बी के झा
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गाजियाबाद, (उत्तर प्रदेश), 4 अगस्त
आस्था की राह पर निकले श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले सरकारी दावों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान गाजियाबाद के मुरादनगर स्थित डिडौली कांवड़ शिविर में सांप के डसने से दो कांवड़िए गंभीर रूप से घायल हो गए। आरोप है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जीवनरक्षक एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध नहीं होने के कारण इलाज में बहुमूल्य समय नष्ट हो गया। नतीजतन, राजस्थान के अलवर निवासी 45 वर्षीय संदीप की मौत हो गई, जबकि 65 वर्षीय लालचंद जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य व्यवस्था और कांवड़ यात्रा के दौरान किए गए प्रशासनिक इंतजामों की गंभीर परीक्षा मानी जा रही है।
रात के अंधेरे में सांप ने डसा, शुरू हुई अस्पतालों की दौड़
जानकारी के अनुसार राजस्थान के अलवर जिले के बहजोड़ गांव निवासी संदीप और लालचंद अपने साथियों के साथ हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे थे। देर रात लगभग डेढ़ बजे दोनों डिडौली कांवड़ शिविर में विश्राम कर रहे थे, तभी उन्हें सांप ने डस लिया। साथी कांवड़ियों ने बिना देर किए दोनों को मुरादनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, लेकिन वहां सर्पदंश के इलाज के लिए आवश्यक एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध नहीं थी।इसके बाद दोनों को जिला एमएमजी अस्पताल भेजा गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए दिल्ली के जीटीबी अस्पताल रेफर किया गया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। रास्ते में संदीप ने दम तोड़ दिया।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
यह घटना कई गंभीर प्रश्न छोड़ गई है—जब लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं तो क्या सभी प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में एंटी स्नेक वेनम जैसी आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए?
क्या संवेदनशील मार्गों पर विशेष मेडिकल रिस्पांस टीम तैनात थी?क्या स्वास्थ्य विभाग ने संभावित आपात स्थितियों का पूर्व आकलन किया था?
यदि जीवनरक्षक दवा समय पर मिल जाती तो क्या एक श्रद्धालु की जान बच सकती थी?
इन सवालों के जवाब अब प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को देने होंगे।
डॉक्टर ने क्या कहा
एमएमजी अस्पताल के चिकित्सक डॉ. मुकेश कुमार के अनुसार दोनों मरीज अस्पताल पहुंचने तक अत्यंत गंभीर अवस्था में थे। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए उच्च चिकित्सा केंद्र भेजा गया।
धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों में चिंता
घटना के बाद विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों में गहरी चिंता देखी जा रही है। जनभावना यह है कि कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है। इसलिए यात्रा मार्ग पर स्वास्थ्य सुविधाओं में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को प्रत्येक प्रमुख कांवड़ शिविर पर प्रशिक्षित मेडिकल टीम, एम्बुलेंस, एंटी स्नेक वेनम, ऑक्सीजन और आपातकालीन दवाओं की अनिवार्य उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
राजनीतिक हलकों में जवाबदेही की मांग
घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग तेज होने की संभावना है।
विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांग सकता है कि यदि कांवड़ यात्रा के लिए व्यापक तैयारियों का दावा किया गया था तो जीवनरक्षक दवाएं अस्पतालों में उपलब्ध क्यों नहीं थीं।
वहीं सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करते हुए भविष्य के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करे।
परिजनों पर टूटा दुखों का पहाड़
संदीप की मौत की खबर जैसे ही उनके गांव पहुंची, परिवार में मातम छा गया। जो व्यक्ति भगवान शिव के प्रति श्रद्धा लेकर पवित्र गंगाजल लेने निकला था, वह वापस जीवित नहीं लौट सका। वहीं लालचंद का परिवार अस्पताल से अच्छी खबर की प्रतीक्षा कर रहा है।
सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, व्यवस्था में सुधार जरूरी
यह हादसा केवल संवेदना व्यक्त करने का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तय करने का अवसर भी है। यदि समय पर उपचार और आवश्यक दवा उपलब्ध होती तो शायद एक परिवार उजड़ने से बच सकता था।अब आवश्यकता केवल जांच की नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें किसी श्रद्धालु की जान दवाओं की कमी या प्रशासनिक लापरवाही के कारण न जाए।
आस्था की रक्षा केवल सुरक्षा बैरिकेड और यातायात व्यवस्था से नहीं होती, बल्कि समय पर मिलने वाली चिकित्सा सुविधा से भी होती है।
