ग्रीनलैंड पर मंडराता सैन्य साया: ट्रंप की धमकियों के बाद अमेरिकी एयरक्राफ्ट की तैनाती, आर्कटिक में शक्ति-संतुलन की नई जंग

बी के झा

वॉशिंगटन / कोपेनहेगन / नई दिल्ली, 20 जनवरी

आर्कटिक क्षेत्र की बर्फीली शांति अब तेजी से सैन्य हलचलों में बदलती जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे की खुली धमकियों के बीच अमेरिका ने ग्रीनलैंड स्थित पिटुफिक स्पेस बेस पर एक NORAD (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) सैन्य विमान की तैनाती कर दी है। इस कदम ने वैश्विक कूटनीति में चिंता की नई लकीर खींच दी है—क्या यह केवल सुरक्षा अभ्यास है या किसी बड़े सैन्य विकल्प की तैयारी?

अमेरिका का तर्क, दुनिया की शंका

अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान का कहना है कि यह तैनाती “पूर्व निर्धारित रणनीतिक उद्देश्यों” के तहत की गई है और डेनमार्क तथा ग्रीनलैंड प्रशासन को इसकी जानकारी दी गई है। लेकिन जिस समय यह कदम उठाया गया है, वह इसे सामान्य सैन्य गतिविधि से कहीं आगे ले जाता है।

पिटुफिक स्पेस बेस

न केवल अमेरिका का एक प्रमुख सैन्य ठिकाना है, बल्कि यह उत्तर अमेरिका की मिसाइल चेतावनी प्रणाली का अहम केंद्र भी है। इसकी हाई-आर्कटिक लोकेशन रूस और चीन दोनों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

डेनमार्क का जवाब: सैन्य संतुलन या संप्रभुता की रक्षा?

अमेरिकी तैनाती से पहले ही डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी थी। डेनिश रक्षा बलों के अनुसार, नूक और कांगेरलुसुआक में सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों को तैनात किया गया है। इसके अलावा, हाल ही में एक मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज भी आयोजित की गई, जिसमें नाटो सहयोगी देशों ने भाग लिया।डेनमार्क और नाटो का दावा है कि यह तैनाती ग्रीनलैंड की स्वायत्तता और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए है, न कि किसी आक्रामक इरादे से। लेकिन ट्रंप प्रशासन इसे सीधे तौर पर अमेरिका की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ कदम मान रहा है।

टैरिफ से सैन्य दबाव तक: ट्रंप की दोहरी रणनीति

स्थिति को और विस्फोटक बनाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंड्स पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कहा कि यह शुल्क 1 फरवरी से लागू होगा और 1 जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा—जब तक ग्रीनलैंड की “पूर्ण और सम्पूर्ण खरीद” पर कोई समझौता नहीं हो जाता।यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करता है।

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों के अनुसार:किसी स्वायत्त क्षेत्र को आर्थिक या सैन्य दबाव के जरिए हासिल करने की धमकी संयुक्त राष्ट्र चार्टर और राज्यों की संप्रभुता के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और उसकी स्थिति किसी संपत्ति की तरह “खरीदी” नहीं जा सकती। कानूनविद इसे 19वीं सदी की औपनिवेशिक सोच की वापसी के रूप में देख रहे हैं।

आर्कटिक: संसाधनों की दौड़ और शक्ति संघर्ष

ग्रीनलैंड की अहमियत केवल भौगोलिक नहीं है।दुर्लभ खनिज तेल और गैसनई समुद्री व्यापारिक राहें इन सबने आर्कटिक को 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक रणभूमि बना दिया है।

अमेरिका, रूस और चीन—तीनों यहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ट्रंप का आक्रामक रुख इसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा की अभिव्यक्ति माना जा रहा है।

भारत की संभावित प्रतिक्रिया: संतुलन और सिद्धांत

भारतीय कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, भारत इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर लेकिन सतर्क दृष्टि से देख रहा है। भारत की पारंपरिक विदेश नीति:संप्रभुता के सम्मानअंतरराष्ट्रीय कानूनऔर शक्ति के बजाय संवादपर आधारित रही है।भारत सरकार के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि:भारत खुद आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक सदस्य हैऔर वह क्षेत्र में वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और शांतिपूर्ण सहयोग का समर्थक है सूत्रों का कहना है कि भारत किसी भी सैन्य समाधान या दबाव की राजनीति का समर्थन नहीं करेगा और यह मानता है कि आर्कटिक को वैश्विक टकराव का नया मैदान बनने से रोका जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

बर्फ के नीचे सुलगती आग

ग्रीनलैंड पर अमेरिकी सैन्य विमान की तैनाती केवल एक रणनीतिक कदम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। ट्रंप की ‘नो कमेंट’ नीति, टैरिफ की धमकियां और सैन्य उपस्थिति—ये सब मिलकर एक ऐसे परिदृश्य की ओर इशारा कर रहे हैं जहां कूटनीति के बजाय दबाव प्रमुख हथियार बनता जा रहा है।सवाल यह नहीं है कि हमला होगा या नहीं,सवाल यह है कि क्या दुनिया फिर से शक्ति-आधारित राजनीति के उस दौर में लौट रही है, जहां कानून और संवाद पीछे छूट जाते हैं?

ग्रीनलैंड की बर्फ पर पड़ते सैन्य बूटों के निशान आने वाले समय की दिशा तय कर सकते हैं—सिर्फ आर्कटिक की नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था की।

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