बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली/ढाका, 6 अगस्त
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की दिल्ली से हुई वर्चुअल मीडिया बातचीत ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। ढाका ने इसे केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए भारत के प्रति कड़ी नाराजगी दर्ज कराई है। दूसरी ओर, भारत ने स्पष्ट किया है कि यह कार्यक्रम किसी निजी मीडिया संस्थान द्वारा आयोजित किया गया था और इसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देश पिछले कुछ महीनों से द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में प्रयासरत बताए जा रहे थे। ऐसे में शेख हसीना का सार्वजनिक मंच से बांग्लादेश लौटने का ऐलान और ढाका सरकार पर तीखे आरोप, दोनों देशों के संबंधों पर नए प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं।
ढाका का आरोप: ‘संप्रभुता का अपमान
‘बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने एक्स पर जारी बयान में कहा कि शेख हसीना, जिन्हें उसने “नरसंहार के आरोपों का सामना कर रही फरार नेता” बताया, को भारतीय धरती से मीडिया के समक्ष बोलने की अनुमति देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्रालय का कहना है कि उसने पहले ही नई दिल्ली को आगाह किया था कि इस प्रकार का सार्वजनिक कार्यक्रम दोनों देशों के संबंध सुधारने के प्रयासों को प्रभावित कर सकता है।ढाका ने यह भी कहा कि भारत की धरती से इस प्रकार की राजनीतिक गतिविधि उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप जैसी प्रतीत होती है और इसे वह अपनी संप्रभुता के सम्मान के विरुद्ध मानता है।
भारत का स्पष्ट रुख: सरकार का कोई संबंध नहीं
भारत सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि उक्त डिजिटल कार्यक्रम का आयोजन एक निजी मीडिया मंच द्वारा किया गया था। सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की स्वतंत्रता का सम्मान करता है और इस कार्यक्रम का सरकारी नीति से कोई संबंध नहीं है।भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख लगातार यही रहा है कि भारत बांग्लादेश के साथ मैत्रीपूर्ण, स्थिर और परस्पर सम्मान पर आधारित संबंधों का पक्षधर है तथा दोनों देशों के बीच किसी भी विवाद का समाधान कूटनीतिक संवाद से होना चाहिए।
शेख हसीना का संदेश: ‘मौत या जेल का भय नहीं’
अपने वर्चुअल संबोधन में शेख हसीना ने कहा कि वह शीघ्र ही बांग्लादेश लौटेंगी और उन्हें जेल या मृत्यु का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी वापसी सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश को विकास, धर्मनिरपेक्षता और आर्थिक प्रगति के मार्ग पर वापस लाने के उद्देश्य से होगी।हसीना ने भारत की सराहना करते हुए कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से बांग्लादेश का सबसे निकट सहयोगी रहा है और दोनों देशों के संबंध साझा इतिहास और संघर्ष पर आधारित हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: कूटनीति बनाम घरेलू राजनीति
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल एक डिजिटल प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है। यह बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति, सत्ता संघर्ष और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का भी प्रतिबिंब है।विश्लेषकों के अनुसार, अंतरिम सरकार अपनी वैधता मजबूत करने के लिए शेख हसीना के खिलाफ सख्त रुख दिखाना चाहती है, जबकि अवामी लीग अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहती है कि उसका नेतृत्व अभी भी सक्रिय है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का सीधा असर सीमा सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा सहयोग और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े रणनीतिक परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है यदि दोनों देशों के बीच संवाद कमजोर होता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
कानूनविदों के अनुसार, किसी विदेशी नागरिक को किसी देश में रहने या सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की अनुमति देना अपने आप में अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं माना जाता। हालांकि यदि कोई देश अपनी भूमि का उपयोग किसी दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध संगठित राजनीतिक अभियान के लिए होने देता है, तो संबंधित देश आपत्ति दर्ज करा सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक शरण और प्रत्यर्पण पूरी तरह द्विपक्षीय संधियों, घरेलू कानूनों और न्यायिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करते हैं। इसलिए इस विवाद का अंतिम समाधान भी कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संभव है।
रक्षा एवं सामरिक विशेषज्ञों की चिंता
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले डेढ़ दशक में सीमा प्रबंधन, आतंकवाद विरोधी सहयोग, खुफिया समन्वय और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा को लेकर उल्लेखनीय प्रगति हुई है। यदि राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो इन क्षेत्रों में सहयोग प्रभावित हो सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए बांग्लादेश केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और बंगाल की खाड़ी क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण साझेदार है।
भारतीय विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों के कई नेताओं का कहना है कि भारत को पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का कूटनीतिक विवाद उत्पन्न न हो। वहीं कुछ विपक्षी नेताओं का मत है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिलना भी महत्वपूर्ण है। हालांकि इस विषय पर विभिन्न दलों की आधिकारिक प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं।
ढाका की प्राथमिकता: सम्मानजनक संबंध
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोहराया कि वह भारत के साथ ऐसे संबंध चाहता है जो संप्रभु समानता, परस्पर सम्मान, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और साझा हितों पर आधारित हों। मंत्रालय ने संकेत दिया कि यदि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं दोहराई गईं तो द्विपक्षीय विश्वास प्रभावित हो सकता है।
आगे की राह
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश दोनों के साझा हित इतने व्यापक हैं कि एक घटना से संबंध पूरी तरह प्रभावित होने की संभावना कम है। जल बंटवारा, सीमा प्रबंधन, व्यापार, संपर्क परियोजनाएं, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषय दोनों देशों को संवाद जारी रखने के लिए प्रेरित करेंगे।
फिर भी शेख हसीना की यह डिजिटल प्रेस कॉन्फ्रेंस यह संकेत अवश्य देती है कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति अब केवल ढाका तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसका प्रभाव नई दिल्ली की कूटनीतिक प्राथमिकताओं और पूरे दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति पर भी दिखाई देने लगा है।
आने वाले सप्ताहों में दोनों देशों की सरकारों की अगली कूटनीतिक पहल यह तय करेगी कि यह विवाद अस्थायी तनाव साबित होता है या द्विपक्षीय संबंधों में लंबे समय तक रहने वाली नई तल्खी की शुरुआत।
