बी के झा
नई दिल्ली, 5 अगस्त
संसद का मानसून सत्र अब केवल विधायी कार्यवाही का मंच नहीं रह गया है, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक व वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा बनता जा रहा है। एक ओर विपक्ष राम मंदिर चढ़ावा मामले में लगाए गए कथित आरोपों, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है, तो दूसरी ओर भाजपा विपक्ष पर संसद की कार्यवाही ठप कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने का आरोप लगा रही है।
इसी बीच कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव देकर बहस को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून की समीक्षा और व्यापक सुधार की मांग करते हुए कहा कि लोकतंत्र में वैचारिक असहमति सुरक्षित रहनी चाहिए, लेकिन सत्ता के लिए होने वाले अवसरवादी दल-बदल पर प्रभावी रोक लगनी चाहिए।
विपक्ष के निशाने पर सरकार
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को मिले दान, चढ़ावे और भूमि लेनदेन से जुड़े कथित आरोपों पर सरकार से जवाब मांगा। उनका कहना है कि मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है, इसलिए संसद में इस पर खुली और विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार चर्चा से बच रही है। वहीं भाजपा और ट्रस्ट से जुड़े पक्ष पहले भी इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, इन आरोपों पर अभी तक किसी सक्षम न्यायिक या वैधानिक प्राधिकरण द्वारा अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
भाजपा का जवाब: “विपक्ष संसद नहीं चलने देना चाहता
“भाजपा प्रवक्ता एवं सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि संसद के प्रत्येक दिन पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन खर्च होता है, लेकिन विपक्ष प्रश्नकाल और शून्यकाल में लगातार व्यवधान डालकर जनता के मुद्दों पर चर्चा नहीं होने दे रहा। उनका आरोप है कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए संसदीय प्रक्रिया को बाधित कर रहा है।
दल-बदल कानून फिर बहस के केंद्र में
मनीष तिवारी का प्रस्ताव केवल एक संसदीय नोटिस नहीं, बल्कि उस बहस को फिर जीवित करता है जो पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों की राजनीतिक उठा-पटक के बाद लगातार उठती रही है। सवाल यह है कि क्या मौजूदा कानून जनादेश की रक्षा कर पा रहा है, या उसमें ऐसे रास्ते मौजूद हैं जिनका राजनीतिक दल अपने हित में इस्तेमाल कर लेते हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि जनादेश की रक्षा करना भी उसकी आत्मा है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि बार-बार दल बदलते हैं, तो मतदाताओं के विश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि किसी भी नए कानून में लोकतांत्रिक असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना होगा।
कानूनविद क्या कहते हैं?
संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, संविधान की दसवीं अनुसूची ने दल-बदल पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी, लेकिन समय के साथ इसकी कई कानूनी व्याख्याएं सामने आईं। उनका मत है कि यदि संशोधन होता है तो उसमें समयबद्ध निर्णय, स्वतंत्र प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा को अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए।
शिक्षाविदों की चिंता
शिक्षाविदों का कहना है कि संसद का लगातार बाधित होना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उनका मानना है कि छात्रों और युवाओं के सामने संसद का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत होना चाहिए, जहां गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर तर्क, तथ्य और संवाद के आधार पर निर्णय लिए जाएं।
सामाजिक संगठनों की अपील
कई सामाजिक और लोकतांत्रिक संगठनों ने सरकार और विपक्ष दोनों से संसद की गरिमा बनाए रखने की अपील की है। उनका कहना है कि जनता ने सांसदों को टकराव नहीं, बल्कि समाधान के लिए चुना है।
असली सवाल
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या संसद राजनीतिक रणनीति का मंच बनकर रह जाएगी, या फिर जवाबदेही, पारदर्शिता और रचनात्मक बहस की अपनी मूल भूमिका में लौटेगी?
लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होगी कि सरकार कठिन सवालों का जवाब देने के लिए कितनी तैयार है और विपक्ष जनहित के मुद्दों को कितनी जिम्मेदारी से उठाता है। संसद का उद्देश्य केवल शोर नहीं, बल्कि समाधान
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