बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 24 सितंबर
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवाल अब एक नए और बेहद गंभीर कानूनी मोड़ पर पहुंच गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से अनुमति मांगी है।
24 सितंबर को भेजे गए पत्र में सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए फैसलों में तय संवैधानिक सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ। उन्होंने Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 15(1)(b) और धारा 2(c) तथा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही से संबंधित 1975 के नियमों का हवाला दिया है।हालांकि, यहां सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यही है कि यह फिलहाल एक अधिवक्ता की शिकायत और अनुमति का अनुरोध है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
यानी CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना सिद्ध नहीं हुई है और न ही सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर अभी कोई आदेश दिया है।
विवाद की जड़ में 14 कथित आपत्तियां
इस पूरे मामले की शुरुआत 23 सितंबर को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों या आदेशों को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं।रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया, उनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, नए मतदाताओं के लिए Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच, चुनावी सॉफ्टवेयर और SIR से जुड़े प्रशासनिक फैसले शामिल थे।
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा कि निर्णय उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए।यही कथित घटनाक्रम अब उस बड़े संवैधानिक सवाल का आधार बन गया है—क्या बहुसदस्यीय चुनाव आयोग को सामूहिक संस्था की तरह चलाया जा रहा था?
CEC के खिलाफ वकील का आरोप क्या है?
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह का आरोप है कि अगर बहुसदस्यीय आयोग के नाम पर ऐसे निर्णय या सूचनाएं जारी की गईं जिनमें अन्य चुनाव आयुक्तों को प्रभावी रूप से दरकिनार किया गया, तो यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय उस व्यवस्था के विपरीत हो सकता है जिसमें आयोग को सामूहिक संवैधानिक संस्था के रूप में देखा गया है।
सिंह ने खास तौर पर टीएन शेषन बनाम भारत सरकार के फैसले का हवाला दिया है।
टीएन शेषन केस: CEC चेयरमैन है, ‘सर्वेसर्वा’ नहीं
बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 1995 का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। टीएन शेषन के दौर में CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों को लेकर गंभीर विवाद हुआ था।सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय आयोग की संवैधानिक व्यवस्था को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया था कि CEC आयोग का चेयरमैन है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह आयोग के बाकी सदस्यों से ऊपर एकतरफा निर्णय लेने वाला अधिकारी बन जाता है।यानी CEC ‘first among equals’ यानी बराबरों में प्रथम की भूमिका में है, जबकि चुनाव आयोग स्वयं सामूहिक संवैधानिक संस्था है।
यही न्यायिक सिद्धांत वर्तमान विवाद में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन रहा है।
दूसरा बड़ा संदर्भ: 2023 का अनूप बरनवाल फैसला
अधिवक्ता ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया है। 2 मार्च 2023 के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विस्तार से विचार किया था। अदालत ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया था।फैसले में अदालत ने चुनाव आयोग को लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी संस्था के रूप में देखा और कहा कि चुनावों की निष्पक्षता तथा नागरिकों के अधिकारों के संदर्भ में आयोग की स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हालांकि अनूप बरनवाल फैसला मुख्य रूप से CEC की नियुक्ति की संवैधानिक व्यवस्था और आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ा था, इसलिए इसे सीधे मौजूदा प्रशासनिक विवाद पर लागू करने से पहले उसके वास्तविक कानूनी संदर्भ को देखना जरूरी होगा।
अनुच्छेद 141 का सवाल कितना महत्वपूर्ण?
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 141 का भी हवाला दिया है। इसका मूल सिद्धांत यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होता है।लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ अवमानना साबित करने के लिए केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं होता कि किसी फैसले की व्याख्या अलग तरीके से की जा सकती है।
जानबूझकर न्यायालय के आदेश की अवहेलना का कानूनी प्रश्न अलग और अधिक गंभीर स्तर का होता है।इसलिए इस मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
ECI का जवाब: ‘सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए’
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने रिपोर्टों में लगाए गए आरोपों की अपनी व्याख्या सामने रखी है।ECI का कहना है कि चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी मसौदा निर्णय या प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना अपने आप में अंतिम निर्णय पर असहमति नहीं माना जा सकता। आयोग के अनुसार SIR सहित पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से हुए हैं।
यानी आयोग के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल और सुझाव प्रक्रिया का हिस्सा थे, लेकिन अंतिम निर्णयों में किसी प्रकार का संस्थागत विभाजन नहीं था।यहीं से मामला और पेचीदा हो जाता है।
एक तरफ रिपोर्ट में 14 मौकों पर आपत्तियों की बात है, दूसरी तरफ ECI कह रहा है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मत थे।इन दोनों तथ्यों के बीच की वास्तविक प्रशासनिक प्रक्रिया ही आने वाले कानूनी विमर्श का केंद्र बन सकती है।
मामला अब राजनीतिक से ज्यादा संवैधानिक क्यों?
चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष पहले से ही SIR और मतदाता सूची के मुद्दे पर केंद्र सरकार और आयोग पर सवाल उठाता रहा है। अब कथित अंदरूनी आपत्तियों की रिपोर्ट ने उस राजनीतिक बहस को संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ दिया है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
दूसरी ओर भाजपा ने कथित मतभेदों को आयोग के भीतर लोकतांत्रिक विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि अगर चुनाव आयुक्तों के बीच विचार-विमर्श और मतभेद होते हैं, तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।अर्थात राजनीतिक पक्षों की व्याख्या बिल्कुल अलग है।
अब गेंद अटॉर्नी जनरल के पाले में
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने जिस प्रक्रिया के तहत आवेदन दिया है, उसमें अटॉर्नी जनरल की सहमति महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए ऐसी अनुमति आवश्यक होती है।इसलिए फिलहाल घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव यह होगा कि अटॉर्नी जनरल इस अनुरोध पर क्या रुख अपनाते हैं।यदि अनुमति मिलती है, तो उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया का अपना स्वतंत्र परीक्षण होगा।
यदि अनुमति नहीं मिलती, तो भी यह पत्र चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली पर चल रही बहस को और तेज कर सकता है।
असली सवाल: ‘फैसला किसका था?
‘इस पूरे विवाद का सबसे धारदार प्रश्न शायद यही है—अगर तीन सदस्यीय संवैधानिक आयोग है, तो किसी निर्णय की वास्तविक प्रक्रिया क्या थी?
क्या वह केवल प्रशासनिक मसौदा था?
क्या उस पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति की थी?
क्या आपत्तियों पर विचार हुआ?
क्या अंतिम निर्णय तीनों की सहमति से हुआ?
और यदि हुआ, तो उस पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड क्या कहता है?
इन सवालों के जवाब आरोपों या राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायिक परीक्षण से निकलेंगे।
एन एस के विश्लेषण
चुनाव आयोग में मतभेद होना अपने आप में असंवैधानिकता का प्रमाण नहीं है। बल्कि एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में असहमति दर्ज होना संस्थागत विचार-विमर्श का स्वाभाविक हिस्सा भी हो सकता है।लेकिन दूसरी तरफ, यदि किसी निर्णय के बारे में यह आरोप सामने आता है कि आयोग के किसी सदस्य को उसकी जानकारी या स्वीकृति के बिना निर्णय की जानकारी दी गई, तो सवाल केवल राजनीतिक नहीं रह जाता।
तब प्रक्रिया, अधिकार और पारदर्शिता तीनों की जांच जरूरी हो जाती है।यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मांगी गई अवमानना की अनुमति को फिलहाल अपराध सिद्ध होने की खबर की तरह नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की संवैधानिक कार्यप्रणाली को लेकर उठे एक गंभीर कानूनी सवाल के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में बहुसदस्यीय आयोग की सामूहिक प्रकृति पर जोर है, दूसरी तरफ ECI कह रहा है कि उसके सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।
अब असली परीक्षा यही होगी कि दस्तावेज क्या कहते हैं, अटॉर्नी जनरल क्या निर्णय लेते हैं और यदि मामला अदालत तक पहुंचता है तो सुप्रीम कोर्ट इस पूरे घटनाक्रम को किस संवैधानिक कसौटी पर परखता है।
बी. के. झा
एन एस के
