बी. के. झा
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नई दिल्ली,10 अक्टूबर
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राजनीतिक विरोध, वैचारिक टकराव और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों के केंद्र में है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर पहले से जारी तनाव के बीच हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी चौधरी ने लट्ठ लेकर जंतर-मंतर पहुंचने का ऐलान किया है। सोशल मीडिया पर जारी उनके वीडियो संदेश में इस्तेमाल की गई भाषा ने संभावित टकराव की आशंका को और गंभीर बना दिया है।
उन्होंने अपने समर्थकों से वहां पहुंचने की अपील करते हुए कहा कि उनका संगठन कथित सनातन विरोधियों को सबक सिखाकर ही लौटेगा।यह घटनाक्रम केवल दो संगठनों के बीच वैचारिक विरोध तक सीमित नहीं रह जाता। जब किसी सार्वजनिक प्रदर्शन के जवाब में दूसरा समूह लाठी लेकर पहुंचने और विरोधियों का ‘दिमाग ठीक करने’ की बात करता है, तो सवाल उठता है कि लोकतांत्रिक असहमति की सीमा कहां समाप्त होती है और कानून अपने हाथ में लेने की कोशिश कहां से शुरू होती है।
‘लट्ठ लेकर जंतर-मंतर पहुंचेंगे’, पिंकी चौधरी का वीडियो संदेश
हिंदू रक्षा दल के प्रमुख पिंकी चौधरी ने एक्स पर साझा किए गए वीडियो संदेश में घोषणा की कि उनका संगठन जंतर-मंतर पहुंचेगा। उन्होंने दावा किया कि देशभर से हिंदुत्ववादी लोग वहां जुटेंगे। वीडियो में उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रस्तावित प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके मुताबिक भगवा और सनातन का अपमान करने वालों को जवाब दिया जाएगा।चौधरी ने अपने संदेश में भारतीय जनता पार्टी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं का शोषण किया जाता है और चेतावनी दी कि सरकारें उन्हें जेल में बंद करा दें, तब भी वे हिंदू समाज के सम्मान के लिए सड़कों पर उतरेंगे।
उन्होंने पुलिसकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार का उल्लेख करते हुए भी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया। हालांकि, वीडियो में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित घटनाओं का पूरा संदर्भ अलग से जांचे जाने की जरूरत है।पिंकी चौधरी के इस बयान के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या प्रस्तावित जुटान शांतिपूर्ण विरोध तक सीमित रहेगा या अलग-अलग विचारधाराओं के समर्थकों के आमने-सामने आने से स्थिति बिगड़ सकती है।
केवल किसी संगठन के पहुंचने की घोषणा से हिंसा होना तय नहीं हो जाता, लेकिन हथियारनुमा वस्तु लेकर पहुंचने और विरोधियों को सबक सिखाने जैसी भाषा प्रशासन के लिए सतर्कता का विषय जरूर है।
सनातन के सम्मान की लड़ाई या सड़क पर शक्ति प्रदर्शन?
पिंकी चौधरी ने अपने बयान को सनातन धर्म और भगवा के सम्मान से जोड़कर पेश किया है। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान लोकतांत्रिक समाज में महत्वपूर्ण है। लेकिन किसी विचार, संगठन या राजनीतिक गतिविधि से असहमति होने पर उसे धमकी के जरिए दबाने की कोशिश एक अलग प्रश्न खड़ा करती है।किसी संगठन को अपने विचार रखने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और धार्मिक भावनाओं के सम्मान की मांग करने का अधिकार है। यही अधिकार उन लोगों को भी प्राप्त है जिनके विचार उससे अलग हैं। लोकतंत्र की कसौटी यह नहीं है कि किस पक्ष के समर्थक अधिक संख्या में जुटते हैं, बल्कि यह है कि विरोध के बावजूद कानून और दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाता है या नहीं।इस प्रकरण में भी जांच का विषय यह होना चाहिए कि क्या किसी पक्ष ने कानून का उल्लंघन किया है,
क्या किसी को धमकाया गया है और क्या सार्वजनिक शांति को वास्तविक खतरा पैदा करने वाली गतिविधि हुई है। आरोपों और आशंकाओं के आधार पर किसी संगठन या व्यक्ति को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
कानूनविदों के सामने बड़ा सवाल: धमकी और शांतिपूर्ण विरोध की सीमा क्या है?
कानूनी दृष्टि से किसी प्रदर्शन में शामिल होना, अपनी विचारधारा का प्रचार करना और सरकार की नीतियों का विरोध करना अपने आप में अपराध नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। हालांकि, ये अधिकार कानून के तहत लागू उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से हिंसा के लिए उकसाता है, किसी को आपराधिक धमकी देता है या वास्तव में हिंसक गतिविधि में शामिल होता है, तो परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित कानून लागू हो सकते हैं।
केवल उत्तेजक बयान और कानूनी रूप से दंडनीय धमकी के बीच अंतर करना भी जरूरी है। इसके लिए बयान के सटीक शब्दों, संदर्भ, आशय और संभावित प्रभाव का आकलन करना होगा।
इस मामले में पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि वे दोनों पक्षों पर समान मानदंड लागू करें। यदि किसी प्रदर्शन की अनुमति से संबंधित शर्तें हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित किया जाए। किसी भी पक्ष को दूसरे पक्ष पर हमला करने, डराने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं मिल सकती।
कानून का शासन तभी विश्वसनीय बनता है, जब कार्रवाई किसी संगठन की धार्मिक पहचान, राजनीतिक निकटता या वैचारिक विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून के आधार पर हो।
शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी आत्ममंथन का समय
शिक्षा और सामाजिक जीवन से जुड़े लोगों के सामने यह सवाल है कि राजनीतिक असहमति को संवाद में बदलने की संस्कृति कैसे मजबूत की जाए। यदि हर विरोध का उत्तर दूसरे विरोध से और हर आरोप का जवाब धमकी से दिया जाएगा, तो सार्वजनिक बहस का स्थान धीरे-धीरे शक्ति प्रदर्शन लेने लगेगा।
शिक्षाविदों के नजरिए से धार्मिक पहचान, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक जिम्मेदारियों पर संवाद जरूरी है। विद्यार्थियों और युवाओं तक यह संदेश पहुंचना चाहिए कि किसी विचारधारा का समर्थन करना और उसके नाम पर दूसरे नागरिक को डराना दो अलग बातें हैं।
समाजसेवी संस्थाओं तथा शांति और सद्भाव के लिए काम करने वाले संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वे दोनों पक्षों से संयम बरतने, किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहने और विवादों को कानूनी तथा लोकतांत्रिक तरीकों से सुलझाने की अपील कर सकते हैं। हालांकि, किसी विशिष्ट संस्था ने इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया दी हो, तो उसका नाम और बयान सत्यापन के बाद ही प्रकाशित किया जाना चाहिए।
विपक्षी दलों की भूमिका: कानून सबके लिए एक समान हो
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक दलों के सामने भी जवाबदेही का प्रश्न खड़ा किया है। विपक्षी दलों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और कानून के समान अनुपालन की मांग करें। लेकिन किसी भी दल की वास्तविक प्रतिक्रिया उसके आधिकारिक बयान या अधिकृत प्रतिनिधि की टिप्पणी के आधार पर ही दर्ज की जानी चाहिए।इसी तरह, सत्तारूढ़ दलों और प्रशासन से भी यह अपेक्षा है कि वे राजनीतिक या वैचारिक निकटता से परे जाकर सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। यदि किसी पक्ष के समर्थकों द्वारा हिंसा की धमकी दी जाती है या कानून तोड़ने का प्रयास होता है, तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को केवल उनके विचारों के कारण निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।इस पूरे प्रकरण में किसी राजनीतिक दल की चुप्पी को समर्थन और किसी बयान को दोषसिद्धि मान लेना भी उचित नहीं होगा। जवाबदेही का आकलन प्रमाणित तथ्यों और वास्तविक कार्रवाइयों से होना चाहिए।
प्रशासन के सामने चुनौती: टकराव रोकना, अधिकारों की रक्षा करना
जंतर-मंतर पर अलग-अलग विचारधाराओं के समर्थकों के जुटने की घोषणा के बीच दिल्ली पुलिस के सामने दोहरी चुनौती है। उसे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा करनी है।
प्रशासन के लिए जरूरी होगा कि वह किसी संभावित आमने-सामने की स्थिति को रोकने के लिए उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करे, जरूरत के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था करे और किसी भी तरह की हिंसा या धमकी पर निष्पक्ष कार्रवाई करे। यदि किसी पक्ष के पास दूसरे पक्ष से संबंधित कोई शिकायत है, तो उसका समाधान कानून के माध्यम से होना चाहिए, न कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन के जरिए।
किसी भी प्रकार की अफवाह, भड़काऊ संदेश या अपुष्ट वीडियो को आगे बढ़ाने से भी बचना चाहिए। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाले संदेश तनाव बढ़ा सकते हैं, जबकि वास्तविक स्थिति का आकलन प्रशासनिक जानकारी और सत्यापित तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
आस्था का सम्मान जरूरी, कानून से ऊपर कोई नहीं
पिंकी चौधरी के लट्ठ लेकर जंतर-मंतर पहुंचने के ऐलान ने सीजेपी के प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम को एक नया मोड़ दिया है। उनके समर्थकों का जुटना अपने आप में हिंसा का प्रमाण नहीं है, लेकिन विरोधियों को सबक सिखाने की भाषा को हल्के में भी नहीं लिया जाना चाहिए।
इसकी गंभीरता का आकलन वास्तविक परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।
सनातन धर्म का सम्मान हो या किसी दूसरे विचार की अभिव्यक्ति—दोनों का प्रश्न लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक जिम्मेदारियों के दायरे में ही सुलझाया जाना चाहिए।
किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप हो या किसी समूह को धमकाने का मामला, दोनों में निष्पक्ष जांच और कानूनसम्मत कार्रवाई आवश्यक है।
लोकतंत्र में लाठी की ताकत नहीं, कानून की ताकत सर्वोपरि होती है।
जंतर-मंतर पर असली परीक्षा यही होगी कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग अपनी बात कह सकें, लेकिन किसी को डराने, धमकाने या हिंसा करने की छूट किसी को न मिले।
