बी के झा, एनएसके विशेष रिपोर्ट
NSK news India

पुलवामा, 23 अक्टूबर
कश्मीर की धरती पर बदलाव की कहानी अब केवल सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद और राजनीतिक घटनाक्रमों तक सीमित नहीं है। यहां सामाजिक संगठनों की सक्रियता, मजदूरों के हितों और वैचारिक पहुंच को लेकर भी नई गतिविधियां सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के बारसू गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने अपना सार्वजनिक कार्यालय खोला है। संगठन इसे कश्मीर घाटी में अपनी गतिविधियों को खुले तौर पर आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहा है।
पुलवामा लंबे समय तक आतंकवाद और सुरक्षा संबंधी घटनाओं के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है। ऐसे क्षेत्र में किसी राष्ट्रव्यापी श्रमिक संगठन का सार्वजनिक कार्यालय खुलना इसलिए भी चर्चा का विषय है, क्योंकि इससे घाटी में संगठनात्मक विस्तार, श्रमिकों के बीच संपर्क और सामाजिक स्वीकार्यता जैसे मुद्दे जुड़ते हैं।
हालांकि, इस घटनाक्रम को पूरे कश्मीर में वैचारिक बदलाव का निर्णायक प्रमाण मानने के बजाय स्थानीय स्तर पर संगठन की बढ़ती गतिविधि के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
बारसू से संदेश: कश्मीर में संगठन का सार्वजनिक विस्तार
भारतीय मजदूर संघ के कश्मीर प्रभारी समीर कुचाय के मुताबिक, बारसू गांव में खोला गया कार्यालय घाटी में RSS से जुड़े किसी संगठन का पहला आधिकारिक सार्वजनिक कार्यालय है। उनके अनुसार, कार्यालय खुलने से पहले भी भारतीय मजदूर संघ कश्मीर में सक्रिय था, लेकिन अब संगठन अपनी गतिविधियों को अधिक व्यवस्थित और सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाना चाहता है।यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब जम्मू-कश्मीर में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर विभिन्न संगठनों की भूमिका पर लगातार चर्चा होती रही है।
भारतीय मजदूर संघ का यह कदम केवल एक कार्यालय की स्थापना तक सीमित नहीं है। संगठन के लिए यह श्रमिकों के साथ सीधा संवाद स्थापित करने, उनकी समस्याओं को सुनने और अपने नेटवर्क को मजबूत करने का अवसर भी हो सकता है।हालांकि, कार्यालय खुलने से स्थानीय श्रमिकों को वास्तव में कितना लाभ मिलेगा, यह आने वाले समय में संगठन की गतिविधियों, श्रमिकों की भागीदारी और उनकी समस्याओं के समाधान से स्पष्ट होगा।
30 हजार मजदूरों से जुड़ाव का दावा, 20 संगठनों का समर्थन
समीर कुचाय के अनुसार, भारतीय मजदूर संघ का संपर्क घाटी के लगभग 20 मजदूर संगठनों से है, जिनसे जुड़े करीब 30 हजार मजदूर संगठन के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि कश्मीर में संगठन का प्रभाव बढ़ रहा है और अधिक लोग उसकी गतिविधियों में भाग ले रहे हैं।यदि यह आंकड़ा संगठनात्मक स्तर पर प्रभावी भागीदारी में तब्दील होता है, तो भारतीय मजदूर संघ के लिए घाटी में श्रमिकों से जुड़ने का एक व्यापक आधार तैयार हो सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है: क्या यह जुड़ाव केवल संगठनात्मक संपर्क तक सीमित है, या इसके जरिए श्रमिकों को रोजगार, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर अधिकारों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में भी मदद मिल रही है?
किसी भी मजदूर संगठन की वास्तविक ताकत केवल उसके सदस्यों की संख्या से नहीं, बल्कि श्रमिकों के हितों की रक्षा करने की उसकी क्षमता से निर्धारित होती है।इसलिए बारसू कार्यालय की सफलता का आकलन इस आधार पर भी किया जाएगा कि संगठन स्थानीय मजदूरों की समस्याओं को कितनी प्रभावी ढंग से उठाता है और उनके अधिकारों के लिए किस तरह काम करता है।
370 हटने के बाद बदली परिस्थितियों का दावा
समीर कुचाय का कहना है कि वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर में काम करने की परिस्थितियों में बदलाव आया। उनके मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों से संगठन के लोग घाटी में बिना किसी डर के काम कर रहे हैं और अब सार्वजनिक कार्यालय के माध्यम से अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया गया है।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक प्रावधानों को समाप्त करने और राज्य के पुनर्गठन का फैसला किया था। इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक, राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
हालांकि, अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में सामाजिक संगठनों के कामकाज पर पड़े प्रभाव का आकलन किसी एक संगठन के अनुभव के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए सुरक्षा स्थिति, स्थानीय लोगों की भागीदारी, रोजगार, राजनीतिक गतिविधियों और नागरिक स्वतंत्रताओं सहित कई पहलुओं को देखना होगा।
भारतीय मजदूर संघ के लिए सार्वजनिक कार्यालय की स्थापना संगठनात्मक विस्तार का संकेत हो सकती है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता स्थानीय समाज के साथ उसके संबंधों और कार्यों पर निर्भर करेगी।
मुस्लिम बहुल घाटी में RSS की छवि बदलने की चुनौती
कश्मीर घाटी में RSS की सामाजिक और वैचारिक छवि लंबे समय से चर्चा और राजनीतिक बहस का विषय रही है। ऐसे माहौल में समीर कुचाय का कहना है कि RSS को मुस्लिम-विरोधी संगठन मानना सही नहीं है।कुचाय ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि मुस्लिम समुदाय से होने के बावजूद उन्हें संगठन में काम करते समय भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। उनके अनुसार, उनसे यह सवाल जरूर किया जाता रहा कि कोई व्यक्ति मानवता की सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए किस तरह काम कर सकता है।उनका मानना है कि किसी संगठन के बारे में राय बनाने से पहले उसकी गतिविधियों को करीब से समझना जरूरी है।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कश्मीर में किसी भी संगठन की स्वीकार्यता केवल उसके दावों से तय नहीं होगी। स्थानीय लोगों का अनुभव, संगठन की कार्यशैली, सामाजिक मुद्दों पर उसका रुख और विभिन्न समुदायों के साथ उसका व्यवहार भी उसकी छवि को प्रभावित करेंगे।
यदि भारतीय मजदूर संघ श्रमिकों के अधिकारों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर ठोस काम करता है, तो इससे स्थानीय स्तर पर उसके प्रति भरोसा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, संगठन की गतिविधियों और दावों का मूल्यांकन स्वतंत्र रूप से किया जाना भी जरूरी होगा।
कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी संगठन की असली परीक्षा उसके परिचय से अधिक उसके काम और स्थानीय समाज के साथ उसके संबंधों से होती है।
युवाओं के हाथों में पत्थर नहीं, कलम होनी चाहिए
समीर कुचाय ने कश्मीर के युवाओं की शिक्षा और भविष्य को लेकर भी अपनी बात रखी। उनके अनुसार, घाटी में लोगों की सोच में बदलाव आया है और अब बच्चों की पढ़ाई तथा उनके भविष्य को लेकर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।उन्होंने कहा कि युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकों के बजाय कलम होनी चाहिए।यह संदेश कश्मीर के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ी एक व्यापक आवश्यकता की ओर ध्यान खींचता है।
शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता के अवसर किसी भी क्षेत्र के युवाओं को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।हालांकि, कश्मीर के युवाओं के सामने मौजूद चुनौतियों को केवल सुरक्षा या वैचारिक बदलाव के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक विश्वास जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।यदि सामाजिक संगठन युवाओं को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने में वास्तविक योगदान देते हैं, तो उनका प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है।
भारतीय मजदूर संघ के लिए आगे की राह क्या होगी?
बारसू में कार्यालय की स्थापना भारतीय मजदूर संघ के लिए घाटी में अपनी उपस्थिति को सार्वजनिक रूप से मजबूत करने का अवसर है। लेकिन किसी कार्यालय का खुलना और समाज में स्थायी स्वीकार्यता हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं।
आने वाले समय में संगठन के सामने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होंगी:
श्रमिकों के अधिकार: स्थानीय मजदूरों को वेतन, काम की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में सहायता देना।
स्थानीय संपर्क: घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में श्रमिकों की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए संबंधित संस्थाओं से संवाद करना।
युवाओं के अवसर: शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार से जुड़ी पहलों को प्रोत्साहित करना।
सामाजिक विश्वास: विभिन्न समुदायों के साथ संवाद और व्यावहारिक सहयोग के जरिए भरोसा कायम करना।
पारदर्शिता: संगठन की सदस्यता, गतिविधियों और श्रमिकों को मिले लाभों के बारे में स्पष्ट जानकारी देना।
इन क्षेत्रों में ठोस काम होने पर ही यह तय किया जा सकेगा कि बारसू में कार्यालय खोलना संगठन के लिए कितना प्रभावी कदम साबित होता है।
एनएसके विश्लेषण:
पुलवामा में नया कार्यालय, लेकिन असली कहानी अभी बाकी है
पुलवामा के बारसू गांव में भारतीय मजदूर संघ का सार्वजनिक कार्यालय खुलना कश्मीर में संगठन की गतिविधियों के विस्तार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
RSS से संबद्ध संगठन इसे घाटी में अपनी मौजूदगी को सार्वजनिक और व्यवस्थित बनाने की दिशा में कदम बता रहा है।कश्मीर प्रभारी समीर कुचाय का दावा है कि संगठन का संपर्क 20 मजदूर संगठनों से जुड़े करीब 30 हजार श्रमिकों तक है।
उन्होंने अनुच्छेद 370 हटने के बाद कामकाज की परिस्थितियों में बदलाव और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ती जागरूकता की बात भी कही है। लेकिन इस घटनाक्रम का महत्व केवल RSS से जुड़े संगठन के कार्यालय खुलने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
असली सवाल यह है कि क्या इस पहल से स्थानीय मजदूरों को अपने अधिकारों की रक्षा में मदद मिलेगी?
क्या युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे?
और क्या संगठन स्थानीय समाज का भरोसा जीत पाएगा?
इन सवालों के जवाब समय और काम के आधार पर मिलेंगे।कश्मीर में किसी संगठन की सफलता का पैमाना केवल उसकी मौजूदगी नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन में आने वाला वास्तविक बदलाव होना चाहिए।
यदि बारसू का यह कार्यालय श्रमिकों की समस्याओं के समाधान, युवाओं के अवसरों और सामाजिक सहयोग का केंद्र बनता है, तो इसका प्रभाव संगठनात्मक विस्तार से आगे जा सकता है।
लेकिन यदि गतिविधियां केवल दावों तक सीमित रहती हैं, तो कार्यालय खुलने का प्रतीकात्मक महत्व अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा।
एनएसके न्यूज डेस्क
