बी के झा
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नई दिल्ली/लखनऊ/पटना, 29 सितंबर
राज्यसभा चुनाव की सियासी गर्मी के बीच भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश और बिहार के विधान परिषद चुनावों को लेकर भी अपने पत्ते खोल दिए हैं।
भाजपा ने दोनों राज्यों में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल 10 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। इनमें बिहार की चार और उत्तर प्रदेश की छह सीटें शामिल हैं। उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही दोनों राज्यों में विधान परिषद चुनाव की राजनीतिक तस्वीर अब और स्पष्ट होने लगी है।खास बात यह है कि भाजपा ने कई सीटों पर अनुभव और मौजूदा संगठनात्मक पकड़ को तरजीह दी है।
बिहार में मौजूदा विधान पार्षद नवल किशोर यादव और एनके यादव को दोबारा मैदान में उतारा गया है, जबकि उत्तर प्रदेश में भी पार्टी ने कुछ अनुभवी चेहरों पर भरोसा जताया है।
23 अक्टूबर को होने वाला यह चुनाव महज विधान परिषद की कुछ सीटों का चुनाव नहीं है। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच राजनीतिक दलों की पकड़ की परीक्षा के रूप में भी इसे देखा जा रहा है।
बिहार में भाजपा के चार चेहरे, NDA का सीट शेयरिंग फॉर्मूला साफ
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों—चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों—के लिए 23 अक्टूबर को मतदान होना है। भाजपा ने अपने हिस्से की चार सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।पार्टी ने पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक से डॉ. एनके यादव, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नरेंद्र प्रसाद सिंह को उम्मीदवार बनाया है।इनमें नवल किशोर यादव और एनके यादव मौजूदा विधान पार्षद हैं।
यानी भाजपा ने इन दोनों सीटों पर नए चेहरे की बजाय अपने मौजूदा प्रतिनिधियों के प्रदर्शन और संगठनात्मक नेटवर्क को आगे बढ़ाने का फैसला किया है।
दरभंगा स्नातक सीट पर सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक सीट पर नरेंद्र प्रसाद सिंह को उतारना भी चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नरेंद्र प्रसाद सिंह इससे पहले भी इस क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार रह चुके हैं।
NDA में चार-चार का फॉर्मूला
बिहार में इस बार भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के बीच विधान परिषद की इन आठ सीटों का बंटवारा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। दोनों दलों ने चार-चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं।जदयू ने पटना स्नातक से नीरज कुमार, तिरहुत स्नातक से अभिषेक झा, सारण शिक्षक से आनंद पुष्कर और दरभंगा शिक्षक से घनश्याम राय को उम्मीदवार बनाया है।इस तरह NDA की तस्वीर फिलहाल आठ सीटों पर स्पष्ट है।
हालांकि उम्मीदवारों की घोषणा के बाद भी स्थानीय स्तर पर समीकरण, व्यक्तिगत प्रभाव और मतदाताओं की पसंद मुकाबले को प्रभावित करने वाले कारक रहेंगे।
पटना स्नातक सीट पर मुकाबला हुआ दिलचस्प
बिहार में पटना स्नातक सीट विशेष रूप से चर्चा में है। यहां जदयू ने अपने मौजूदा उम्मीदवार नीरज कुमार पर भरोसा जताया है। लेकिन मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने जन सुराज के उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के समर्थन का ऐलान किया है। उन्होंने उनके लिए प्रचार करने की बात भी कही है। जदयू ने इसे पार्टी अनुशासन के संदर्भ में देखा है।इस घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया है कि गठबंधन के भीतर उम्मीदवारों की घोषणा के बाद भी स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह सरल नहीं रहने वाले।
यानी कागज पर सीटों का बंटवारा जितना साफ दिखाई देता है, मैदान में मुकाबला उतना ही बहुस्तरीय हो सकता है।
यूपी में भाजपा ने छह सीटों पर उतारे उम्मीदवार
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों—पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों—के लिए 23 अक्टूबर को मतदान होगा। भाजपा ने अब सभी छह सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।
भाजपा की सूची में शामिल प्रमुख नाम हैं—
वाराणसी स्नातक — केदार नाथ सिंह
मेरठ स्नातक — दिनेश गोयल
इलाहाबाद-झांसी स्नातक — अशोक कुमार राठौर
वाराणसी शिक्षक — डॉ. प्रमोद मिश्रा
आगरा शिक्षक — इंजीनियर हरि किशोर तिवारी
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक — ध्रुव त्रिपाठी
इन नामों के साथ भाजपा ने शिक्षक और स्नातक दोनों वर्गों में अपना चुनावी आधार मजबूत करने की कोशिश की है।
यूपी में 11 सीटें, 2027 से पहले बड़ा राजनीतिक संकेत
उत्तर प्रदेश के इन चुनावों को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब राजनीतिक दलों के एजेंडे में प्रमुखता से आ चुका है।विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता विधानसभा के आम मतदाताओं से अलग होते हैं। ऐसे में इन सीटों के चुनाव में राजनीतिक दलों के संगठन, शिक्षक समुदाय के बीच संपर्क, स्नातक मतदाताओं से संवाद और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वर्तमान में भाजपा नेतृत्व वाला NDA विधान परिषद में मजबूत स्थिति में है, जबकि सपा के लिए इन चुनावों का महत्व इसलिए भी है कि उसके विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बनाए रखने के लिए सदस्य संख्या महत्वपूर्ण है।
इन 11 सीटों में सपा के तीन मौजूदा सदस्यों की सीटें भी दांव पर हैं।
सपा के बाद भाजपा ने भी खोली रणनीति
सपा ने पहले ही इन चुनावों को लेकर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे। अब भाजपा की सूची आने के बाद मुकाबले की तस्वीर और स्पष्ट हो गई है। कांग्रेस समेत अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी से कई निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला बहुकोणीय होने की संभावना है।ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती केवल उम्मीदवार उतारने की नहीं बल्कि अपने संगठन को इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में सक्रिय करने की भी होगी।
वहीं विपक्षी दलों के सामने अपने-अपने मतदाताओं को एकजुट रखने और उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान कराने की चुनौती रहेगी।
शिक्षक और स्नातक मतदाता क्यों महत्वपूर्ण?
विधान परिषद के इन चुनावों की एक अलग प्रकृति है। यहां मतदाता संख्या विधानसभा चुनावों की तुलना में बहुत कम होती है, लेकिन मतदाताओं की सामाजिक और पेशागत संरचना अलग होती है।शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की सेवा शर्तें, वेतन, पदोन्नति, पुरानी पेंशन, स्थानांतरण और विद्यालयी ढांचे जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा में प्रमुखता पा सकते हैं।
वहीं स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, बेरोजगारी, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और युवाओं से जुड़े मुद्दे अधिक प्रमुख हो सकते हैं।इसलिए इन चुनावों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और अपने निर्वाचन क्षेत्र से निरंतर संपर्क का महत्व बढ़ जाता है।
राज्यसभा के बाद MLC की परीक्षा
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। इसके ठीक एक सप्ताह बाद 23 अक्टूबर को विधान परिषद की 11 सीटों के लिए मतदान होगा।
यानी अक्टूबर उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए चुनावी रूप से बेहद सक्रिय महीना रहने वाला है।
पहले राज्यसभा में विधायकों की संख्या का गणित राजनीतिक दलों की रणनीति की परीक्षा लेगा और उसके बाद विधान परिषद चुनाव में शिक्षक तथा स्नातक मतदाता राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की किस्मत तय करेंगे।
बिहार में भी 23 अक्टूबर को विधान परिषद की आठ सीटों पर मतदान होगा और 27 अक्टूबर को मतगणना प्रस्तावित है।
भाजपा की सूची में छिपा बड़ा संदेश
भाजपा की घोषित सूची को केवल उम्मीदवारों की सूची के रूप में देखने के बजाय पार्टी की चुनावी रणनीति के संकेत के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
बिहार में दो मौजूदा MLC को दोबारा टिकट देकर निरंतरता का संकेत दिया गया है। वहीं यूपी में शिक्षक और स्नातक दोनों वर्गों में अलग-अलग क्षेत्रों से उम्मीदवार उतारकर पार्टी ने अपना संगठनात्मक अभियान तेज करने का संकेत दिया है।
हालांकि अंतिम परिणाम मतदाताओं के मतदान और निर्वाचन क्षेत्रवार राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा।
एन एस के विश्लेषण
राज्यसभा की बिसात पर विधायकों का गणित है तो विधान परिषद की इस चुनावी शतरंज में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की नब्ज सबसे बड़ा हथियार होगी।
भाजपा ने यूपी और बिहार में अपने उम्मीदवार घोषित कर चुनावी तस्वीर को स्पष्ट कर दिया है। बिहार में NDA के भीतर भाजपा और जदयू का चार-चार सीटों का फॉर्मूला सामने है, जबकि यूपी में भाजपा ने छह सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
अब असली परीक्षा उम्मीदवारों की होगी—कौन अपने निर्वाचन क्षेत्र में संगठन को कितना सक्रिय करता है, कौन मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाता है और कौन स्थानीय मुद्दों को चुनावी एजेंडे में बदल पाता है।
खासकर उत्तर प्रदेश में यह चुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलों के लिए एक राजनीतिक संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन विधान परिषद चुनाव के नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों चुनावों का मतदाता वर्ग और चुनावी ढांचा अलग है।
फिलहाल इतना तय है कि अक्टूबर में यूपी-बिहार की सियासत में सिर्फ सदन की सीटें नहीं बदलेंगी, बल्कि पार्टियों के संगठनात्मक दावे भी कसौटी पर होंगे।
बी. के. झा, एन एस के
