सोनम वांगचुक के त्याग को देश कभी नहीं भूल सकता’: CJP प्रमुख अभिजीत दिपके ने मतभेद की अटकलों को किया खारिज, बोले—’हमारे लक्ष्य और सोच एक समान—26 दिन के अनशन ने देश को झकझोरा, छात्रों के आंदोलन को दी नई दिशा

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 31 जुलाई

शिक्षा सुधार और छात्र आंदोलन को लेकर चर्चा में रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के साथ मतभेद की चर्चाओं को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनके प्रति सम्मान पहले जैसा ही है और उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं के बीच दूरी की जो बातें कही जा रही हैं, उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।एक साक्षात्कार में दिपके ने स्पष्ट किया कि आंदोलन की दिशा, उद्देश्य और जनहित के मुद्दों पर उनकी और सोनम वांगचुक की सोच काफी हद तक समान रही है। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान दोनों के बीच लगातार संवाद होता रहा और उन्होंने स्वयं वांगचुक से फोन पर बातचीत की थी।

‘26 दिन का अनशन आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत था’

दिपके ने कहा कि सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक भूख हड़ताल कर जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया, उसने पूरे देश का ध्यान आंदोलन की ओर आकर्षित किया। उनके अनुसार यह केवल एक व्यक्ति का अनशन नहीं था, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस का आधार बना।उन्होंने कहा, “सोनम वांगचुक के त्याग को हम कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने अपने स्वास्थ्य और जीवन की परवाह किए बिना देशभर के युवाओं को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का साहस दिया।

“‘छात्रों ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी’

दिपके ने कहा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद उन्होंने सबसे पहले छात्रों का आभार इसलिए व्यक्त किया क्योंकि आंदोलन के अंतिम चरण में छात्रों ने बड़ी भूमिका निभाई। उनके अनुसार संसद मार्च के दौरान छात्रों को कठिन परिस्थितियों और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा, जिसके बाद यह आंदोलन व्यापक छात्र जनांदोलन का स्वरूप ले गया।हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि आंदोलन की नैतिक शक्ति और जनसमर्थन जुटाने में सोनम वांगचुक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही।

‘मैंने ही उनसे अनशन समाप्त करने का आग्रह किया था’

दिपके ने बताया कि उन्होंने स्वयं सोनम वांगचुक से आग्रह किया था कि वे अपना अनशन समाप्त करें और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि आंदोलन जारी रखने की जिम्मेदारी बाकी साथियों पर छोड़ी जा सकती है, लेकिन वांगचुक का स्वस्थ रहना अधिक आवश्यक था।उन्होंने कहा कि अस्पताल में वांगचुक द्वारा अनशन समाप्त करने के बाद उन्हें व्यक्तिगत रूप से राहत महसूस हुई।

अस्पताल में मुलाकात को लेकर जताई नाराजगी

दिपके ने यह भी दावा किया कि जब वे अस्पताल में सोनम वांगचुक से मिलने पहुंचे तो उन्हें अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का दुख हुआ कि कुछ अन्य नेताओं को मिलने की अनुमति मिली, जबकि वे स्वयं उनसे नहीं मिल सके। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ विपक्षी नेताओं को भी मुलाकात की अनुमति नहीं दी गई।

इन दावों पर संबंधित अधिकारियों की ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं थी।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बड़े जनआंदोलनों में नेतृत्व को लेकर तरह-तरह की अटकलें और मतभेद की चर्चाएं अक्सर सामने आती हैं। उनके अनुसार यदि आंदोलन के प्रमुख चेहरे सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, तो इससे ऐसी अटकलों पर विराम लग सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन की दीर्घकालिक सफलता उसके नेतृत्व से अधिक उसके उद्देश्यों और संगठनात्मक क्षमता पर निर्भर करती है।

शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया

शिक्षाविदों ने कहा कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की सबसे बड़ी शक्ति शांतिपूर्ण संवाद और जनभागीदारी होती है। उनका मानना है कि यदि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती है, तो इससे नीति निर्माण की प्रक्रिया को भी मजबूती मिलती है।

समाजसेवी संस्थाओं का मत

विभिन्न सामाजिक संगठनों ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में व्यक्तिगत मतभेदों से अधिक महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य और जनहित होता है। उन्होंने सभी पक्षों से संवाद, संयम और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की अपील की।

संपादकीय दृष्टि

किसी भी बड़े जनआंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास और नैतिक आधार होता है। ऐसे आंदोलनों में नेतृत्व को लेकर समय-समय पर सवाल उठना असामान्य नहीं है, लेकिन यदि आंदोलन के प्रमुख चेहरे सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, तो इससे संगठन की विश्वसनीयता मजबूत होती है।

अंततः लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का वास्तविक मूल्य उसके नेतृत्व से अधिक उसके उद्देश्य, शांतिपूर्ण संघर्ष और समाज पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव से तय होता है।

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