31 साल बाद घर लौटा मां का खोया लाल! आंख के ऊपर कट के निशान ने खोल दिया पहचान का राज, पिंटू यादव बन चुका था अब्दुल जब्बार, लेकिन मां की ममता ने 31 साल बाद भी नहीं भुलाया बेटे का चेहरा

बी के झा -एन एस के

NSK news India

कटिहार ( बिहार) , 23 अक्टूबर

वक्त के साथ इंसान का चेहरा बदल सकता है, नाम बदल सकता है और जिंदगी की राहें भी अनजान मोड़ ले सकती हैं, लेकिन मां की आंखों में अपने बच्चे की पहचान शायद कभी धुंधली नहीं पड़ती। बिहार के कटिहार जिले में 31 साल पुरानी एक ऐसी ही कहानी सामने आई है, जिसने रिश्तों की गहराई और मां की ममता को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

आठ साल की उम्र में घर से बिछड़ा पिंटू यादव जब तीन दशक से अधिक समय बाद अपने गांव लौटा, तो उसकी पहचान बदल चुकी थी। बचपन में जिस नाम से उसे पुकारा जाता था, उसकी जगह अब अब्दुल जब्बार नाम ने ले ली थी। मगर आंख के ऊपर कट के निशान ने अतीत के बंद दरवाजे खोल दिए।

कटिहार के मनिहारी प्रखंड स्थित कांटाकोष गांव में बेटे की वापसी की खबर फैलते ही लोगों की भीड़ जुटने लगी। जिस बच्चे के लौटने की उम्मीद परिवार ने शायद वर्षों पहले छोड़ दी होगी, वह अचानक सामने खड़ा था। मां की आंखें भर आईं, पिता और भाई ने उसे गले लगा लिया।

31 वर्षों का लंबा अंतराल एक पल में सिमटता नजर आया।

आठ साल की उम्र में छूटा घर, फिर शुरू हुआ अनजान सफर

परिजनों के मुताबिक, पिंटू यादव बचपन में अपने दोस्तों के साथ ट्रेन में चढ़ गया था। सफर के दौरान उसे नींद आ गई। उसके दोस्त ट्रेन से उतर गए, लेकिन पिंटू सोता रह गया। जब उसकी आंख खुली, तब तक ट्रेन उसे घर और परिचित दुनिया से दूर पश्चिम बंगाल के राधिकापुर इलाके तक ले जा चुकी थी।कम उम्र में अनजान जगह पर अकेले पड़ गए पिंटू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने घर तक पहुंचने की थी। उसे न रास्तों की जानकारी थी और न ही इतनी समझ कि अपने परिवार को खोज सके। इसी भटकाव के दौरान हरिकृष्णपुरी निवासी अब्दुल रहीम ने उसे सहारा दिया और अपने घर ले जाकर उसका पालन-पोषण किया।

समय गुजरता गया। पिंटू की पुरानी पहचान पीछे छूटती चली गई और उसका नाम अब्दुल जब्बार पड़ गया। जिस बच्चे का बचपन बिहार के कटिहार जिले में बीता था, उसकी जिंदगी अब पश्चिम बंगाल में आगे बढ़ने लगी।नाम बदला, परिवार बसा, लेकिन अतीत से रिश्ता फिर जुड़ा

परिजनों के अनुसार, बड़े होने पर अब्दुल जब्बार की शादी पश्चिम बंगाल की मुतैना खातून से हुई। उसके दो बेटे और एक बेटी हैं। इस तरह जिंदगी ने उसे एक नया परिवार और नई पहचान दे दी। मगर उसकी कहानी का सबसे भावुक अध्याय तब सामने आया, जब 31 साल बाद उसका अपने पैतृक घर से संपर्क जुड़ा और वह अपने गांव लौट आया।

बचपन में बिछड़ने के बाद तीन दशक से अधिक समय तक परिवार से दूर रहने वाले पिंटू की वापसी ने गांव के लोगों को हैरान कर दिया। ग्रामीण उसे कभी पिंटू यादव के रूप में जानते थे, जबकि अब वह अब्दुल जब्बार के नाम से पहचाना जाता है। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल था कि इतने वर्षों बाद कोई व्यक्ति अपने बचपन के घर लौटे और उसके जीवन की कहानी इतनी बदल चुकी हो।

आंख के ऊपर का निशान बना पहचान की कड़ी

इस पूरी कहानी में सबसे भावुक पहलू मां की पहचान से जुड़ा है। समय के साथ चेहरे में बदलाव आना स्वाभाविक है। बचपन की तस्वीरें भी कई बार यादों में धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन मां के लिए अपने बच्चे से जुड़ी छोटी-छोटी बातें भी अनमोल होती हैं। आंख के ऊपर कट का निशान इस पहचान की अहम कड़ी के रूप में सामने आया।इसी निशान ने पुराने दिनों की यादों को ताजा कर दिया और वर्षों से बिछड़े बेटे की पहचान से जुड़ी कहानी को नया मोड़ दिया। हालांकि, परिवार के पुनर्मिलन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया और पहचान की पुष्टि के अन्य विवरण सामने आना अभी बाकी है।

31 साल की दूरी के बाद भावनाओं का मिलन

पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार की कहानी केवल एक बिछड़े बेटे की घर वापसी नहीं है। यह उस अनिश्चितता की कहानी भी है, जिसमें एक बच्चा अनजाने सफर पर निकलता है और फिर उसकी जिंदगी ऐसी दिशा पकड़ लेती है, जिसकी कल्पना उसके परिवार ने कभी नहीं की होगी।आठ साल की उम्र में ट्रेन में छूटा बच्चा जब वापस लौटा, तब तक उसकी जिंदगी में कई बदलाव आ चुके थे। एक तरफ उसका बचपन का परिवार था, तो दूसरी तरफ वह परिवार था, जिसने उसे सहारा दिया और बड़ा किया।

कटिहार के कांटाकोष गांव में इस वापसी ने पुराने रिश्तों को फिर से सामने ला खड़ा किया है। 31 साल का लंबा इंतजार, बदली हुई पहचान और आंख के ऊपर मौजूद एक छोटा-सा निशान—इन सबके बीच मां और बेटे का मिलन इस कहानी का सबसे मार्मिक हिस्सा बन गया।

एन एस के का दृष्टिकोण:

जिंदगी कभी-कभी इंसान को ऐसे रास्तों पर ले जाती है, जहां उसकी पहचान और रिश्ते वक्त के साथ बदलते चले जाते हैं।

लेकिन पिंटू यादव की घर वापसी की यह कहानी याद दिलाती है कि बीते हुए कल से जुड़ी एक छोटी-सी निशानी भी कभी-कभी दशकों की दूरी मिटाने का जरिया बन सकती है।

एन एस के पोर्टल – खबर वही, नजर अलग।

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