नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी की पहली ‘अग्निपरीक्षा’, क्यों प्रतिष्ठा की सीट बन गई? ममता के उम्मीदवार का नाम वापस, कांग्रेस प्रत्याशी गिरफ्तार; अब हर चाल पर टिकी निगाहें, ‘मुख्यमंत्री के सामने सत्ता के बाद जनता की अगली मुहर की चुनौती’

बी के झा

NSK news Ind

कोलकाता/नंदीग्राम, 19 सितंबर

पश्चिम बंगाल की राजनीति में कुछ सीटें सिर्फ चुनावी नक्शे पर दर्ज विधानसभा क्षेत्र नहीं होतीं, बल्कि वे राजनीतिक संघर्ष की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे रहती हैं। नंदीग्राम ऐसी ही सीट है। 2007 के भूमि आंदोलन से लेकर 2021 में ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के आमने-सामने आने तक नंदीग्राम बंगाल की सत्ता के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतीकों में रहा है।अब 6 अक्टूबर को होने वाला उपचुनाव एक बार फिर इस सीट को राष्ट्रीय सुर्खियों में ले आया है। खास बात यह है कि इस बार नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ रहे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक प्रभाव की अगली परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

अधिकारी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद उन्होंने भवानीपुर सीट बरकरार रखी और नंदीग्राम खाली कर दिया। इसी कारण यहां उपचुनाव हो रहा है।नंदीग्राम की जमीन से निकली थी शुभेंदु की बड़ी राजनीतिक कहानी

नंदीग्राम और शुभेंदु अधिकारी का रिश्ता चुनावी टिकट से कहीं पुराना है। 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने नंदीग्राम को बंगाल की राजनीति का राष्ट्रीय प्रतीक बना दिया था। इसी दौर में शुभेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं में उभरे और बाद में ममता बनर्जी के बेहद करीबी नेताओं में शामिल हुए।2016 में उन्होंने नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता। लेकिन 2020 में भाजपा में जाने के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक टकराव 2021 में हुआ, जब ममता बनर्जी ने खुद नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया।नतीजा बेहद करीबी रहा। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक शुभेंदु अधिकारी को 1,10,764 वोट मिले, जबकि ममता बनर्जी को 1,08,808 वोट मिले। अंतर सिर्फ 1,956 वोट रहा। यही चुनाव शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक पहचान का निर्णायक अध्याय बना।

अब सवाल यह है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद क्या नंदीग्राम की जनता एक बार फिर उनके राजनीतिक प्रभाव के साथ खड़ी दिखाई देगी?

भाजपा ने खेला ‘भावनात्मक’ दांव, हसीरानी रथ को मैदान में उतारा

भाजपा ने नंदीग्राम से हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। वह शुभेंदु अधिकारी के दिवंगत निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की मां हैं। चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद यह परिवार राजनीतिक चर्चा में आया था और अधिकारी ने उनके परिवार के साथ खड़े रहने की बात कही थी। हसीरानी रथ खुद पंचायत और पंचायत समिति स्तर की राजनीति का अनुभव रखती हैं।भाजपा के लिए उम्मीदवार का चयन केवल संगठनात्मक गणित नहीं, बल्कि स्थानीय भावनाओं से जुड़ा राजनीतिक संदेश भी है।लेकिन इस रणनीति की वास्तविक परीक्षा मतदान केंद्रों पर होगी—क्या स्थानीय मतदाता इस पारिवारिक और भावनात्मक अपील को राजनीतिक समर्थन में बदलते हैं या उनके लिए स्थानीय विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण रहते हैं?

ममता खेमे को पहला झटका—संचिता प्रधान ने नामांकन वापस लिया

उपचुनाव से ठीक पहले घटनाक्रम ने अचानक नाटकीय मोड़ ले लिया।ममता बनर्जी खेमे की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया। रिपोर्टों के मुताबिक नामांकन वापसी से पहले उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी। इसके बाद उनके नामांकन वापस लेने की खबर आई।नामांकन वापस लेने के कारणों पर संचिता प्रधान डे की ओर से कोई स्पष्ट सार्वजनिक कारण सामने नहीं आया है।यहीं से राजनीतिक अटकलों का दौर शुरू हुआ।

विपक्षी खेमे ने इसे राजनीतिक दबाव से जोड़ा, जबकि उपलब्ध रिपोर्टों में नाम वापसी के पीछे कोई निर्णायक कारण स्थापित नहीं हुआ है।इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि नाम वापसी किस दबाव या कारण से हुई। इतना जरूर है कि इससे नंदीग्राम का चुनावी समीकरण अचानक बदल गया।

ममता ने कांग्रेस के मिलन प्रधान को दिया समर्थन

संचिता प्रधान डे के मैदान से हटने के बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। ममता ने इसे विपक्षी एकजुटता और INDIA गठबंधन को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया।यानी जिस सीट पर ममता खेमे का अपना उम्मीदवार था, वहां अब ममता समर्थक वोटों को कांग्रेस प्रत्याशी के पीछे एकजुट करने की कोशिश होगी।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

समर्थन के कुछ घंटे बाद कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी

ममता के समर्थन की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की एक पुराने मामले में गिरफ्तारी की खबर सामने आई।पुलिस सूत्रों के मुताबिक मामला 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े पुराने हत्या मामले का है और उनके खिलाफ लंबित वारंट था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि गिरफ्तारी का उपचुनाव से संबंध नहीं है और पुराने लंबित वारंट की समीक्षा के दौरान कार्रवाई हुई। पुलिस ने यह भी कहा कि उनके पास उस समय कोई न्यायिक सुरक्षा नहीं थी।दूसरी ओर कांग्रेस और ममता खेमे ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक कार्रवाई बताया।

कांग्रेस ने इसे विपक्ष को चुनावी मैदान से हटाने की कोशिश के रूप में पेश किया। यानी एक ही घटना की दो बिल्कुल अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने हैं। कानूनी रूप से गिरफ्तारी का मतलब दोष सिद्ध होना नहीं है। मिलन प्रधान के खिलाफ मामले का अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।

विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती

ममता बनर्जी के लिए नंदीग्राम की चुनौती केवल भाजपा को रोकने की नहीं है।2021 में नंदीग्राम ने ममता और शुभेंदु के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखा था। अब 2026 के उपचुनाव में ममता खेमे का उम्मीदवार बदल चुका है, कांग्रेस को समर्थन दिया गया है और तृणमूल की संगठनात्मक स्थिति भी पहले जैसी नहीं है।इसके अलावा चुनाव आयोग ने तृणमूल के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए हैं। ममता खेमे को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और नया चुनाव चिह्न दिया गया है, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम मिला है। इससे मतदाताओं के सामने पार्टी पहचान का प्रश्न भी चुनावी चर्चा का हिस्सा बन गया है।

स्थानीय मतदाता क्या देख रहा है?

नंदीग्राम के मतदाताओं के लिए यह चुनाव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच चुनावी चर्चा में विकास, सड़क, रोजगार, कृषि, उद्योग, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे। साथ ही नंदीग्राम की राजनीतिक पहचान और 2007 के आंदोलन की विरासत भी चुनावी विमर्श से पूरी तरह अलग नहीं हो सकती।

शिक्षाविदों का एक दृष्टिकोण यह है कि लंबे समय से राजनीतिक प्रतीक रही सीटों पर भी नई पीढ़ी के मतदाता अपने वर्तमान आर्थिक और सामाजिक अनुभवों के आधार पर मुद्दों को तौलते हैं। इसलिए केवल पुराने राजनीतिक इतिहास के भरोसे चुनावी समीकरण समझना पर्याप्त नहीं होगा।स्थानीय मतदाता के सामने मूल सवाल कुछ ऐसा है—‘2007 और 2021 की लड़ाई अपनी जगह, लेकिन आज हमारे गांव और परिवार के लिए कौन-सा मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है? ‘यही सवाल नतीजे की दिशा को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल हो सकता है।

शुभेंदु अधिकारी के लिए यह चुनाव क्यों बड़ा?

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम के साथ भवानीपुर से भी जीत दर्ज की थी और मुख्यमंत्री बनने के बाद भवानीपुर सीट अपने पास रखी। इसलिए नंदीग्राम में भाजपा ने उपचुनाव के लिए उम्मीदवार उतारा है।राजनीतिक रूप से नंदीग्राम उनके लिए तीन कारणों से महत्वपूर्ण है।

पहला—व्यक्तिगत राजनीतिक इतिहास।यही उनकी राजनीतिक पहचान का बड़ा आधार रहा है।

दूसरा—ममता बनर्जी से सीधा मुकाबला।2021 की जीत ने उन्हें बंगाल की राजनीति में अलग पहचान दी।

तीसरा—मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला बड़ा उपचुनावी परीक्षण। इसलिए नंदीग्राम का प्रदर्शन सरकार के शुरुआती राजनीतिक संदेश से जोड़ा जाना स्वाभाविक है, हालांकि एक उपचुनाव से पूरे राज्य में सरकार के प्रति जनमत का पूर्ण निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

रेजीनगर भी साथ-साथ महत्वपूर्ण

6 अक्टूबर को नंदीग्राम के साथ रेजीनगर में भी विधानसभा उपचुनाव होगा। दोनों सीटों पर मतदान और 9 अक्टूबर को मतगणना होगी।रेजीनगर में भी मुख्यमंत्री के सामने एक अलग राजनीतिक समीकरण है। इसलिए भाजपा के लिए दोनों सीटों के नतीजे संगठन की शुरुआती चुनावी दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण होंगे।

विपक्ष का आरोप, सरकार का पक्ष—बीच में चुनाव आयोग की भूमिका

मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस और ममता खेमे ने सरकार पर राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि कार्रवाई पुराने लंबित वारंट के आधार पर हुई और इसका उपचुनाव से संबंध नहीं है।ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग और न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता का अंतिम आकलन मतदान प्रक्रिया, प्रशासनिक कार्रवाई, उम्मीदवारों के अधिकार और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

एनएसके विश्लेषण: नंदीग्राम में इस बार सिर्फ वोट नहीं, राजनीतिक संदेश भी दर्ज होगा

नंदीग्राम की कहानी बार-बार करवट बदल रही है।एक समय यही जमीन ममता बनर्जी की राजनीतिक उभार की पहचान बनी। फिर इसी सीट ने शुभेंदु अधिकारी को ममता के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया।

अब मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकारी इसी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ का अगला अध्याय लिखने की कोशिश कर रहे हैं।

ममता खेमे की उम्मीदवार का नामांकन वापस होना, कांग्रेस को समर्थन मिलना और उसके बाद कांग्रेस उम्मीदवार की पुराने मामले में गिरफ्तारी—इन घटनाओं ने चुनाव को असाधारण रूप से संवेदनशील बना दिया है। लेकिन अंततः फैसला नंदीग्राम के मतदाताओं को करना है।

क्या वे शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व और भाजपा की सरकार के कामकाज को देखते हैं?

क्या 2021 की राजनीतिक स्मृति अभी भी प्रभावशाली है?

क्या ममता बनर्जी का कांग्रेस को समर्थन विपक्षी वोटों को एक दिशा दे पाएगा?

क्या तृणमूल के भीतर का विभाजन चुनावी गणित को प्रभावित करेगा?

और क्या स्थानीय मुद्दे बड़े राजनीतिक प्रतीकों पर भारी पड़ेंगे?

इन सवालों के जवाब 6 अक्टूबर की ईवीएम में दर्ज होंगे और 9 अक्टूबर को तस्वीर सामने आएगी।

नंदीग्राम इसलिए शुभेंदु अधिकारी की ‘प्रतिष्ठा की सीट’ जरूर बन गई है, लेकिन असली प्रतिष्ठा का फैसला किसी नेता के दावे से नहीं—मतदाता के वोट से होगा।

बी. के. झा,

एनएसके

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