बी के झा
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नई दिल्ली, 31 जुलाई
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में वर्ष 2020 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान खुफिया ब्यूरो (आईबी) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की नृशंस हत्या के बहुचर्चित मामले में कड़कड़डूमा अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हत्या अत्यंत क्रूर, अमानवीय और झकझोर देने वाली थी, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह ऐसा मामला नहीं है जिसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में रखकर मृत्युदंड दिया जाए।
अदालत ने ताहिर हुसैन पर पांच लाख रुपये तथा अन्य चार दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि में से पांच लाख रुपये अंकित शर्मा के परिवार को मुआवजे के रूप में दिए जाएं।
ऐसे सामने आया था हत्याकांड
25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा चरम पर थी। इसी दौरान आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा अपने घर से निकले, लेकिन वापस नहीं लौटे। अगले दिन उनका शव खजूरी खास के नाले से बरामद हुआ। पोस्टमार्टम में शरीर पर 51 गंभीर चोटों का उल्लेख किया गया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।
जांच के दौरान पुलिस ने हत्या, अपहरण, दंगा, आपराधिक षड्यंत्र और सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया।
जांच में क्या सामने आया
अभियोजन के अनुसार जांच में कई प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, फोरेंसिक साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल लोकेशन और घटनास्थल से बरामद सामग्री को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया।जांच एजेंसियों के अनुसार ताहिर हुसैन की इमारत की छत से बड़ी मात्रा में पेट्रोल बम, पत्थर, एसिड पाउच और अन्य सामग्री बरामद हुई थी। अभियोजन का दावा था कि हिंसक भीड़ वहीं से संचालित हो रही थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपियों को दोषी ठहराया और बाद में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई।
फांसी क्यों नहीं? अदालत ने स्पष्ट किया कारण
सरकारी पक्ष ने अदालत से कहा था कि यह “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामला है और दोषियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि हत्या में किसी एक आरोपी की विशिष्ट भूमिका अलग से स्थापित नहीं हुई और दोषसिद्धि साझा आपराधिक दायित्व के सिद्धांत पर आधारित है।अदालत ने कहा कि अपराध अत्यंत जघन्य है, किंतु अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि दोषियों के सुधार की संभावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसी आधार पर मृत्युदंड के बजाय उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला केवल एक हत्या के मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों में से एक है। उनके अनुसार यह निर्णय बताता है कि सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन अदालतें अंततः साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देती हैं।
उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद दंगों की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था पर राजनीतिक बहस फिर तेज हो सकती है।
कानूनविदों की टिप्पणी
संवैधानिक विशेषज्ञों ने कहा कि अदालत ने दोषसिद्धि, सजा और मृत्युदंड के मानकों पर विस्तृत कानूनी कसौटी लागू की है। कानूनविदों के अनुसार, यह निर्णय न्यायपालिका के उस सिद्धांत को दोहराता है कि मृत्युदंड केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाता है। उन्होंने कहा कि अदालत ने भावनाओं के बजाय विधिक सिद्धांतों और साक्ष्यों को प्राथमिकता दी।
शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
वरिष्ठ शिक्षाविदों ने कहा कि न्याय मिलने में समय लग सकता है, लेकिन कानून के शासन में विश्वास बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने युवाओं से सांप्रदायिक उन्माद, अफवाह और हिंसा से दूर रहने तथा संविधान के मूल्यों को अपनाने की अपील की।
समाजसेवी संस्थाओं का मत
विभिन्न सामाजिक संगठनों ने कहा कि किसी भी निर्दोष नागरिक की हत्या पूरे समाज के लिए पीड़ादायक होती है। उन्होंने फैसले का सम्मान करते हुए सभी समुदायों से शांति, भाईचारा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की।
हिंदू संगठनों ने फैसले का किया स्वागत
दिल्ली के अनेक हिंदू संगठनों ने अदालत के फैसले का स्वागत किया। संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि वर्षों के इंतजार के बाद न्यायिक प्रक्रिया अपने निर्णायक मुकाम पर पहुंची है। हालांकि कई संगठनों ने यह भी कहा कि उनकी राय में अपराध की गंभीरता को देखते हुए मृत्युदंड अधिक उपयुक्त होता, लेकिन वे न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हैं।
बीजेपी की प्रतिक्रिया
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने फैसले को न्यायपालिका की निष्पक्षता का प्रमाण बताते हुए कहा कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति बड़ा नहीं है। पार्टी नेताओं ने कहा कि यह निर्णय उन लोगों के लिए भी संदेश है जो हिंसा और सांप्रदायिक तनाव के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास करते हैं।
दिल्ली सरकार और विपक्ष का रुख
समाचार लिखे जाने तक दिल्ली सरकार की ओर से इस फैसले पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया था। वहीं विपक्ष के प्रमुख दलों ने भी तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।
परिवार की मिश्रित भावना
अदालत के फैसले के बाद अंकित शर्मा के परिवार ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है और वे निर्णय का सम्मान करते हैं। परिवार के सदस्यों ने यह भी कहा कि उनकी व्यक्तिगत भावना थी कि दोषियों को मृत्युदंड मिलना चाहिए, लेकिन अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा का वे सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस फैसले से अंकित के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय पूरा हुआ है।
संपादकीय दृष्टि
अंकित शर्मा हत्याकांड का फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की उस मूल भावना का प्रमाण है जिसमें न्याय साक्ष्यों, कानून और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर दिया जाता है। 2020 के दंगों ने देश की राजधानी को गहरे घाव दिए थे। ऐसे मामलों में समयबद्ध जांच, निष्पक्ष सुनवाई और दोषियों को दंड मिलना लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत करता है।
साथ ही यह निर्णय समाज को भी याद दिलाता है कि हिंसा का कोई भी रूप अंततः कानून के कठघरे तक अवश्य पहुंचता है और स्थायी समाधान केवल शांति, संवाद तथा संविधान के मार्ग में ही निहित है।
