बी के झा
NSK news Ind

लखनऊ, नई दिल्ली, 29 सितंबर
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की 10 सीटों का चुनाव प्रदेश की सियासत में नया तापमान पैदा कर रहा है।
16 अक्टूबर को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए मंगलवार, 29 सितंबर से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। उम्मीदवार 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। मतदान 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन शाम 5 बजे मतगणना होगी।
राज्यसभा की इन 10 सीटों का चुनाव केवल संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व तय करने तक सीमित नहीं है। यह मुकाबला 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में दलों की रणनीतिक ताकत, गठबंधन प्रबंधन और विधायकों को एकजुट रखने की क्षमता की भी परीक्षा माना जा रहा है। यही वजह है कि नामांकन की शुरुआत के साथ ही लखनऊ में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
37 वोट का गणित तय करेगा राज्यसभा की तस्वीर
403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में फिलहाल छह सीटें रिक्त हैं। ऐसे में प्रभावी संख्या 397 विधायकों की है। मौजूदा चुनावी गणित में एक राज्यसभा सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट का कोटा माना जा रहा है।यही 37 वोट का आंकड़ा पूरे चुनाव की धुरी बन गया है। 37 वोट से एक सीट, 74 वोट से दो सीट और 111 वोट से तीन सीटों का गणित बनता है।
लेकिन 10 सीटों के इस चुनाव में दिलचस्पी उन सीटों पर है जहां दलों के पास जरूरी संख्या से कम वोट बचते हैं और वहां अतिरिक्त समर्थन, छोटे दलों के विधायक तथा क्रॉस-वोटिंग की संभावनाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
सात सीटों तक NDA का गणित मजबूत
मौजूदा संख्या बल के मुताबिक भाजपा के पास 256 विधायक हैं। उसके सहयोगी अपना दल (एस), आरएलडी, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के विधायकों को मिलाकर NDA की संख्या 289 बताई जा रही है। इसके अलावा जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायकों तथा कुछ अन्य समर्थन को जोड़ने पर यह संख्या 294 तक पहुंचने की चर्चा है।
37 वोट के हिसाब से सात सीटों के लिए 259 वोट चाहिए। इस लिहाज से 294 के आंकड़े पर NDA के पास सात सीटों के बाद भी अतिरिक्त वोट बचते हैं। लेकिन आठवीं सीट के लिए 296 वोट चाहिए।
यानी 294 के संभावित आंकड़े के साथ आठवीं सीट के लिए महज दो अतिरिक्त वोट जुटाने की जरूरत होगी।यहीं से चुनाव का असली सियासी पेंच शुरू होता है।अगर NDA आठवां उम्मीदवार मैदान में उतारता है तो उसे अतिरिक्त दो वोटों के लिए दूसरे दलों या निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल करना होगा।
वहीं दूसरी ओर विपक्षी खेमे के लिए भी यह मौका होगा कि वह अपने अतिरिक्त वोटों को सुरक्षित रखे और सत्ता पक्ष के उम्मीदवार के सामने चुनौती खड़ी करे।सपा के पास दो सीटों का गणित, तीसरी सीट के लिए चाहिए अतिरिक्त ताकत
समाजवादी पार्टी के पास 101 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के दो विधायक हैं। दोनों को मिलाकर सपा-कांग्रेस खेमे की संख्या 103 बताई जा रही है। दो राज्यसभा सीटों के लिए 74 वोट चाहिए। इस हिसाब से दो सीटों के बाद सपा-कांग्रेस के पास 29 अतिरिक्त वोट बचेंगे। लेकिन तीसरी सीट के लिए कुल 111 वोट चाहिए। यानी तीसरी सीट के लिए आठ अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे।
यही वजह है कि सपा के लिए राज्यसभा चुनाव केवल अपने दो उम्मीदवारों की जीत तक सीमित नहीं रहेगा। अगर पार्टी तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो उसे आठ अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना होगा। ऐसे में छोटे दलों और अलग-अलग खेमों के विधायकों की भूमिका अचानक महत्वपूर्ण हो सकती है।
लखनऊ में विधायकों की मौजूदगी पर नजर
राज्यसभा चुनाव में एक-एक वोट की अहमियत को देखते हुए सपा ने अपने विधायकों को लखनऊ में रहने को कहा है। पार्टी के लिए चुनौती केवल संख्या जुटाने की नहीं, बल्कि अपने विधायकों को एकजुट रखने की भी है। पिछले राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था। इसलिए इस बार भी मतदान के दिन तक हर विधायक की भूमिका पर राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।
भाजपा ने भी राज्यसभा चुनाव को लेकर कोर कमेटी की बैठक की है। पार्टी के उम्मीदवारों के नामों को लेकर मंथन जारी है और केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी के बाद तस्वीर स्पष्ट होने की उम्मीद है। भाजपा की ओर से 25 नामों का पैनल केंद्रीय नेतृत्व को भेजे जाने की रिपोर्ट भी सामने आई है।
10वीं सीट पर टिकी निगाहें
10 सीटों के चुनाव में सात सीटों पर NDA और दो सीटों पर सपा-कांग्रेस के मौजूदा संख्या बल का असर साफ दिखाई देता है। ऐसे में 10वीं सीट सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बनकर उभर रही है।
NDA के सामने आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोट जुटाने की चुनौती है, जबकि सपा के सामने तीसरी सीट के लिए आठ अतिरिक्त वोटों का सवाल है। यदि दोनों खेमे अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं तो छोटे दलों और असंबद्ध विधायकों का रुख चुनाव की दिशा पर असर डाल सकता है।
राज्यसभा चुनाव में केवल प्रथम वरीयता वोट ही चर्चा का विषय नहीं होंगे। उम्मीदवारों की संख्या और मतदान के बाद वोटों के हस्तांतरण की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए नामांकन की अंतिम तस्वीर सामने आने के बाद ही मुकाबले की वास्तविक जटिलता और अधिक स्पष्ट होगी।
बसपा के सामने राज्यसभा प्रतिनिधित्व खत्म होने का संकट
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू बहुजन समाज पार्टी से भी जुड़ा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में फिलहाल बसपा का कोई विधायक नहीं है। ऐसे में राज्यसभा की मौजूदा बसपा सीट को बनाए रखना उसके लिए संख्या बल के लिहाज से संभव नहीं दिखता।
बसपा के राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। इस तरह राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल भाजपा और सपा के बीच सीटों के बंटवारे का मामला नहीं होगा, बल्कि उत्तर प्रदेश से उच्च सदन में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधित्व की तस्वीर भी बदल सकता है।
राज्यसभा के बाद 2027 की सियासी जमीन
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से अलग करके देखना मुश्किल है। 16 अक्टूबर के बाद 23 अक्टूबर को विधान परिषद की सीटों के लिए चुनाव भी प्रस्तावित हैं। इसके बाद राजनीतिक दलों का पूरा फोकस विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर और तेज होने की संभावना है।
यही कारण है कि राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन से लेकर विधायकों की लामबंदी तक हर कदम को राजनीतिक दल बेहद सावधानी से उठा रहे हैं।
एक तरफ NDA अपने अतिरिक्त वोटों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है तो दूसरी तरफ सपा तीसरी सीट के लिए जरूरी आठ वोटों का रास्ता तलाश सकती है।
फिलहाल यूपी की सियासी शतरंज में 37 वोट सबसे बड़ा आंकड़ा है।
सात सीटों तक NDA का गणित मजबूत है, दो सीटों पर सपा-कांग्रेस का संख्या बल पर्याप्त है और इसके बाद बचती है वह सीट, जिसके लिए आने वाले दिनों में समर्थन, रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन का पूरा खेल सामने आ सकता है।
एन एस के डेस्क
