक संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया अब भी पुराने ढांचे में अटकी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी संदर्भ में कहा कि बदलती दुनिया को पुराने पड़ चुके संस्थानों के जरिए नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार को समय की जरूरत बताया।

BRICS का संदेश—दुनिया सिर्फ ताकतवर देशों से नहीं चलेगी

नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों ने आपसी सम्मान,

संप्रभु समानता,

एकजुटता,

लोकतंत्र,

खुलेपन,

समावेशिता,

सहयोग और आम सहमति की भावना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

घोषणापत्र में भविष्य की तकनीक और उसे नियंत्रित करने वाले नियमों के निर्माण में ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी की मांग महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसका अर्थ केवल आर्थिक भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीकों से लेकर वैश्विक शासन के नियमों तक विकासशील देशों की आवाज को निर्णायक स्थान देने की कोशिश है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्रिक्स देशों की सोच में विविधता है, लेकिन सहयोग को लेकर साझा प्रतिबद्धता भी उतनी ही स्पष्ट है। उनके मुताबिक बदलते वैश्विक ढांचे को पुराने संस्थानों के सहारे नहीं चलाया जा सकता।

एकतरफा टैरिफ पर BRICS का कड़ा रुख

नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों ने व्यापार को प्रभावित करने वाले एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई। घोषणापत्र में कहा गया कि ऐसे कदम विश्व व्यापार संगठन के नियमों की भावना के विपरीत हैं।इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव डालने वाले उपायों की भी निंदा की गई। ब्रिक्स ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अधिक संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।

यह रुख ऐसे समय आया है जब वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद, टैरिफ और आर्थिक दबाव की राजनीति लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ब्रिक्स का यह संदेश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में शक्ति संतुलन की बहस को और तेज कर सकता है।

संघर्ष नहीं, संवाद से समाधान पर जोर

घोषणापत्र में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्षों को रोकने के लिए अधिक कूटनीतिक जुड़ाव की जरूरत बताई गई। ब्रिक्स देशों ने संघर्षों की मूल वजहों को समझने और उन्हें दूर करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही।अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। समूह ने ऐसे बहुपक्षीय दृष्टिकोण की वकालत की जिसमें प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर अलग-अलग देशों के नजरिए को स्थान मिले।

यानी ब्रिक्स का संदेश यह है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान दबाव और टकराव से नहीं, बल्कि संवाद और सहयोग से निकाला जाना चाहिए।

मोदी-जिनपिंग मुलाकात—मतभेदों को विवाद नहीं बनने देने का संदेश

इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच करीब 50 मिनट तक चली बातचीत पर भी पूरी दुनिया की नजर रही।विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई पिछली मुलाकात के बाद से भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में हुई लगातार प्रगति का स्वागत किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और चीन को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि दोनों देशों के बीच मतभेदों को विवाद में तब्दील नहीं होने देना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में तीन ‘आपसी’ सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बताया—आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित।यह संदेश सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों को स्थिरता की दिशा में ले जाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

मोदी ने जिनपिंग का किया गर्मजोशी से स्वागत

शी जिनपिंग से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका भारत में स्वागत करते हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन के सकारात्मक सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।प्रधानमंत्री ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान चीन से मिले समर्थन और सहयोग के लिए आभार जताया और कहा कि अब दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा का अवसर है।यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब भारत और चीन दोनों ही एशिया की राजनीति तथा वैश्विक शक्ति-संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए दोनों नेताओं की बातचीत को केवल द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है।

नई दिल्ली से निकला बड़ा संदेश

नई दिल्ली घोषणापत्र में विस्तारित ब्रिक्स के तहत राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच सहयोग के तीनों स्तंभों को मजबूत करने का संकल्प दोहराया गया। ब्रिक्स देशों ने शांति, अधिक प्रतिनिधित्व वाली और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, मजबूत बहुपक्षीय तंत्र, सतत विकास और समावेशी विकास को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जताई।

भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ‘आउटरीच/ब्रिक्स प्लस डायलॉग’ सत्र की मेजबानी भी की। इसके लिए ब्रिक्स देशों ने भारत की सराहना की और इसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा एकजुटता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

कुल मिलाकर नई दिल्ली से निकली तस्वीर साफ है—भारत ब्रिक्स को केवल आर्थिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के तौर पर आगे बढ़ाना चाहता है।

मोदी-जिनपिंग की 50 मिनट की बातचीत और घोषणापत्र में ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी पर जोर,

दोनों मिलकर संकेत देते हैं कि नई दिल्ली वैश्विक राजनीति में संवाद भी चाहती है और निर्णय प्रक्रिया में अपना अधिक प्रभावी स्थान भी।

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