बी के झा
पटना, 8 अगस्त
बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल अब केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक दिशा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। पार्टी ने राज्य स्तर से लेकर जिला, प्रखंड और पंचायत स्तर तक की संगठनात्मक इकाइयों तथा विभिन्न प्रकोष्ठों को भंग कर दिया है। इस फैसले के बाद राजद के भीतर नई राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है।इसी बीच लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की ओर से पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को दी गई सलाह ने इस संगठनात्मक बदलाव को और अधिक राजनीतिक अर्थ दे दिया है।
रोहिणी ने नए संगठन में कट्टर लालूवादियों, लंबे समय से पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं, संगठन की समझ रखने वाले नेताओं और जमीन से जुड़े जुझारू चेहरों को प्राथमिकता देने की बात कही है।
यानी संदेश साफ है—सिर्फ संगठन बदलना पर्याप्त नहीं, संगठन की आत्मा भी वापस लानी होगी।
क्या राजद ‘पुराने चेहरे, नई ऊर्जा’ के फार्मूले पर चलेगा?
राजद के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संगठन का पुनर्गठन केवल पदों का बंटवारा बनकर न रह जाए।बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव ने राजद को जिस सामाजिक आधार पर खड़ा किया, उसमें पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और समाज के वंचित तबकों की राजनीतिक भागीदारी महत्वपूर्ण रही। इसके साथ ही पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क भी राजद की ताकत माना जाता रहा।रोहिणी की सलाह का राजनीतिक अर्थ निकाला जाए तो वह इसी पुराने संगठनात्मक ढांचे की ओर लौटने का संकेत देती है।
क्या तेजस्वी यादव नई पीढ़ी और पुराने संगठन के बीच संतुलन बना पाएंगे?
यही आने वाले दिनों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा।
बांकीपुर की हार के बाद क्यों बढ़ी बेचैनी?
राजद के संगठनात्मक पुनर्गठन को हालिया बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में पार्टी की हार के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर संगठन, उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी दौरान भाई वीरेंद्र और शक्ति सिंह यादव के बीच सार्वजनिक रूप से सामने आई बहस ने भी पार्टी के भीतर मतभेदों की चर्चाओं को हवा दी।इसके अलावा वरिष्ठ प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का भाजपा में जाना भी राजद के लिए राजनीतिक रूप से असहज घटनाक्रम माना गया।ऐसे माहौल में पूरी संगठनात्मक मशीनरी को भंग करने का फैसला यह संकेत देता है कि नेतृत्व केवल मामूली बदलाव से संतुष्ट नहीं है। राजद शायद संगठन को ऊपर से नीचे तक फिर से खड़ा करने की तैयारी में है।
रोहिणी की सलाह में छिपा बड़ा राजनीतिक संदेश
रोहिणी आचार्य का बयान केवल संगठनात्मक सुझाव के रूप में देखने पर कहानी अधूरी रह जाएगी।उनकी सलाह में तीन प्रमुख संदेश दिखाई देते हैं।
पहला—पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज न किया जाए।
दूसरा—संगठन की समझ रखने वाले अनुभवी नेताओं को पर्याप्त महत्व मिले।
तीसरा—सिर्फ राजधानी या राजनीतिक गलियारों में सक्रिय नेताओं के बजाय बूथ और पंचायत स्तर तक जमीन पर मौजूद लोगों को जिम्मेदारी मिले।यही वह बिंदु है जो राजद की आगामी संगठनात्मक रणनीति की दिशा तय कर सकता है।अगर नए संगठन में लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलती है तो यह पार्टी के पुराने कैडर को सक्रिय करने की कोशिश होगी।
शिक्षाविदों की नजर में संगठन का अर्थ सिर्फ पद नहीं
राजनीतिक संगठन किसी पार्टी की चुनावी मशीनरी भर नहीं होते। शिक्षाविदों और राजनीतिक अध्ययन के विशेषज्ञों के नजरिए से संगठन किसी भी दल की विचारधारा, सामाजिक पहुंच और राजनीतिक निरंतरता का आधार होता है।चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने वाला संगठन लंबे समय तक मतदाताओं के बीच भरोसा कायम नहीं कर सकता।बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अत्यंत जागरूक राज्य में पंचायत स्तर का कार्यकर्ता केवल पोस्टर लगाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह स्थानीय सामाजिक समीकरण, जातीय संरचना, परिवारों के राजनीतिक रुझान और गांव की समस्याओं को समझता है।इसलिए रोहिणी द्वारा ‘जमीन से जुड़े जुझारू लोगों’ को प्राथमिकता देने की सलाह का महत्व केवल राजद तक सीमित नहीं है।यह बिहार की बदलती चुनावी राजनीति की भी तस्वीर है।
आम मतदाता क्या चाहता है?
बिहार का आम मतदाता अब केवल बड़े-बड़े राजनीतिक भाषणों से प्रभावित नहीं होता। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, कानून-व्यवस्था, पलायन, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे लगातार चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं।राजद के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए नए मतदाताओं तक कैसे पहुंचे।युवा मतदाता तेजस्वी यादव से रोजगार और विकास की भाषा सुनना चाहता है, जबकि पार्टी का पारंपरिक कार्यकर्ता संगठन में अपनी भूमिका और सम्मान चाहता है।
यहीं तेजस्वी के सामने सबसे कठिन राजनीतिक संतुलन है—लालू की सामाजिक विरासत भी बचानी है और अपनी राजनीतिक पहचान भी बनानी है।
लालू मॉडल बनाम तेजस्वी मॉडल—क्या दोनों का मेल संभव?
राजद के भीतर आने वाले संगठनात्मक बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यही हो सकता है कि पार्टी लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत और तेजस्वी यादव की नई पीढ़ी वाली राजनीति के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।लालू प्रसाद की राजनीति का आधार सामाजिक न्याय, पिछड़ों की राजनीतिक भागीदारी और व्यापक सामाजिक गठजोड़ रहा है।तेजस्वी यादव की राजनीति में रोजगार, विकास, युवा और प्रशासनिक मुद्दों को अपेक्षाकृत अधिक प्रमुखता मिलती दिखाई देती है।यदि दोनों धाराएं एक-दूसरे की पूरक बनती हैं तो राजद को संगठनात्मक और चुनावी दोनों स्तरों पर लाभ मिल सकता है।लेकिन यदि पार्टी के पुराने नेता और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती है तो संगठनात्मक पुनर्गठन के बावजूद आंतरिक असंतोष खत्म करना मुश्किल होगा।
भाजपा-एनडीए की नजर राजद के ‘रीसेट’ पर
राजद के संगठनात्मक फेरबदल पर भाजपा और एनडीए की नजर रहना स्वाभाविक है।सत्ता पक्ष के लिए राजद की कमजोरी राजनीतिक अवसर बन सकती है। यदि राजद के पुराने कार्यकर्ता संगठन में पर्याप्त भूमिका नहीं पाते हैं या पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ता है, तो भाजपा-एनडीए उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में आकर्षित करने की कोशिश कर सकता है।दूसरी तरफ यदि राजद वास्तव में बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत कर लेता है तो यह एनडीए के लिए चुनौती भी बन सकती है।इसलिए आने वाले समय में बिहार की राजनीति में सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि संगठनात्मक पकड़ की असली लड़ाई देखने को मिल सकती है।
भाजपा गठबंधन के लिए क्या है चुनौती?
एनडीए के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं।राजद यदि पुराने सामाजिक समीकरण को तेजस्वी की युवा छवि और संगठनात्मक पुनर्गठन के साथ जोड़ने में सफल रहता है, तो वह ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत करने का प्रयास कर सकता है।इसलिए भाजपा गठबंधन के लिए केवल राजद की कमजोरियों पर हमला करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे भी अपने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और बूथ स्तर की सक्रियता को लगातार मजबूत रखना होगा।बिहार की राजनीति में चुनाव केवल बड़े नेताओं के चेहरे पर नहीं जीते जाते। अंतिम लड़ाई बूथ और मतदाता के बीच होती है।
क्या अनुभवी नेताओं की वापसी से गुटबाजी खत्म होगी?
यह सबसे कठिन प्रश्न है।अनुभवी नेताओं को संगठन में बड़ी भूमिका देने के अपने फायदे हैं। वे पार्टी के इतिहास, स्थानीय समीकरण और पुराने कार्यकर्ताओं को बेहतर समझते हैं।लेकिन दूसरी ओर पुराने नेताओं की वापसी से गुटीय राजनीति भी मजबूत हो सकती है, यदि नेतृत्व स्पष्ट जिम्मेदारी और अनुशासन तय नहीं करता।तेजस्वी यादव के सामने चुनौती होगी कि वह अनुभव को सम्मान दें, लेकिन संगठन की कमान बिखरने न दें।अनुभव चाहिए, लेकिन निर्णय क्षमता भी चाहिए।
पंचायत से पटना तक नई राजनीतिक पटकथा?
यदि राजद नए सिरे से पंचायत, प्रखंड और जिला समितियों का गठन करता है और इसमें सक्रिय स्थानीय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देता है तो पार्टी की राजनीतिक शैली में बड़ा बदलाव दिखाई दे सकता है।राजद के लिए यह मौका भी है कि वह केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाली पार्टी की छवि से बाहर निकले और लगातार जनता के बीच मौजूद रहने वाला संगठन तैयार करे।यदि ऐसा हुआ तो संगठनात्मक पुनर्गठन महज कागजी प्रक्रिया नहीं रहेगा।यह राजद के लिए वास्तविक राजनीतिक पुनर्निर्माण साबित हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या तेजस्वी सुनेंगे रोहिणी की सलाह?
रोहिणी आचार्य की सलाह अब राजद के भीतर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश बन चुकी है।नई इकाइयों में किसे जगह मिलती है, किसे जिम्मेदारी दी जाती है, किन पुराने नेताओं की वापसी होती है और किन नए चेहरों को मौका मिलता है—इन फैसलों से तेजस्वी यादव की संगठनात्मक प्राथमिकताएं स्पष्ट होंगी।अगर तेजस्वी अनुभवी नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को नई पीढ़ी के नेतृत्व के साथ जोड़ने में सफल होते हैं, तो राजद एक नए संगठनात्मक चरण में प्रवेश कर सकता है।लेकिन यदि पुनर्गठन केवल पदों के फेरबदल तक सीमित रहा और जमीनी कार्यकर्ता खुद को फिर उपेक्षित महसूस करने लगे, तो रोहिणी की सलाह का असली उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
निष्कर्ष:
राजद के सामने ‘संगठन बचाओ’ से बड़ा मिशन राजद ने अपनी सभी संगठनात्मक इकाइयां भंग करके राजनीतिक तौर पर एक बड़ा जोखिम लिया है।अब पुराने ढांचे के पास लौटने का रास्ता बंद है और नया ढांचा बनाना नेतृत्व की जिम्मेदारी है।रोहिणी आचार्य ने इसी मौके पर लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत, पुराने कार्यकर्ताओं की निष्ठा और जमीन से जुड़े नेतृत्व को केंद्र में रखने की सलाह दी है।तेजस्वी यादव के लिए यह केवल संगठन बनाने का काम नहीं है।यह तय करने का मौका है कि राजद लालू प्रसाद की विरासत पर चलेगा, तेजस्वी की नई राजनीतिक शैली पर चलेगा या दोनों का ऐसा मिश्रण तैयार करेगा जो बिहार की बदलती राजनीति को साध सके।बिहार का मतदाता अब देखेगा कि नए संगठन में किसे जगह मिलती है।
क्योंकि चुनावी राजनीति में अंततः सवाल यह नहीं होता कि पटना में पार्टी का चेहरा कौन है।सवाल यह होता है—गांव में पार्टी के लिए दरवाजे पर दस्तक देने वाला कार्यकर्ता कौन है, बूथ पर खड़ा होने वाला कार्यकर्ता कौन है और मतदाता के सुख-दुख में उसके साथ कौन खड़ा है।राजद का नया संगठन इसी सवाल का जवाब देगा।
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