बी के झा
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नई दिल्ली, 8 अगस्त
पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में एक नए समीकरण ने रणनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के सदस्य इब्राहिम रजाई ने तंज कसते हुए कहा है कि तुर्किये और पाकिस्तान के साथ किया गया कोई भी ‘कागजी समझौता’ सऊदी अरब को स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकता।
ईरानी नेता का यह बयान ऐसे समय आया है, जब सऊदी अरब अपनी सुरक्षा नीति में पारंपरिक अमेरिकी निर्भरता से आगे बढ़कर क्षेत्रीय और बहुपक्षीय सुरक्षा साझेदारियां विकसित करने की कोशिश कर रहा है।यही वजह है कि मक्का में हुआ यह समझौता केवल तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का दस्तावेज नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व में बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत भी माना जा रहा है।
ईरान का सीधा संदेश—‘सुरक्षा बाहर से नहीं, नीति से आएगी’
ईरानी संसद के सदस्य इब्राहिम रजाई ने सोशल मीडिया पर कहा कि पाकिस्तान और तुर्किये के साथ कोई ‘पेपर एग्रीमेंट’ सऊदी को स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकता। उन्होंने सऊदी अरब की वर्षों पुरानी अमेरिकी निर्भरता पर भी सवाल उठाते हुए दावा किया कि उस निर्भरता से भी उसे स्थायी सुरक्षा नहीं मिली।ईरानी बयान में केवल समझौते की आलोचना नहीं है। इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक संदेश दिखाई देता है—तेहरान चाहता है कि रियाद अपनी सुरक्षा नीति में बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करे और क्षेत्रीय समीकरणों को टकराव के बजाय राजनीतिक संवाद के जरिए संभाले।हालांकि ईरान की इस स्थिति को उसके अपने क्षेत्रीय हितों के संदर्भ में भी देखना होगा।
आखिर क्या है ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का में हुए समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा।समझौते का घोषित उद्देश्य सामूहिक रक्षा क्षमता, प्रतिरोधक क्षमता और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है।मक्का के अल-सफा पैलेस में हुई बैठक के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।तुर्किये की ओर से इसे रक्षात्मक प्रकृति का बताया गया है।सऊदी अरब ने भी स्पष्ट किया है कि यह किसी सैन्य गुट या धार्मिक आधार पर बने गठबंधन की शुरुआत नहीं है और इसका उद्देश्य रक्षा क्षमताओं तथा आपसी सहयोग को मजबूत करना है।
क्या यह ‘मध्य-पूर्व का NATO’ है?
यहीं से इस समझौते की सबसे बड़ी रणनीतिक चर्चा शुरू होती है।नाटो की मूल अवधारणा सामूहिक रक्षा पर आधारित है—एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन के खिलाफ हमला माना जाता है।मक्का समझौते में भी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों के खिलाफ हमला मानने की बात इसे नाटो की सामूहिक सुरक्षा अवधारणा से जोड़ती है।लेकिन रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दोनों की तुलना करते समय सावधानी जरूरी है।
नाटो एक व्यापक संस्थागत सैन्य गठबंधन है, जिसके पास साझा कमान संरचना, सैन्य योजनाएं, लंबे समय से विकसित प्रक्रियाएं और सामूहिक रक्षा की विस्तृत व्यवस्था है।इसके विपरीत मक्का समझौता अभी तीन देशों के बीच एक अपेक्षाकृत नया सुरक्षा ढांचा है।इसलिए इसे सीधे ‘NATO 2.0’ कहना जल्दबाजी होगी।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर—समझौते की असली ताकत उसके लागू होने में
रक्षा विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसी सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में बाकी दो देश वास्तव में किस स्तर तक सैन्य सहायता देंगे।
क्या संयुक्त सैन्य कमान बनेगी?
क्या साझा सैन्य अभ्यास बढ़ेंगे?
क्या खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान होगा?
क्या एयर डिफेंस और मिसाइल डिफेंस में सहयोग बढ़ेगा?
क्या तीनों देशों के बीच हथियार प्रणालियों और सैन्य तकनीक में समन्वय होगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मक्का समझौता केवल राजनीतिक घोषणा है या वास्तविक सुरक्षा ढांचा।कागज पर सामूहिक रक्षा की गारंटी देना आसान है; उसे युद्ध की वास्तविक परिस्थिति में लागू करना कहीं अधिक कठिन।
ईरान क्यों चिंतित हो सकता है?
ईरान और सऊदी अरब के बीच पिछले वर्षों में संबंध सुधारने की कोशिशें हुई हैं, लेकिन क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।दोनों देश पश्चिम एशिया की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं और उनके रणनीतिक हित कई मामलों में अलग रहे हैं।ऐसे में सऊदी अरब का पाकिस्तान और तुर्किये जैसे सैन्य एवं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना तेहरान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।ईरान की चिंता केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं हो सकती।यदि तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग लगातार बढ़ता है तो पश्चिम एशिया और उससे जुड़े मुस्लिम देशों के शक्ति-संतुलन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
पाकिस्तान की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
पाकिस्तान के लिए यह समझौता कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।पहला—सऊदी अरब के साथ उसके पुराने राजनीतिक और सुरक्षा संबंध हैं।
दूसरा—पाकिस्तान के पास एक बड़ा सैन्य ढांचा और परमाणु क्षमता है।
तीसरा—तुर्किये के साथ भी पाकिस्तान के रक्षा संबंध लगातार विकसित हुए हैं।इसलिए सऊदी अरब को सुरक्षा सहयोग देने में पाकिस्तान की भूमिका इस समझौते को साधारण राजनयिक समझौते से अधिक रणनीतिक महत्व दे सकती है।हालांकि विशेषज्ञों के लिए यह भी सवाल रहेगा कि पाकिस्तान एक साथ सऊदी अरब, तुर्किये, चीन, अमेरिका और ईरान के साथ अपने संबंधों का संतुलन कैसे बनाए रखता है।
तुर्किये को क्या मिलेगा?
तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोआन लंबे समय से अपने देश की क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं।सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग तुर्किये को खाड़ी क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर देता है।तुर्किये की रक्षा उद्योग क्षमता भी पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ी है। ड्रोन, मिसाइल, नौसैनिक प्रणालियों और अन्य सैन्य तकनीकों के क्षेत्र में उसकी भूमिका बढ़ी है।इसलिए मक्का समझौता भविष्य में केवल सैनिकों की साझेदारी तक सीमित न रहकर रक्षा उद्योग और सैन्य तकनीकी सहयोग तक भी जा सकता है।
सऊदी अरब का संदेश—अमेरिका के विकल्प तलाशना?
सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छाते पर निर्भर रहा है। लेकिन पिछले वर्षों में रियाद ने अपनी विदेश नीति में अधिक रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने की कोशिश की है।चीन के साथ संबंधों का विस्तार, रूस के साथ ऊर्जा संबंध और क्षेत्रीय देशों के साथ नए संवाद इसी व्यापक नीति का हिस्सा माने जाते हैं।पाकिस्तान और तुर्किये के साथ रक्षा समझौता भी इसी बहु-आयामी सुरक्षा नीति का हिस्सा हो सकता है।इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बना रहा है।
बल्कि अधिक संभावित व्याख्या यह है कि रियाद एक से अधिक सुरक्षा साझेदारों के साथ संबंध बनाकर अपनी रणनीतिक निर्भरता कम करना चाहता है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए पश्चिम एशिया की स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है।भारत के खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश और प्रवासी भारतीयों से जुड़े व्यापक हित हैं। सऊदी अरब भारत के महत्वपूर्ण साझेदारों में शामिल है, जबकि तुर्किये और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों का अपना अलग रणनीतिक संदर्भ है।यदि मक्का समझौता क्षेत्र में स्थिरता और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाता है तो भारत के हित में होगा।लेकिन यदि यह समझौता भविष्य में किसी बड़े क्षेत्रीय सैन्य ध्रुवीकरण का आधार बनता है तो नई रणनीतिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
नई दिल्ली के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही होगी कि यह नया सुरक्षा ढांचा किसी तीसरे देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन में बदलता है या वास्तविक रूप से रक्षात्मक सहयोग तक सीमित रहता है।
भारतीय विदेश मंत्रालय की संभावित प्राथमिकता
भारत आमतौर पर पश्चिम एशिया में अपने संबंधों को किसी एक धड़े तक सीमित रखने के बजाय सभी प्रमुख पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।सऊदी अरब के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी, ईरान के साथ चाबहार और क्षेत्रीय संपर्क से जुड़े हित तथा खाड़ी क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की बड़ी आबादी—ये सभी कारक नई दिल्ली को अत्यंत संतुलित कूटनीति की आवश्यकता बताते हैं।इसलिए भारत के लिए इस समझौते का मूल्यांकन भावनात्मक या धार्मिक चश्मे से नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता के आधार पर करना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
भारतीय विपक्ष की संभावित दृष्टि
भारत में विपक्ष इस घटनाक्रम को केंद्र सरकार की विदेश नीति और पश्चिम एशिया में भारत के रणनीतिक हितों के संदर्भ में उठा सकता है।विपक्ष सरकार से यह सवाल कर सकता है कि भारत सऊदी अरब, ईरान और अन्य पश्चिम एशियाई देशों के बीच बदलते सुरक्षा समीकरण में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को किस तरह सुरक्षित रख रहा है।
दूसरी ओर सरकार यह तर्क दे सकती है कि भारत की विदेश नीति का आधार किसी सैन्य गुट में शामिल होना नहीं, बल्कि सभी प्रमुख देशों के साथ राष्ट्रीय हित के आधार पर संबंध विकसित करना है।इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस का वास्तविक केंद्र यही होगा कि भारत बदलते पश्चिम एशियाई शक्ति-संतुलन में अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका कैसे बनाए रखे।
शिक्षाविदों की नजर में बदलती दुनियाअंतरराष्ट्रीय संबंधों के
शिक्षाविद इस समझौते को वैश्विक राजनीति में एक बड़े बदलाव के संदर्भ में देख सकते हैं।शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक सुरक्षा संरचनाएं मुख्यतः अमेरिका और उसके सहयोगियों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहीं। अब क्षेत्रीय शक्तियां अपनी स्वतंत्र सुरक्षा साझेदारियां बनाने लगी हैं।मध्य-पूर्व में यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।सऊदी अरब, तुर्किये और ईरान जैसे देश केवल बाहरी महाशक्तियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षेत्रीय भूमिका मजबूत करना चाहते हैं।यही पश्चिम एशिया को आने वाले वर्षों में और अधिक बहुध्रुवीय बना सकता है।
असली सवाल—क्या कागज युद्ध रोक सकता है?
ईरान का तंज राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन उसके पीछे एक रणनीतिक प्रश्न जरूर है।क्या किसी सुरक्षा समझौते की ताकत केवल उसके शब्दों में होती है या उसके पीछे मौजूद सैन्य क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और साझा रणनीति में?
मक्का समझौते की वास्तविक परीक्षा किसी सम्मेलन कक्ष में नहीं होगी।उसकी परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक देश के सामने वास्तविक सुरक्षा संकट खड़ा होगा।यदि उस स्थिति में बाकी दो देश तत्काल और प्रभावी सहायता देने में सक्षम होते हैं, तो समझौता वास्तविक प्रतिरोधक क्षमता में बदल सकता है।यदि ऐसा नहीं होता, तो ईरान का ‘कागजी समझौते’ वाला तंज राजनीतिक विमर्श में बार-बार लौट सकता है।
निष्कर्ष:
पश्चिम एशिया में नई सुरक्षा पहेली
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये का मक्का संयुक्त रक्षा समझौता पश्चिम एशिया और उससे जुड़े व्यापक मुस्लिम विश्व के बदलते रणनीतिक समीकरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।ईरान इसे सुरक्षा की स्थायी गारंटी नहीं मानता। सऊदी अरब इसे रक्षा क्षमता मजबूत करने वाला समझौता बता रहा है। तुर्किये इसे रक्षात्मक सहयोग के रूप में देख रहा है और पाकिस्तान के लिए यह अपनी क्षेत्रीय रणनीतिक भूमिका मजबूत करने का अवसर है।
लेकिन इस समझौते की असली कहानी अभी शुरू हुई है।क्या यह तीन देशों की सीमित रक्षा साझेदारी रहेगी?
क्या आगे चलकर इसमें दूसरे देश भी जुड़ेंगे?
क्या यह नाटो जैसी संस्थागत व्यवस्था का रूप लेगा?
या फिर यह केवल बदलते पश्चिम एशियाई शक्ति-संतुलन के बीच एक रणनीतिक संदेश बनकर रह जाएगा?
इन सवालों का जवाब आने वाला समय देगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व में सुरक्षा की पुरानी व्यवस्थाएं बदल रही हैं और नई साझेदारियां आकार ले रही हैं।
भारत के लिए चुनौती भी यही है और अवसर भी—इस बदलती भू-राजनीति में किसी गुट का हिस्सा बने बिना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना।
