बी के झा
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नई दिल्ली, 7 अगस्त
संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध के बीच शुक्रवार को भी लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के हंगामे की भेंट चढ़ने की आशंका जताई जा रही है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल गृह मंत्री अमित शाह से विभिन्न मुद्दों पर सदन में जवाब देने की मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसे में एक बार फिर संसद के सुचारु संचालन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से अपील करते हुए कहा कि यदि विपक्ष सदन को चलने देगा तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सदन में उपस्थित होकर चर्चा करेंगे और सभी प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।
भाजपा का आरोप—’विपक्ष खुद संसद नहीं चलने दे रहा
‘किरेन रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह प्रतिदिन संसद भवन में मौजूद रहते हैं। उनके अनुसार विपक्ष यह प्रचार कर रहा है कि गृह मंत्री सदन में नहीं आते, जबकि वास्तविकता यह है कि लगातार हो रहे हंगामे के कारण कार्यवाही सुचारु रूप से चल ही नहीं पा रही।भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने भी विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि अमित शाह पूरे दिन संसद परिसर में रहते हैं, लेकिन जब सदन की कार्यवाही ही बाधित कर दी जाती है तो बहस कैसे होगी। उन्होंने कहा कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही, बल्कि विपक्ष को लोकतांत्रिक संवाद के लिए आगे आना चाहिए।
विपक्ष की मांग
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावे से जुड़े विवाद, दिल्ली में छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई तथा अन्य मुद्दों पर गृह मंत्री को सदन में विस्तृत बयान देना चाहिए।विपक्ष का आरोप है कि सरकार महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से बच रही है। वहीं सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रही है कि वह हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार है, बशर्ते सदन की कार्यवाही बाधित न हो।
रिजिजू ने राहुल गांधी से किया संवाद
सूत्रों के अनुसार संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से टेलीफोन पर बातचीत कर महिला आरक्षण तथा परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयकों पर सहयोग का आग्रह किया।बताया जा रहा है कि राहुल गांधी ने इस विषय पर पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की आवश्यकता पर बल दिया। हालांकि इन चर्चाओं को लेकर अभी कोई संयुक्त आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
सरकार का दावा—कामकाज जारी है
भाजपा का कहना है कि संसद में व्यवधान के बावजूद सरकार विधायी कार्य जारी रखे हुए है और विशेषकर राज्यसभा में कई विधेयकों पर चर्चा के बाद उन्हें पारित भी किया गया है।रिजिजू ने यह भी दावा किया कि लगातार व्यवधान से सबसे अधिक नुकसान विपक्ष के नए सांसदों को हो रहा है, जिन्हें सदन में अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहा।
राजेश कुमार सिंह उर्फ ‘पप्पू भैया’ की टिप्पणी
दरभंगा के समाजसेवी राजेश कुमार सिंह उर्फ पप्पू भैया ने संसद में लगातार हो रहे गतिरोध पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान संवाद और बहस है, न कि निरंतर टकराव।
उन्होंने कहा—”आज जिस तरह संसद की कार्यवाही को केवल राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का माध्यम बनाया जा रहा है, वह संसदीय इतिहास में चिंता का विषय रहेगा।
उन्होंने कहा मैं किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं हूं, लेकिन देश का आम नागरिक यही चाहता है कि संसद नियमित रूप से चले और जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो। यदि जनप्रतिनिधि अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करेंगे, तो लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता ही करेगी।
“उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में संसद चलाने की अपील की।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संसद में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन लगातार गतिरोध लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न खड़े करता है।विशेषज्ञों के अनुसार विपक्ष का दायित्व सरकार से जवाब मांगना है, जबकि सरकार की जिम्मेदारी संवाद और बहस के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना है। यदि दोनों पक्ष अपनी-अपनी संवैधानिक भूमिका संतुलित ढंग से निभाएं तो संसद अधिक प्रभावी ढंग से चल सकती है।
कानूनविदों का दृष्टिकोण
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि संसद कानून निर्माण, नीति निर्माण और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है।उनके अनुसार विरोध दर्ज कराना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन बार-बार कार्यवाही बाधित होने से विधायी प्रक्रिया और जनहित के महत्वपूर्ण विषय प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर, सरकार पर भी यह दायित्व है कि वह विपक्ष की चिंताओं को गंभीरता से सुने और आवश्यक विषयों पर चर्चा सुनिश्चित करे।
शिक्षाविदों की राय
राजनीति विज्ञान के शिक्षकों का मानना है कि संसद लोकतांत्रिक संवाद का विद्यालय है। यदि वहां बहस की जगह केवल टकराव दिखाई देगा तो लोकतांत्रिक संस्कृति पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए संसद आदर्श संस्थान होनी चाहिए, जहां मतभेदों का समाधान संवाद, तर्क और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से हो।
समाजसेवी संगठनों की अपील
कई सामाजिक संगठनों ने सभी दलों से अपील की है कि संसद को राजनीतिक संघर्ष का नहीं, बल्कि जनहित के समाधान का मंच बनाया जाए।उन्होंने कहा कि महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा देश की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकार और विपक्ष की जिम्मेदारी
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। सरकार की जिम्मेदारी जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी रचनात्मक आलोचना और वैकल्पिक सुझाव देना है। लगातार टकराव की स्थिति अंततः संसद की कार्यक्षमता और जनता के विश्वास दोनों को प्रभावित कर सकती है।
संपादकीय दृष्टिकोण
संसद केवल सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष का मंच नहीं, बल्कि 140 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाओं का सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है। सरकार को विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने में पारदर्शिता दिखानी चाहिए और विपक्ष को भी विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए कि संसद की कार्यवाही पूरी तरह ठप न हो।जनता अपने प्रतिनिधियों को नारे लगाने के लिए नहीं, बल्कि कानून बनाने, नीतियों पर बहस करने और जनसमस्याओं का समाधान खोजने के लिए चुनती है।
इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वे संवाद, सहमति और संवैधानिक मर्यादा के साथ संसद को सुचारु रूप से चलाने का प्रयास करें। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
