इलाहाबाद हाई कोर्ट में हंगामे से हड़कंप! जज की ओर फेंकी गईं कुर्सियां, कोर्ट रूम में कैसे बेकाबू हुआ वकीलों का विरोध?

बी के झा – एन एस के

NSK news India

प्रयागराज, 28 अक्टूबर

न्याय का मंदिर कहे जाने वाले न्यायालय में जब विरोध की आवाजें हिंसक हंगामे में बदल जाएं, तो सवाल केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और संस्थागत मर्यादा का भी खड़ा होता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट में बुधवार, 28 अक्टूबर को ऐसा ही घटनाक्रम सामने आया, जब जस्टिस अजय भनोट की अदालत में वकीलों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारी हंगामा हुआ।

आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे कुछ वकीलों ने न्यायाधीश के आसन की ओर कुर्सियां और अन्य फर्नीचर फेंके। इससे कोर्ट रूम में अफरातफरी का माहौल बन गया।यह घटनाक्रम एक दिन पहले शुरू हुए विवाद का अगला चरण बताया जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने आरोप लगाया था कि जस्टिस भनोट की अदालत में एक वकील के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया। इसी के विरोध में एसोसिएशन ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने की चेतावनी दी थी।

बुधवार को विरोध ने जिस तरह उग्र रूप लिया, उसने न्यायिक परिसर में अनुशासन और वकीलों के विरोध के तौर-तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या था विवाद, जिसने बढ़ा दिया तनाव?

बार एसोसिएशन के आरोपों के मुताबिक, विवाद अदालत में बैठने की व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ था। बताया गया कि एक पुलिस अधीक्षक (SP) उस कतार में बैठे थे, जो सामान्यतः वकीलों के लिए आरक्षित रहती है। संबंधित वकील ने पुलिस अधीक्षक से पीछे की ओर बैठने का अनुरोध किया था। एसोसिएशन का दावा है कि इस घटनाक्रम के बाद जस्टिस अजय भनोट ने वकील से पुलिस अधीक्षक से माफी मांगने को कहा।

बार एसोसिएशन ने यह भी आरोप लगाया कि अदालत में पुलिस अधिकारियों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लिए अलग से कुर्सियां लगाई जा रही थीं।इन आरोपों के सामने आने के बाद वकीलों में नाराजगी बढ़ गई। हालांकि, घटनाक्रम के सभी पक्षों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन और न्यायाधीश का पक्ष सामने आना जरूरी है। फिलहाल इन आरोपों को बार एसोसिएशन के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

बहिष्कार की चेतावनी के अगले दिन कोर्ट रूम में हंगामा

बार एसोसिएशन ने मंगलवार को आरोप लगाया था कि संबंधित वकील को जेल भेजने की धमकी दी गई और एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता का भी मजाक उड़ाया गया। एसोसिएशन ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मामले का संज्ञान लेने और कथित दुर्व्यवहार पर कार्रवाई करने का आग्रह किया था।बार एसोसिएशन की चेतावनी थी कि यदि मामले में उचित कदम नहीं उठाए गए, तो वकील जस्टिस भनोट की अदालत का बहिष्कार करेंगे।इसके अगले दिन बुधवार को अदालत की कार्यवाही शुरू होने के दौरान कई वकील जस्टिस भनोट के कोर्ट रूम के बाहर जमा हो गए। उस समय जस्टिस भनोट के साथ जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत भी अदालत में मौजूद थे। इसी बीच नारेबाजी शुरू हुई और विरोध-प्रदर्शन ने उग्र रूप ले लिया।

आरोप है कि कुछ वकीलों ने न्यायाधीशों के आसन की ओर कुर्सियां और अन्य सामान फेंके। कुछ मीडिया रिपोर्टों में जस्टिस भनोट की ओर जूता फेंके जाने का दावा भी किया गया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे पुष्ट तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

न्यायिक गरिमा बनाम विरोध का अधिकार

इस घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है— क्या किसी कथित अन्याय के खिलाफ विरोध जताने का अधिकार अदालत की कार्यवाही और न्यायिक अनुशासन को प्रभावित करने तक जा सकता है?

वकील न्याय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता, अधिवक्ताओं के सम्मान और न्याय तक पहुंच से जुड़े सवाल उठाना उनकी पेशेवर भूमिका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी वकील के साथ अनुचित व्यवहार हुआ है, तो शिकायत दर्ज कराने और संबंधित न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष मुद्दा उठाने के संस्थागत रास्ते मौजूद हैं।लेकिन विरोध के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या न्यायाधीशों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाला आचरण सामने आता है, तो मामला केवल पेशेवर असहमति तक सीमित नहीं रहता।

ऐसी स्थिति में अदालत की गरिमा, न्यायिक कार्यवाही की निरंतरता और परिसर में मौजूद लोगों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि बार एसोसिएशन की शिकायत की निष्पक्ष जांच की मांग और कथित हिंसक व्यवहार का आकलन दो अलग-अलग विषय हैं। एक मामले में शिकायत की सत्यता तय होनी है, तो दूसरे में विरोध के दौरान हुए आचरण की जिम्मेदारी का प्रश्न उठता है।

कानून के जानकारों के लिए भी गंभीर सवाल

कानूनी दृष्टि से इस प्रकरण में दो पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

पहला, क्या संबंधित वकील के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ और यदि हुआ, तो शिकायत के निवारण के लिए कौन-सा संस्थागत कदम उचित होगा?

दूसरा, क्या विरोध के दौरान किसी व्यक्ति ने ऐसा आचरण किया, जिससे न्यायिक कार्यवाही बाधित हुई या अदालत की सुरक्षा और गरिमा प्रभावित हुई?

इन सवालों का जवाब आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आने के बाद ही दिया जा सकता है। केवल किसी संगठन के आरोप या घटनास्थल से जुड़ी अपुष्ट रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।

यदि अदालत के भीतर फर्नीचर फेंके जाने की घटना की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि घटना में कौन शामिल था, क्या नुकसान हुआ और क्या किसी की सुरक्षा को खतरा पहुंचा। साथ ही, वकील के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायत को भी निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत जांचा जाना चाहिए।

बार और बेंच के रिश्तों पर सवाल

न्यायिक व्यवस्था की मजबूती बार और बेंच के बीच परस्पर सम्मान, संवाद और संस्थागत विश्वास पर निर्भर करती है। न्यायाधीश न्यायिक प्रक्रिया का संचालन करते हैं, जबकि अधिवक्ता पक्षकारों के अधिकारों और कानूनी दलीलों को अदालत के सामने रखते हैं। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन न्याय सुनिश्चित करने का उद्देश्य साझा है।ऐसे में किसी विवाद का समाधान टकराव के बजाय संवाद और निर्धारित प्रक्रियाओं के जरिए होना चाहिए।

यदि वकील अपने सम्मान को लेकर शिकायत करते हैं, तो उसे गंभीरता से सुना जाना चाहिए। दूसरी ओर, विरोध के नाम पर अदालत की कार्यवाही बाधित करने या हिंसक व्यवहार को भी सामान्य नहीं माना जा सकता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में सामने आया यह घटनाक्रम इसी संतुलन की अहमियत को रेखांकित करता है। किसी एक पक्ष के आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय पूरी घटना की निष्पक्ष जांच और सभी संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

अब आगे क्या?

बुधवार को हुए हंगामे के बाद निगाहें इस बात पर रहेंगी कि हाई कोर्ट प्रशासन और बार एसोसिएशन इस विवाद को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाते हैं। साथ ही, अदालत के भीतर कथित तौर पर फर्नीचर फेंके जाने और जूता उछाले जाने से जुड़े दावों की पुष्टि भी महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल इस पूरे मामले में दो सवाल सबसे अहम हैं— वकील के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है और अदालत के भीतर हुए हंगामे के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होती है?

न्याय व्यवस्था में किसी भी शिकायत को दबाना उचित नहीं, लेकिन शिकायत के समाधान का रास्ता भी कानून और संस्थागत मर्यादा के अनुरूप ही होना चाहिए। अदालत के भीतर उठे इस विवाद का निष्पक्ष समाधान न केवल संबंधित पक्षों के लिए, बल्कि न्यायिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास के लिए भी महत्वपूर्ण है।

एन एस के का संपादकीय दृष्टिकोण

अदालत में न्याय की मांग करने वाले वकील स्वयं न्यायिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रहरी हैं। उनके सम्मान और शिकायतों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। लेकिन न्यायालय की गरिमा और सुरक्षा से समझौता भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह घटनाक्रम बताता है कि संस्थागत विवादों का समाधान संवाद, निष्पक्ष जांच और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। यदि वकील के साथ दुर्व्यवहार हुआ है, तो उसकी जांच हो; यदि विरोध के दौरान हिंसक आचरण हुआ है, तो उसकी भी निष्पक्ष जवाबदेही तय हो।

न्याय का तकाजा है कि न किसी शिकायत को दबाया जाए और न किसी आरोप को बिना जांच के दोषसिद्धि मान लिया जाए।

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