‘पहले अपना नेम टैग लगाओ…’, पत्रकारों की पहचान पर दिल्ली पुलिस की एडवाइजरी, दीपके ने कसा तंज

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर

राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज को लेकर दिल्ली पुलिस की नई एडवाइजरी ने पत्रकारिता, पुलिसिंग और जवाबदेही के बीच चल रही बहस को और तेज कर दिया है। पुलिस ने प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों से वैध पहचान पत्र साथ रखने और उसे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने की अपील की है।

इसी एडवाइजरी पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने तंज कसते हुए कहा—“पहले अपना नेम टैग लगाओ…”दीपके ने दिल्ली पुलिस की ओर से जारी पोस्ट को साझा करते हुए यह टिप्पणी की।

उनका इशारा उन सवालों की ओर माना जा रहा है, जो हालिया प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट न होने को लेकर उठे हैं।

पुलिस ने कहा- ‘स्टोरी मायने रखती है, तरीका भी’

दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर जारी एडवाइजरी में कहा कि “स्टोरी मायने रखती है, लेकिन उसे हासिल करने का तरीका भी मायने रखता है।”पुलिस ने पत्रकारों को सलाह दी है कि प्रदर्शन की कवरेज के लिए जाते समय वे अपने संस्थान का वैध पहचान पत्र साथ रखें। PIB या DIP का वैध मान्यता कार्ड रखने वाले पत्रकार उसे भी साथ रख सकते हैं।

एडवाइजरी के मुताबिक, पत्रकारों को पहचान पत्र इस तरह प्रदर्शित करना चाहिए कि मौके पर मौजूद कानून-व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मी उन्हें आसानी से पत्रकार के रूप में पहचान सकें। साथ ही पुलिस ने कहा है कि पत्रकारों की मौजूदगी या गतिविधि से पुलिस कार्रवाई और जवानों की आवाजाही प्रभावित नहीं होनी चाहिए।तनावपूर्ण स्थिति में पत्रकारों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने और ऐसी जगह से रिपोर्टिंग करने की सलाह दी गई है जहां उनकी पहचान प्रदर्शनकारियों से अलग स्पष्ट हो सके।

लेकिन दीपके ने पलट दिया सवाल

पुलिस की एडवाइजरी सामने आते ही अभिजीत दीपके ने इसे लेकर सोशल मीडिया पर सीधा सवाल उछाल दिया—“पहले अपना नेम टैग लगाओ…”यही एक लाइन अब पूरी बहस का केंद्र बन गई है।सवाल यह है कि जब पुलिस पत्रकारों से अपनी पहचान स्पष्ट रखने की अपेक्षा कर रही है, तो क्या कानून-व्यवस्था संभाल रहे प्रत्येक पुलिसकर्मी की पहचान भी मौके पर उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हालिया प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान कुछ मीडिया रिपोर्टों में पुलिसकर्मियों के नेम टैग दिखाई नहीं देने का मुद्दा उठाया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट किया कि जंतर-मंतर पर तैनात कुछ पुलिसकर्मियों ने सोशल मीडिया पर पहचान और लक्ष्य बनाए जाने की आशंका के चलते नेम टैग नहीं पहने थे।

तीन महिला पत्रकारों की शिकायत के बाद बढ़ा विवाद

दिल्ली पुलिस की यह एडवाइजरी ऐसे समय आई है जब 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास हुए प्रदर्शन की कवरेज के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने कुछ पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए थे।पुलिस ने शिकायतें मिलने की पुष्टि की है। मामले की जांच क्राइम ब्रांच कर रही है। शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए गए हैं और CCTV फुटेज समेत उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जा रही है।इन आरोपों के बाद पत्रकारों और अन्य लोगों ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन कर FIR और कार्रवाई की मांग की।

5 अक्टूबर को प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम में पत्रकारों समेत कई लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई। पुलिस ने इसके लिए लागू निषेधाज्ञा और प्रदर्शनकारियों के निर्देशों का पालन नहीं करने का हवाला दिया।

मामला सिर्फ ID कार्ड का नहीं, जवाबदेही का भी

कानूनविदों के नजरिए से पुलिस और पत्रकार—दोनों की भूमिकाएं अलग हैं। पत्रकार को अपनी पेशेवर पहचान स्पष्ट रखने से पुलिस को भीड़ में मीडिया कर्मियों की पहचान करने में सुविधा हो सकती है। लेकिन दूसरी तरफ पुलिस कार्रवाई भी ऐसी होनी चाहिए जिसमें जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित कर्मियों की पहचान स्पष्ट रूप से स्थापित की जा सके।

यहीं से ID कार्ड बनाम नेम टैग की बहस पैदा होती है।

पत्रकार की पहचान इसलिए जरूरी है कि उसे प्रदर्शनकारी से अलग पहचाना जा सके। पुलिसकर्मी की पहचान इसलिए जरूरी हो सकती है कि किसी कार्रवाई, शिकायत या कथित दुर्व्यवहार की स्थिति में जवाबदेही तय की जा सके।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पुलिस की जिम्मेदारी

शिक्षाविदों और मीडिया अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों के नजरिए से प्रदर्शन स्थल लोकतांत्रिक गतिविधियों के संवेदनशील स्थान होते हैं। यहां पत्रकारों को पुलिस कार्रवाई में बाधा न डालते हुए स्वतंत्र रिपोर्टिंग का अवसर मिलना चाहिए।दूसरी तरफ पुलिस का दायित्व है कि वह भीड़ नियंत्रण, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखे।दोनों के बीच संतुलन का रास्ता स्पष्ट नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही से निकलता है।

पुलिस का पक्ष भी महत्वपूर्ण

इस विवाद में दिल्ली पुलिस का पक्ष भी सामने आया है। पुलिस ने कहा है कि पत्रकारों के लिए जारी निर्देशों का उद्देश्य उन्हें रिपोर्टिंग से रोकना नहीं, बल्कि तनावपूर्ण परिस्थितियों में पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना तथा पुलिस संचालन में व्यवधान से बचना है।

महिला पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोपों के मामले में भी पुलिस ने जांच प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी है। ऐसे में आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

एक एडवाइजरी ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए

दिल्ली पुलिस की एडवाइजरी अपने आप में पत्रकारों के लिए सुरक्षा और पहचान संबंधी दिशा-निर्देशों का दस्तावेज है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसकी टाइमिंग ने इसे व्यापक बहस का विषय बना दिया है।

एक तरफ पुलिस कह रही है—पत्रकार अपनी पहचान साफ रखें।

दूसरी तरफ सवाल उठ रहा है—कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान कितनी साफ है?

और यहीं अभिजीत दीपके का छोटा-सा तंज बड़ी बहस में बदल गया है।

निष्कर्ष

लोकतंत्र में प्रदर्शनकारी को विरोध का अधिकार है, पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व है और पत्रकार को घटनास्थल से सच जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी। इन तीनों के बीच किसी एक की भूमिका कमजोर होती है तो विवाद पैदा होता है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि पत्रकार ने अपना ID कार्ड पहना या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि प्रदर्शन स्थल पर हर पक्ष की पहचान, अधिकार और जवाबदेही कितनी स्पष्ट है।

दीपके का सवाल राजनीतिक तंज हो सकता है, लेकिन इसके पीछे उठने वाला व्यापक सवाल गंभीर है—“जब पत्रकार से पहचान दिखाने को कहा जा रहा है, तो क्या जवाबदेही निभाने वाले हर तंत्र की पहचान भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए?”

अब इस सवाल का जवाब सिर्फ सोशल मीडिया की बहस से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, स्पष्ट नियम और समान जवाबदेही से मिलना चाहिए।

बी. के. झा, NSK

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