बी के झा
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पटना, 6 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में चुनावी विवाद अब सड़क से लेकर संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तीफे की मांग को लेकर महागठबंधन ने राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है।
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विपक्ष अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सीधे राजनीतिक संघर्ष के मैदान में उतरने की तैयारी में है।महागठबंधन की रणनीति के मुताबिक 7 अक्टूबर को बिहार के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर आक्रोश मार्च निकाला जाएगा।
इसके अगले दिन यानी 8 अक्टूबर को जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन होगा। इसी दिन पटना में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लोकभवन की ओर मार्च निकाला जाएगा।
दिल्ली में भी विपक्षी सांसद चुनाव आयोग के समक्ष लोकतंत्र बचाओ मार्च निकालने की तैयारी में हैं।यानी विपक्ष ने आंदोलन को महज पटना तक सीमित रखने के बजाय प्रखंड से राजधानी तक बहुस्तरीय राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति तैयार की है।
तेजस्वी का आरोप- ‘वोट की चोरी’ हुई
महागठबंधन की बैठक के बाद तेजस्वी यादव ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले SIR के जरिए सही मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हुई।तेजस्वी ने आरोप लगाया कि SIR की शुरुआत बिहार से हुई और इसके पीछे केंद्र सरकार तथा भाजपा का दबाव था। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि विपक्ष लोकतंत्र को बचाने के लिए आंदोलन जारी रखेगा।
तेजस्वी का यह अभियान केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। विपक्ष इसे अब ‘लोकतंत्र बनाम चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता’ की बड़ी राजनीतिक लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है।
मुकेश सहनी ने भी साधा निशाना
विकासशील इंसान पार्टी के संस्थापक मुकेश सहनी ने भी चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र और संविधान गरीब, पिछड़े और दलितों के अधिकारों का सबसे बड़ा आधार हैं। इसलिए चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए तथा संवैधानिक संस्थाओं को किसी दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए।सहनी ने बिहार के आंदोलनकारी इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि जब भी लोकतंत्र और अधिकारों की लड़ाई हुई है, बिहार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अब सवाल- आंदोलन कितना बड़ा राजनीतिक दबाव बनाएगा?
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। विपक्ष के सामने चुनौती सिर्फ भीड़ जुटाने की नहीं, बल्कि अपने आरोपों को ठोस दस्तावेज, मतदाता सूची के उदाहरण और कानूनी तथ्यों के साथ जनता के सामने साबित करने की है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर महागठबंधन 7 और 8 अक्टूबर के आंदोलन को बूथ और पंचायत स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंचा पाता है तो SIR का मुद्दा केवल राजनीतिक दलों का विवाद न रहकर आम मतदाता की चिंता बन सकता है।लेकिन दूसरी तरफ, यदि आंदोलन केवल राजनीतिक भाषणों और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहा तो सत्ता पक्ष इसे चुनावी हार-जीत के बाद विपक्ष की राजनीतिक निराशा के रूप में पेश कर सकता है।
कानूनविदों की नजर में असली सवाल संस्था की विश्वसनीयता का
कानूनी दृष्टि से किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और चुनाव आयोग के निर्णयों पर राजनीतिक असहमति अपने आप में किसी निर्णय को अवैध सिद्ध नहीं करती। किसी भी गंभीर आरोप के लिए दस्तावेजी प्रमाण, वैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।यही कारण है कि मौजूदा विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ दायर याचिकाओं और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों पर शीर्ष अदालत में सुनवाई चल रही है तथा अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगे हैं।राजनीतिक आरोपों का अंतिम फैसला सड़क पर नहीं, बल्कि संविधान, कानून, दस्तावेज और न्यायिक परीक्षण की कसौटी पर होना है।
शिक्षाविदों और लोकतंत्र पर नजर रखने वाले संगठनों के लिए भी बड़ा सवाल
शिक्षाविदों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नजर रखने वाले नागरिक समूहों के लिए विवाद का सबसे अहम प्रश्न यह है कि मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।एक तरफ चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को अद्यतन करना और अपात्र या दोहराए गए नामों को हटाना चुनावी प्रक्रिया की शुचिता के लिए जरूरी है।
आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर SIR-2026 के तहत मतदाता सूची देखने और नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध है।दूसरी तरफ विपक्ष का सवाल है कि यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम हटता है तो उसे पर्याप्त सूचना, आपत्ति और सुधार का प्रभावी अवसर कैसे मिलेगा?
यही वह बिंदु है जहां चुनावी शुचिता और मतदाता अधिकार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष का पक्ष भी अहम
विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने कई आरोपों को खारिज किया है। हालिया विवाद में आयोग ने राहुल गांधी के Form-6 से जुड़े आरोपों को भ्रामक बताते हुए कहा कि संबंधित संशोधन आयोग ने सर्वसम्मति से मंजूर किया था।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर रिकॉर्ड और दलीलों की न्यायिक जांच जारी है।भाजपा ने भी विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि देश की संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले पर सुनवाई किया जाना खुद लोकतांत्रिक संस्थागत व्यवस्था का उदाहरण है।
यानी सत्ता पक्ष का मूल तर्क है कि राजनीतिक आरोपों को संस्थागत प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती
बिहार में 7 और 8 अक्टूबर के कार्यक्रमों ने जिला प्रशासन और पुलिस के सामने भी कानून-व्यवस्था की चुनौती खड़ी कर दी है। प्रखंडों से लेकर जिला मुख्यालयों और पटना तक प्रदर्शन प्रस्तावित हैं। ऐसे में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि राजनीतिक विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
लोकतांत्रिक विरोध किसी भी स्वस्थ व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहें और आम नागरिकों की आवाजाही बाधित न हो—यह प्रशासन और राजनीतिक दल दोनों की जिम्मेदारी होगी।
15 अक्टूबर के बाद राष्ट्रपति तक पहुंचेगा मामला
तेजस्वी यादव ने संकेत दिया है कि आंदोलन का अगला चरण भी तैयार है। विपक्ष 15 अक्टूबर के बाद राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने की तैयारी में है। इसका अर्थ साफ है कि महागठबंधन इस मुद्दे को कुछ दिनों के विरोध प्रदर्शन तक सीमित रखने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक संदेश क्या है?
दरअसल, यह लड़ाई अब केवल ‘ज्ञानेश कुमार हटाओ’ के नारे तक सीमित नहीं रह गई है। विपक्ष इसे आगामी चुनावी राजनीति, मतदाता अधिकार और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जोड़ रहा है।
महागठबंधन के लिए यह आंदोलन दोहरा अवसर है—एक तरफ वह अपने कार्यकर्ताओं को चुनावी मुद्दे पर लामबंद कर सकता है, तो दूसरी तरफ जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि वह मतदाता सूची और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की लड़ाई लड़ रहा है।
लेकिन सत्ता पक्ष के लिए भी यह चुनौती अवसर में बदल सकती है। यदि सरकार और चुनाव आयोग आरोपों का जवाब आंकड़ों, दस्तावेजों और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए देते हैं तो विपक्ष का राजनीतिक नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
बिहार में 7 और 8 अक्टूबर का आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक राजनीतिक मार्च नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता, मतदाता सूची की शुचिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को लेकर चल रही बड़ी बहस का बिहार संस्करण है।
अब असली परीक्षा दोनों पक्षों की है—विपक्ष की यह कि वह अपने आरोपों को कितने ठोस प्रमाणों के साथ जनता के सामने रखता है, और चुनाव आयोग तथा सत्ता पक्ष की यह कि वे उठ रहे सवालों का कितना पारदर्शी और तथ्यपूर्ण जवाब देते हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव केवल वोट डालने का नाम नहीं है।
मतदाता का नाम सूची में होना, उसका वोट सुरक्षित रहना और चुनावी प्रक्रिया पर उसका भरोसा कायम रहना—लोकतंत्र की पूरी इमारत की बुनियाद है।
बी. के. झा, NSK
