हिमाचल पर मानसून का महाप्रहार: 142 मौतें, 797 करोड़ से अधिक का नुकसान, 120 सड़कें बंद; राहत-बचाव के बीच आपदा प्रबंधन की बड़ी परीक्षा

बी के झा

NSK news Ind

शिमला / नई दिल्ली, 7 अगस्त

देवभूमि हिमाचल प्रदेश इस वर्ष मानसून की अभूतपूर्व मार झेल रहा है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश, भूस्खलन, चट्टानें गिरने, सड़क हादसों और अचानक आई प्राकृतिक आपदाओं ने राज्य को गहरे संकट में डाल दिया है। राज्य आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ (SEOC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 30 जून से 6 अगस्त 2026 के बीच प्रदेश में 142 लोगों की मौत, 224 लोग घायल, 2 लोग लापता तथा करीब 797.87 करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान दर्ज किया गया है। यह आंकड़े केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हिमालयी राज्यों के सामने खड़ी जलवायु और आपदा प्रबंधन की गंभीर चुनौती की भी कहानी बयां कर रहे हैं।

इधर मौसम विज्ञान केंद्र, शिमला ने 11 अगस्त तक कई जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए लोगों को अत्यधिक सतर्क रहने की सलाह दी है। प्रशासन ने स्पष्ट कहा है कि अगले कुछ दिन बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी प्रकार की लापरवाही भारी पड़ सकती है।

कई जिलों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक शोभित कटियार के अनुसार 10 और 11 अगस्त को कांगड़ा, कुल्लू, मंडी, सिरमौर तथा चंबा सहित कई जिलों में भारी से बहुत भारी वर्षा होने की संभावना है। 7 से 10 अगस्त तक अलग-अलग जिलों के लिए यलो और ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है।विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार संतृप्त हो चुकी पहाड़ियों में अब मामूली वर्षा भी बड़े भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का कारण बन सकती है।

मौतों का भयावह आंकड़ा

SEOC की रिपोर्ट के अनुसार कुल 142 मृतकों में से 64 लोगों की मौत प्राकृतिक आपदाओं के कारण हुई, जबकि 78 लोगों की जान सड़क दुर्घटनाओं में गई।प्राकृतिक आपदाओं में—21 लोगों की मौत चट्टान या पेड़ गिरने से,14 लोगों की जान भूस्खलन में,6 लोगों की मौत सांप के काटने से,5 लोगों की करंट लगने से,4 लोगों की डूबने से,1 फ्लैश फ्लड,1 आग की घटना,जबकि 12 अन्य कारणों से मौत दर्ज की गई।इसके अलावा 194 पशुओं की मौत और बड़ी संख्या में पशुधन की हानि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर झटका मानी जा रही है।

सड़कें टूटीं, गांव कटे, जनजीवन ठप

लगातार हो रही बारिश ने पूरे प्रदेश के परिवहन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है।120 सड़कें बंदएक राष्ट्रीय राजमार्ग बाधितमंडी में सर्वाधिक 38 सड़कें बंदकुल्लू में 31सिरमौर में 26शिमला में 13चंबा और कांगड़ा में 5-5 सड़कें प्रभावित

हालांकि किन्नौर के निगुलसरी क्षेत्र में एनएच-5 को बहाल कर दिया गया है, लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क अब भी पूरी तरह टूटा हुआ है।घर, खेत और रोज़गार सब प्रभावितआपदा के कारण—22 मकान पूरी तरह ध्वस्त39 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त90 दुकानें एवं ढाबे प्रभावित‌

142 गौशालाएं नष्ट 72 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि बर्बाद

विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक आर्थिक नुकसान सरकारी अनुमान से कहीं अधिक हो सकता है क्योंकि पर्यटन, बागवानी, छोटे व्यापार और ग्रामीण रोजगार पर पड़े प्रभाव का पूरा आकलन अभी शेष है।

बिजली और पानी की व्यवस्था भी चरमराई

प्रदेश में39 ट्रांसफार्मर बंद,60 पेयजल योजनाएं प्रभावित,जिससे हजारों परिवारों को बिजली और स्वच्छ पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

सरकार का पक्ष

राज्य सरकार ने दावा किया है कि राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं। प्रभावित क्षेत्रों में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, लोक निर्माण विभाग, विद्युत विभाग और जल शक्ति विभाग की संयुक्त टीमें लगातार कार्य कर रही हैं।सरकार का कहना है कि प्राथमिकता फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना, सड़कें खोलना, बिजली और पेयजल व्यवस्था बहाल करना तथा प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत उपलब्ध कराना है।

विपक्ष का हमला

विपक्षी दलों ने राज्य सरकार से आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं।विपक्ष का आरोप है कि संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, ढलानों का वैज्ञानिक उपचार, नालों की सफाई और सड़क सुरक्षा के स्थायी उपाय नहीं किए गए, जिसके कारण नुकसान का दायरा बढ़ा।विपक्ष ने केंद्र और राज्य सरकार से संयुक्त विशेष राहत पैकेज तथा दीर्घकालिक आपदा न्यूनीकरण योजना लागू करने की मांग की है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमाचल में हर वर्ष मानसून के दौरान दोहराई जाने वाली त्रासदियां अब केवल प्राकृतिक नहीं रह गई हैं।उनका कहना है कि अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ता शहरी विस्तार, जल निकासी व्यवस्था की कमी और जलवायु परिवर्तन मिलकर आपदाओं की तीव्रता बढ़ा रहे हैं।

विश्लेषकों के अनुसार सरकारों को राहत वितरण से आगे बढ़कर दीर्घकालिक नीति आधारित समाधान तैयार करने होंगे।

शिक्षाविदों की चिंता

शिक्षाविदों का कहना है कि हिमालयी राज्यों में अब स्कूल और कॉलेज स्तर पर आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन की शिक्षा को व्यवहारिक रूप में लागू करना समय की आवश्यकता बन गया है।उनके अनुसार आने वाली पीढ़ियों को केवल पुस्तक आधारित जानकारी नहीं बल्कि आपदा से बचाव का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।

समाजसेवी संगठनों की अपील

विभिन्न सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों ने प्रभावित परिवारों के लिए राहत सामग्री, भोजन, दवाइयां और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराने की मुहिम तेज कर दी है।उन्होंने नागरिकों से अफवाहों से बचने, प्रशासन के निर्देशों का पालन करने तथा नदी-नालों, पहाड़ी ढलानों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने की अपील की है।

स्थानीय प्रशासन का संदेश

जिला प्रशासन ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने, मौसम विभाग की चेतावनियों पर नजर रखने और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत प्रशासनिक हेल्पलाइन से संपर्क करने की सलाह दी है।प्रशासन ने पर्यटकों से भी पर्वतीय क्षेत्रों में बिना आवश्यकता यात्रा न करने और जोखिम वाले इलाकों से दूरी बनाए रखने का अनुरोध किया है।

स्थानीय नागरिकों की पीड़ा

प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि लगातार बारिश ने सामान्य जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। कई गांवों का संपर्क टूट गया है, बिजली और पानी की समस्या बनी हुई है तथा किसानों और बागवानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। लोगों ने राहत कार्यों में तेजी लाने और पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था करने की मांग की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

हिमाचल प्रदेश की यह त्रासदी केवल एक मौसमी आपदा नहीं, बल्कि बदलते जलवायु परिदृश्य, अनियोजित विकास और पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते पर्यावरणीय दबाव का गंभीर संकेत है। राहत और मुआवजा आवश्यक हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि सरकारें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पर्वतीय विकास नीति, निर्माण मानकों, भूस्खलन रोकथाम, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन तंत्र को स्थायी रूप से मजबूत करें।

अन्यथा हर मानसून नई त्रासदी, नए आंकड़े और नए शोक का कारण बनता रहेगा।

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