बी. के. झा
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लखनऊ, 11 अक्टूबर
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस अपने संगठन को नई ऊर्जा देने की कोशिश कर रही है।
लेकिन रविवार, 11 अक्टूबर को लखनऊ स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जो दृश्य सामने आया, उसने पार्टी के सामने एक असहज राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—जिस संगठन को सत्ता पक्ष के खिलाफ जनता को एकजुट करना है, क्या वह पहले अपने भीतर की नाराजगी और गुटीय टकराव को संभाल पाएगा?
नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा ‘मोना’ और कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच कहासुनी, गाली-गलौज, धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल चलने की खबर सामने आई। घटना के वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के समर्थकों और कांग्रेस नेता ममता चौधरी से जुड़े पक्ष के बीच हुआ। पार्टी के भीतर उभरे इस टकराव ने नए नेतृत्व के सामने शुरुआती दौर में ही संगठनात्मक अनुशासन की चुनौती खड़ी कर दी है।
पदभार समारोह में स्वागत की जगह विवाद ने खींचा ध्यान
रविवार को कांग्रेस मुख्यालय में नए प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा और कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद के पदभार ग्रहण कार्यक्रम के लिए कार्यकर्ता और नेता जुटे थे। कार्यक्रम से संगठन के पुनर्गठन, कार्यकर्ताओं में उत्साह और आगामी चुनावों की तैयारी का संदेश जाने की उम्मीद थी। लेकिन इसी दौरान रास्ता खाली कराने और अजय राय के आगमन को लेकर कहासुनी शुरू होने की खबर सामने आई।रिपोर्टों के अनुसार, अजय राय के समर्थकों और ममता चौधरी से जुड़े लोगों के बीच शुरू हुआ विवाद जल्द ही तीखी बहस में बदल गया। देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया और कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की तथा जूते-चप्पल चलने की स्थिति बन गई।
घटना के बाद अजय राय ने वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी और इमरान मसूद सहित पार्टी के नेताओं के समक्ष अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने ममता चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और कहा कि इस तरह के व्यवहार से पार्टी की छवि प्रभावित होती है। वरिष्ठ नेताओं ने हस्तक्षेप कर स्थिति को संभालने की कोशिश की। कुछ मीडिया रिपोर्टों में अजय राय के धरने पर बैठने और बाद में मान-मनौव्वल के बाद हटने की भी जानकारी दी गई है।
हालांकि, विवाद के सभी पहलुओं और संबंधित पक्षों के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इस मामले में अंतिम अनुशासनात्मक निर्णय की स्थिति भी स्पष्ट होना बाकी है।
भाजपा का हमला—‘मोहब्बत की दुकान में जूतम-पैजार’
कांग्रेस मुख्यालय में हुए हंगामे को भाजपा ने राजनीतिक हमला करने का अवसर बना लिया। उत्तर प्रदेश भाजपा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर घटना का वीडियो साझा करते हुए तंज कसा—‘मोहब्बत की दुकान में जूतम-पैजार।’ पार्टी की पोस्ट में अजय राय और नए प्रदेश नेतृत्व के बीच विवाद को लेकर भी कटाक्ष किया गया।भाजपा की इस प्रतिक्रिया का राजनीतिक संदेश साफ है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लंबे समय से ‘मोहब्बत की दुकान’ की अवधारणा के जरिए राजनीतिक सद्भाव और नफरत के विरोध का संदेश देते रहे हैं। ऐसे में पार्टी कार्यालय के भीतर कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प को भाजपा ने कांग्रेस के दावों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर पूरे संगठन या उसके राजनीतिक विचारों का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। फिर भी सार्वजनिक जीवन में अनुशासन और आचरण की कसौटी पर राजनीतिक दलों को जवाब देना पड़ता है। कांग्रेस के लिए भी यह जरूरी होगा कि वह आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर विवाद के कारणों की जांच करे और संगठन के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करे।
प्रेम शुक्ला का तंज, विपक्षी राजनीति पर भी उठाए सवाल
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने इस घटना पर तंज कसते हुए कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अभी तो जूतम-पैजार और कपड़ा फाड़ने जैसी स्थिति का दृश्य सामने आया है, आगे पार्टी के भीतर और क्या देखने को मिलेगा, यह देखना होगा।
उन्होंने कांग्रेस की राजनीतिक संभावनाओं पर भी कटाक्ष किया और आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में पार्टी की स्थिति को लेकर टिप्पणी की। उनके बयान को भाजपा की राजनीतिक आलोचना के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि चुनावी नतीजों का कोई प्रमाणित आकलन।चुनाव में किसी पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, यह मतदाताओं के फैसले, स्थानीय समीकरणों, उम्मीदवारों, गठबंधनों और चुनावी मुद्दों सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए कांग्रेस के लिए वास्तविक चुनौती इस घटना से उपजे राजनीतिक नुकसान की चर्चा भर नहीं, बल्कि अपने संगठन को जमीन पर कितना प्रभावी और भरोसेमंद बनाया जा सकता है, यह साबित करना भी है।
राजनीतिक विश्लेषण: गुटबाजी का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों बनता है चुनौती?

राजनीतिक विश्लेषण के नजरिये से देखें तो किसी पार्टी में मतभेद होना असामान्य नहीं है। बड़े राजनीतिक संगठनों में नेतृत्व, जिम्मेदारियों, पदों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर असहमति सामने आ सकती है। लेकिन जब मतभेद सार्वजनिक मंच पर हाथापाई और अपशब्दों तक पहुंचते हैं, तब विवाद केवल कुछ कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहता। वह संगठन की निर्णय-प्रक्रिया, अनुशासन और नेतृत्व की क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस के सामने यहां तीन प्रमुख चुनौतियां दिखाई देती हैं।
पहली, नए नेतृत्व को संगठन में स्पष्ट जिम्मेदारियां और संवाद की व्यवस्था स्थापित करनी होगी, ताकि कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद हिंसक टकराव का रूप न लें।
दूसरी, पुराने नेतृत्व और नए पदाधिकारियों के बीच समन्वय जरूरी होगा। संगठन में बदलाव के दौरान जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण स्वाभाविक है, लेकिन यदि कार्यकर्ताओं को सम्मान, भागीदारी और संवाद का भरोसा नहीं मिलता, तो असंतोष सार्वजनिक रूप ले सकता है।
तीसरी, पार्टी को अपने राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक व्यवहार के बीच तालमेल बनाना होगा। जनता के सामने लोकतंत्र, सामाजिक सद्भाव और राजनीतिक जवाबदेही की बात करने वाले दलों से उनके अपने कार्यालयों में भी संयम और अनुशासन की अपेक्षा की जाती है।
ये किसी एक दल तक सीमित सवाल नहीं हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में हर संगठन की विश्वसनीयता उसके सार्वजनिक बयानों के साथ-साथ उसके आंतरिक आचरण से भी बनती है।
शिक्षाविदों और कानूनविदों के नजरिये से क्या हैं अहम सवाल?
शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं के व्यापक दृष्टिकोण से यह घटना राजनीतिक कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण, संवाद और असहमति के लोकतांत्रिक तरीकों पर विचार करने का अवसर भी देती है। राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाले मंच नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करने वाली संस्थाएं भी हैं। उनके कार्यकर्ताओं के व्यवहार से राजनीति में भाग लेने वाले युवाओं और आम नागरिकों की धारणा प्रभावित हो सकती है।
कानूनी दृष्टि से भी किसी सार्वजनिक कार्यालय में हुई धक्का-मुक्की या कथित मारपीट की जांच तथ्यों, उपलब्ध वीडियो, गवाहों और संबंधित व्यक्तियों के बयानों के आधार पर ही होनी चाहिए। केवल वीडियो के छोटे हिस्से या सोशल मीडिया पर किए गए दावों से किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। यदि किसी पक्ष को मारपीट या अन्य कानून-विरुद्ध आचरण की शिकायत है, तो संबंधित तथ्यों की निष्पक्ष जांच और विधिसम्मत प्रक्रिया ही उचित रास्ता है।
नेतृत्व और विपक्षी एकता पर बहस
इस घटनाक्रम के बीच एक स्थानीय वरिष्ठ मुस्लिम मौलाना ने विपक्षी राजनीति को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने राहुल गांधी को सलाह दी कि कांग्रेस को अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम से संभावित तालमेल पर विचार करना चाहिए। उनका तर्क था कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय के बिना भाजपा को चुनौती देना कठिन हो सकता है।यह संबंधित मौलाना का राजनीतिक विचार है, न कि पूरे मुस्लिम समाज की सामूहिक राय।
किसी समुदाय के मतदाताओं को एकसमान राजनीतिक पसंद वाला समूह मानना भी सही नहीं होगा। उनकी प्राथमिकताएं क्षेत्र, उम्मीदवार, स्थानीय समस्याओं, सामाजिक परिस्थितियों और दलों के प्रदर्शन के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के बीच संबंधों का प्रश्न भी इसी व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है। गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा के साथ-साथ सीटों का बंटवारा, साझा कार्यक्रम, नेतृत्व की भूमिका और जमीनी संगठन की मजबूती जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण होंगे। केवल किसी एक समुदाय के वोट या किसी एक नेता की लोकप्रियता के आधार पर चुनावी समीकरणों का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
2027 की राह: विरोधियों पर हमला या अपने संगठन की मरम्मत?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर उसे बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं, महिलाओं की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अपने मुद्दों को जनता तक पहुंचाना है। दूसरी ओर उसे अपने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच भरोसा तथा समन्वय मजबूत करना होगा।
आराधना मिश्रा ‘मोना’ और इमरान मसूद के सामने शुरुआती चुनौती यही है कि वे इस विवाद को महज एक दिन की अप्रिय घटना मानकर छोड़ते हैं या संगठनात्मक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं। निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्षों को सुनना, अनुशासन संबंधी नियमों का समान रूप से पालन और कार्यकर्ताओं के लिए प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन राजनीतिक विरोध और आंतरिक असहमति का समाधान संवाद तथा संगठनात्मक प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि सार्वजनिक टकराव से।
निष्कर्षतः, लखनऊ कांग्रेस मुख्यालय की घटना केवल जूते-चप्पल चलने या नेताओं के बीच कहासुनी की खबर नहीं है। यह नए प्रदेश नेतृत्व के सामने संगठनात्मक अनुशासन, आंतरिक संवाद और राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।
भाजपा ने इसे कांग्रेस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया है, जबकि कांग्रेस के लिए अब महत्वपूर्ण यह होगा कि वह विवाद का निष्पक्ष समाधान कर अपने राजनीतिक एजेंडे और संगठनात्मक एकजुटता को किस तरह आगे बढ़ाती है। उत्तर प्रदेश की जनता के सामने किसी भी दल की असली परीक्षा उसके नारों से अधिक उसके काम, व्यवहार और जवाबदेही से होगी।
