बी के झा – एन एस के
NSK news India

नई दिल्ली/सेबू: 28 अक्टूबर
भारत की सामरिक ताकत, वैश्विक प्रतिष्ठा और राजनीतिक मर्यादा को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दो अलग-अलग मंचों से ऐसा संदेश दिया, जिसके केंद्र में एक ही बात रही—भारत अब न अपनी सुरक्षा से समझौता करता है और न ही सार्वजनिक जीवन में अपमानजनक भाषा को उचित मानता है।
फिलीपींस में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत किसी को उकसाता नहीं, लेकिन यदि कोई उसे उकसाता है तो उसे कड़ा जवाब देने की क्षमता भी रखता है।

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की टिप्पणी को लेकर उन्होंने कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हुए व्यक्तिगत मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करने की नसीहत दी।
रक्षा मंत्री के इन बयानों ने राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर राजनीतिक संवाद की शालीनता तक, दो अहम मुद्दों पर भारत सरकार का रुख सामने रखा है। एक तरफ देश की सैन्य तैयारियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का संदेश है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक विरोध की भाषा और उसकी सीमाओं को लेकर सख्त सवाल।
भारत की ताकत पर दुनिया को संदेश, ‘अब देश कमजोर नहीं’
फिलीपींस के सेबू में 13वीं आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (ADMM-Plus) के दौरान भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा लगातार बढ़ी है। उनके मुताबिक, आज भारत की बात को दुनिया गंभीरता से सुनती है और देश की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता इसकी बड़ी पहचान है।उन्होंने कहा कि यदि दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ी होती, तो 35 देशों के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित नहीं करते। रक्षा मंत्री ने इस संदर्भ में भारत की आर्थिक प्रगति, रक्षा क्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का उल्लेख किया।
राजनाथ सिंह का संदेश स्पष्ट था—भारत अब वैश्विक मामलों में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला देश नहीं, बल्कि अपनी बात मजबूती से रखने और अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता रखने वाली शक्ति है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र कर बताया बदले भारत का रुख
रक्षा मंत्री ने भारत की सैन्य तैयारियों और सुरक्षा नीति का उल्लेख करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को भी याद किया। उन्होंने कहा, ‘हमारा देश अब कमजोर नहीं है। किसी को भी हम उकसाते नहीं हैं, लेकिन यदि कोई हमें उकसाता है, तो हम उसे छोड़ते नहीं हैं।’उनके इस बयान को भारत की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख के संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। राजनाथ सिंह ने जोर दिया कि देश की रक्षा तैयारियां पहले से अधिक मजबूत हुई हैं।उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत अपनी सैन्य क्षमता के आधुनिकीकरण, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को लगातार महत्व दे रहा है।
रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन के जरिए भारतीय समुदाय को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों में भारत अपने हितों की रक्षा करने से पीछे नहीं हटेगा।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारत की पहचान, दुनिया को मानता है परिवार
राजनाथ सिंह ने भारत की सांस्कृतिक परंपरा और वैश्विक दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को अपना परिवार मानता है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति की विशेषता उसकी व्यापकता और सबको साथ लेकर चलने की भावना है।
उन्होंने नाग पंचमी पर सांपों को भी दूध पिलाने की परंपरा का उदाहरण देकर भारतीय समाज की जीव-जंतुओं के प्रति आस्था और संवेदनशीलता को रेखांकित किया।रक्षा मंत्री के मुताबिक, भारत की पहचान केवल उसकी सैन्य या आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक सोच और वैश्विक सहयोग की भावना से भी बनती है। यह संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब दुनिया के कई हिस्से संघर्ष, तनाव और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं।
पश्चिम एशिया का संकट नहीं होता तो शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में होता भारत!
भारत की आर्थिक स्थिति पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल दुनिया में पांचवें स्थान पर है और आने वाले समय में उसकी स्थिति और मजबूत होगी।उन्होंने कहा, ‘हमारी इकोनॉमी विश्व में पांचवें नंबर पर है। अगर पश्चिम एशिया में संकट न होता, तो हम अब तक विश्व की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुके होते।
खैर, ऐसा तो होना ही है।
‘रक्षा मंत्री ने आर्थिक प्रगति को भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए भरोसा जताया कि देश आने वाले समय में और बड़ी उपलब्धियां हासिल करेगा।हालांकि, भारत का तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना कई आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है। पश्चिम एशिया का संकट ऊर्जा की कीमतों, व्यापार और निवेश को प्रभावित कर सकता है, लेकिन अर्थव्यवस्था की रैंकिंग पर उसका सटीक प्रभाव निर्धारित करने के लिए अलग-अलग आर्थिक संकेतकों का आकलन जरूरी है।
खरगे के बयान पर राजनाथ का पलटवार, बोले—स्तरहीन राजनीति शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची
विदेश में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और सुरक्षा का संदेश देने वाले राजनाथ सिंह ने घरेलू राजनीति में भी कांग्रेस को कड़े शब्दों में घेरा। विवाद की जड़ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की वह टिप्पणी है, जो उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में एक सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की थी।
खरगे वोट चोरी के मुद्दे पर भाषण दे रहे थे। इसी दौरान भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा, ‘मोदी कहीं नहीं जाएंगे।’ इस पर खरगे ने जवाब दिया, ‘मोदी का बाप भी जाएगा।’इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री के परिवार के प्रति अपमानजनक बताते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। बीजेपी के कई नेताओं ने खरगे की आलोचना की और पार्टी से उनके बयान पर जवाब मांगा।घटना के दौरान सभा में मौजूद एक व्यक्ति की पिटाई किए जाने की भी खबर सामने आई। बाद में उसकी पहचान कांग्रेस कार्यकर्ता संतोष कुमार के रूप में बताई गई। इस घटनाक्रम ने विवाद को और तूल दे दिया।
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस नेतृत्व राजनीतिक विरोध की आड़ में व्यक्तिगत टिप्पणियों की सीमा पार कर रहा है। हालांकि, खरगे की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस की प्रतिक्रिया और उसके स्पष्टीकरण को भी पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में देखना जरूरी है।
‘करोड़ों देशवासियों की भावनाएं आहत हुईं’
राजनाथ सिंह ने खरगे की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस बयान से स्तब्ध और आहत हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस पार्टी को देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने पर गर्व है, उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष से इस तरह की भाषा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
रक्षा मंत्री ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में बड़े पदों पर बैठे व्यक्तियों से अधिक गंभीरता, संयम और जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है। उनके मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष के बयान से करोड़ों देशवासियों की भावनाएं आहत हुई हैं।राजनाथ सिंह ने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि गलती स्वीकार करने और खेद जताने के बजाय पार्टी अपने अध्यक्ष के शब्दों का बचाव कर रही है।
उन्होंने कहा कि ऐसा आचरण कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।उन्होंने अपने बयान में कहा कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन किसी व्यक्ति के परिवार को निशाना बनाना और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
‘माताजी पर अभद्र भाषा से लेकर पिता पर टिप्पणी तक, कहां जा रही राजनीति?
‘रक्षा मंत्री ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि इससे पहले भी प्रधानमंत्री की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी दिवंगत माता को लेकर विवादित टिप्पणियां की जाती रही हैं। उनके अनुसार, अब इस तरह की राजनीति पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गई है।राजनाथ सिंह ने कहा कि वैचारिक विरोध को व्यक्तिगत अपमान में बदल देना और राजनीतिक असहमति को अभद्र भाषा तक ले जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कांग्रेस की राजनीति को हताशा और वैचारिक शून्यता से जोड़ते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को सरकार की नीतियों की आलोचना करने और प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन विरोध की अभिव्यक्ति में मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
‘व्यक्तिगत मर्यादाओं का उल्लंघन मत कीजिए’, कांग्रेस को सीधी चेतावनी
राजनाथ सिंह ने कांग्रेस को स्पष्ट शब्दों में नसीहत देते हुए कहा, ‘लोकतंत्र में विरोध कीजिए, नीतियों पर सवाल उठाइए, सरकार की आलोचना कीजिए, लेकिन व्यक्तिगत मर्यादाओं का उल्लंघन मत कीजिए।’उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस तरह की टिप्पणियों से न तो विचलित किया जा सकता है और न ही जनसेवा के प्रति उनके संकल्प को कमजोर किया जा सकता है।
रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता हर बात का हिसाब रखती है और समय आने पर अपना जवाब देती है।उनके इस बयान को बीजेपी की ओर से कांग्रेस पर राजनीतिक और नैतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक टकराव और व्यक्तिगत हमलों के बीच की सीमा कहां तय होनी चाहिए।
सियासत का बड़ा सवाल: मुद्दों पर मुकाबला या परिवार पर हमला?
राजनाथ सिंह के दोनों बयानों को साथ रखकर देखें तो एक तरफ भारत की सैन्य शक्ति, आर्थिक महत्वाकांक्षा और वैश्विक भूमिका का संदेश है, तो दूसरी तरफ देश की राजनीति में भाषा और मर्यादा को लेकर बहस।
फिलीपींस में उनका जोर इस बात पर रहा कि भारत शांति और सहयोग में विश्वास करता है, लेकिन अपनी सुरक्षा के मामले में किसी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। वहीं, खरगे के बयान पर उनकी प्रतिक्रिया ने राजनीतिक दलों के सामने यह सवाल रखा कि लोकतंत्र में विरोध की धार नीतियों और विचारों पर होनी चाहिए या नेताओं के परिवारों तक पहुंचनी चाहिए।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सत्ता पक्ष से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और विपक्ष की आलोचना का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी। लेकिन जब बहस नीतियों से हटकर व्यक्तिगत टिप्पणियों पर केंद्रित हो जाती है, तो मूल मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि खरगे के बयान को लेकर कांग्रेस आगे क्या रुख अपनाती है और बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक विमर्श में किस तरह आगे बढ़ाती है।
फिलहाल राजनाथ सिंह का संदेश साफ है—भारत की सुरक्षा पर समझौता नहीं होगा और राजनीतिक विरोध के नाम पर व्यक्तिगत मर्यादाओं की अनदेखी भी स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
