शर्मनाक क्यों?”—ईरान-अमेरिका टकराव पर भारत की भूमिका को लेकर उठा सवाल, शशि थरूर के बयान से नई बहस

बी के झा

NSK news Ind

“ नई दिल्ली, 26 मार्च

मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक भूमिका पर अब देश के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। शशि थरूर के ताजा बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है।थरूर ने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा हालात “थोड़े शर्मनाक” हैं, क्योंकि जहां भारत को शांति स्थापना में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए थी, वहीं अब पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थता की कोशिशों में आगे दिख रहे हैं।

थरूर का तर्क: “भारत के पास था मौका”

शशि थरूर ने कहा कि उन्होंने पहले सरकार के “संयमित रुख” का समर्थन किया था, इस उम्मीद के साथ कि भारत अपनी मजबूत कूटनीतिक स्थिति का इस्तेमाल करेगा।“मैं तीन हफ्तों से कह रहा हूं कि भारत को आगे आकर बातचीत शुरू करवानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।”उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका बयान सरकार का समर्थन नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय हित” के दृष्टिकोण से था।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: बदलती कूटनीति

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष में अब कई क्षेत्रीय शक्तियां सक्रिय हो गई हैं।अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषक (काल्पनिक प्रतिक्रिया):“यह पहली बार नहीं है कि भारत अपेक्षाकृत ‘लो-प्रोफाइल’ कूटनीति अपना रहा है। लेकिन इस बार क्षेत्रीय ताकतें तेजी से खाली जगह भर रही हैं, जिससे भारत की पारंपरिक ‘ब्रिज नेशन’ छवि को चुनौती मिल रही है।”

कानूनविदों की राय: “तटस्थता बनाम सक्रियता”

कानून और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की स्थिति जटिल है।

कानूनविद::-

“भारत के ईरान, इज़रायल और अमेरिका—तीनों के साथ अलग-अलग रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में खुलकर मध्यस्थता करना जोखिम भरा भी हो सकता है।”

रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी है।रक्षा विशेषज्ञ (काल्पनिक प्रतिक्रिया):“भारत की प्राथमिकता अपने ऊर्जा हित और प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा है। खुलकर मध्यस्थता करने से भारत सीधे टकराव के दायरे में आ सकता है।”

विपक्ष का हमला

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।विपक्षी नेता (काल्पनिक बयान):“भारत ‘विश्वगुरु’ बनने की बात करता है, लेकिन जब नेतृत्व का मौका आया, तो पीछे हट गया।”“सरकार की विदेश नीति में स्पष्टता की कमी दिख रही है।”

शिक्षाविदों का संतुलित नजरिया

शिक्षाविद इस मुद्दे को अधिक संतुलित दृष्टिकोण से देख रहे हैं।अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर अमिताभ “हर संकट में आगे आना ही नेतृत्व नहीं होता। कभी-कभी ‘सही समय का इंतजार’ भी रणनीति का हिस्सा होता है। सवाल यह है कि क्या भारत सही समय का इंतजार कर रहा है या अवसर खो चुका है?”

पाकिस्तान की सक्रियता और सीमाएं

शहबाज शरीफ ने ईरान-अमेरिका वार्ता की मेजबानी की पेशकश की है, लेकिन ईरान ने इसे खारिज कर दिया है।इससे यह भी स्पष्ट होता है कि:क्षेत्रीय मध्यस्थता आसान नहीं हैकिसी भी देश की भूमिका सीमित हो सकती है

राजनीतिक विश्लेषण: “छवि बनाम रणनीति”

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद भारत की वैश्विक छवि और व्यावहारिक रणनीति के बीच संतुलन का सवाल है।

राजनीतिक विश्लेषक:- पूर्व राजदूत दीपक बोहरा “भारत एक उभरती शक्ति है, लेकिन हर वैश्विक संकट में नेतृत्व करना उसकी प्राथमिकता नहीं हो सकती। यहां सवाल ‘क्या करना चाहिए’ से ज्यादा ‘क्या करना संभव है’ का है।”

निष्कर्ष

शशि थरूर का बयान एक बड़े विमर्श को जन्म देता है—

क्या भारत को हर वैश्विक संकट में मध्यस्थ बनना चाहिए, या अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए?मध्य-पूर्व के इस जटिल समीकरण में कूटनीति सुरक्षा और आर्थिक हित तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।

ऐसे में भारत का हर कदम केवल बयान नहीं, बल्कि एक संतुलित रणनीतिक निर्णय बन जाता है।

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