‘ई रसगुल्ला वाला चुनाव नहीं है’, अनुज सिंह की जीत पर मिठाई नहीं बांटेंगे अनंत सिंह! JDU के नीरज कुमार के खिलाफ खोला मोर्चा, गुरु नीतीश पर भी दिया बड़ा बयान बोले—‘तीन जिलों में रसगुल्ला भेजने में गाड़ी का भाड़ा ही ज्यादा लग जाएगा’; जीत का फैसला जनता करेगी

बी के झा, एनएसके राजनीतिक डेस्क

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पटना, 23‌ अक्टूबर

बिहार की सियासत में अपने बेबाक अंदाज और बेधड़क बयानों के लिए चर्चित मोकामा के जदयू विधायक अनंत सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला बिहार विधान परिषद की स्नातक निर्वाचन सीट से जुड़ा है, जहां चुनावी मुकाबले के बीच अनंत सिंह ने रसगुल्ले का जिक्र कर सियासी चर्चा को नया रंग दे दिया। उनसे जब चुनाव में जीत के बाद मिठाई बांटने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने अपने खास अंदाज में कहा, ‘ई रसगुल्ला वाला इलेक्शन नहीं है।’अनंत सिंह का तर्क भी कम दिलचस्प नहीं था।

उन्होंने कहा कि पहले चुनाव में स्थानीय क्षेत्र से लोग आते थे, लेकिन इस बार निर्वाचन क्षेत्र तीन जिलों तक फैला हुआ है। ऐसे में रसगुल्ले भेजने के लिए गाड़ियों का किराया ही काफी महंगा पड़ जाएगा।हालांकि, इस बयान के पीछे सिर्फ मिठाई का हिसाब-किताब नहीं, बल्कि बिहार विधान परिषद चुनाव से जुड़ा एक दिलचस्प राजनीतिक समीकरण भी है। जदयू विधायक अनंत सिंह ने अपनी ही पार्टी के समर्थित उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जन सुराज पार्टी के अनुज सिंह को समर्थन दिया है। ऐसे में उनके बयान ने चुनावी चर्चा के साथ-साथ जदयू के भीतर राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

रसगुल्ले पर ठहाका, लेकिन चुनावी मुकाबले में सियासी संदेश

बिहार की राजनीति में मिठाई बांटना अक्सर जीत के जश्न और समर्थकों के बीच खुशी साझा करने का प्रतीक रहा है। लेकिन अनंत सिंह ने इस परंपरा को भी अपने अंदाज में अलग नजरिए से पेश किया।उन्होंने कहा कि यह सामान्य चुनाव नहीं है, जिसमें सीमित इलाके से लोग आते हैं और मिठाई बांटना आसान होता है। इस बार निर्वाचन क्षेत्र का दायरा बड़ा है और तीन जिलों में रसगुल्ले पहुंचाने के लिए गाड़ियों का खर्च ही ज्यादा हो जाएगा।उनका यह बयान सुनने में भले ही हल्का-फुल्का लगे, लेकिन चुनावी संदर्भ में इसके राजनीतिक मायने भी हैं।

अनंत सिंह जिस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं, वह उनकी अपनी पार्टी जदयू का आधिकारिक समर्थित प्रत्याशी नहीं है। ऐसे में उनका खुलकर प्रचार करना और जीत को लेकर भरोसा जताना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, रसगुल्ले पर दिए गए बयान को किसी उम्मीदवार की जीत या हार का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। चुनाव का परिणाम मतदाताओं के फैसले से ही तय होगा।

अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के सामने अनुज सिंह के समर्थन में उतरे अनंत सिंह

इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात अनंत सिंह का राजनीतिक रुख है। मोकामा विधायक ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया है, जबकि जदयू समर्थित उम्मीदवार नीरज कुमार भी चुनावी मैदान में हैं। एक ही राजनीतिक खेमे से जुड़े नेताओं और समर्थकों के बीच अलग-अलग उम्मीदवारों के पक्ष में सक्रियता चुनावी समीकरणों को रोचक बना देती है। अनंत सिंह का अनुज सिंह के समर्थन में प्रचार करना इसी वजह से चर्चा में है।

यहां सवाल केवल इतना नहीं है कि अनंत सिंह किस उम्मीदवार के साथ खड़े हैं, बल्कि यह भी है कि उनके समर्थन का चुनावी प्रभाव कितना होगा। मोकामा और आसपास के इलाकों में उनका राजनीतिक प्रभाव चर्चा का विषय रहा है, लेकिन स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का दायरा व्यापक होने के कारण किसी एक क्षेत्र के प्रभाव को पूरे चुनाव का निर्णायक कारक नहीं माना जा सकता।स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की प्राथमिकताएं, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पहुंच, संगठनात्मक सक्रियता और स्थानीय मुद्दे भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

नीतीश कुमार को बताया ‘गुरु’, बोले—बिहार उन्हीं का बसाया हुआ है

चुनावी बयानबाजी के बीच अनंत सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। नीतीश कुमार के जदयू नेता नीरज कुमार के आवास पर पहुंचने के संबंध में सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘वो हमारे गुरु हैं। बिहार उनका बसाया हुआ है। उनको तो जहां ले जाता है, जाते हैं। कहां ले गया, नहीं ले गया, मालूम भी नहीं है।’अनंत सिंह का यह बयान इसलिए भी चर्चा में आया, क्योंकि पटना स्नातक सीट पर वह जदयू समर्थित उम्मीदवार के बजाय जन सुराज के अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं।

एक तरफ नीतीश कुमार के प्रति सम्मान जताना और दूसरी तरफ अपनी पार्टी के समर्थित उम्मीदवार के सामने दूसरे प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करना बिहार की राजनीति के उस पहलू को उजागर करता है, जहां व्यक्तिगत संबंध, स्थानीय समीकरण और चुनावी पसंद हमेशा एक दिशा में नहीं चलते।हालांकि, इस बयान को नीतीश कुमार के प्रति राजनीतिक समर्थन या असहमति का अंतिम संकेत मानना उचित नहीं होगा। अनंत सिंह ने अपने शब्दों में उन्हें गुरु बताया है, जबकि चुनाव में उम्मीदवार के चयन को लेकर उनका रुख अलग दिखाई दे रहा है।

‘जनता मालिक है’, जीत को लेकर अनंत सिंह का भरोसा

अनंत सिंह ने चुनावी परिणाम को लेकर भी भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि चुनाव में अंतिम फैसला जनता करती है और जीत किसी दुकान में मिलने वाली चीज नहीं है।उनके मुताबिक, मतदान निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए और मतदाता अपने विवेक से निर्णय लेते हैं। उन्होंने गड़बड़ी की आशंका से जुड़े सवाल पर भी कहा कि बेईमानी करने वालों को जनता आगे चलकर जवाब देगी।उनका यह बयान चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं की भूमिका और निष्पक्ष मतदान के महत्व को रेखांकित करता है। हालांकि, किसी भी उम्मीदवार की जीत का दावा चुनाव परिणाम आने से पहले राजनीतिक विश्वास ही माना जाएगा, अंतिम नतीजा नहीं।

आठ सीटों पर मुकाबला, 27 अक्टूबर को मतगणना

बिहार विधान परिषद की चार शिक्षक और चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल आठ सीटों के लिए चुनाव कराया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन चुनावों में कुल 5,32,847 मतदाता पंजीकृत हैं।मतदान के लिए राज्यभर में 933 केंद्र बनाए गए हैं। इनमें स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 598 और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 335 मतदान केंद्र शामिल हैं।चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद 27 अक्टूबर को मतगणना निर्धारित है। इन सीटों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और समर्थित उम्मीदवारों के बीच मुकाबला है। परिणाम से विधान परिषद में राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार और अनुज सिंह के बीच मुकाबले को लेकर अनंत सिंह के बयान ने चुनावी चर्चा को और तेज कर दिया है।

एनएसके राजनीतिक विश्लेषण:

रसगुल्ले के बहाने सामने आई बिहार की चुनावी राजनीति

अनंत सिंह का ‘रसगुल्ला वाला चुनाव नहीं है’ वाला बयान भले ही अपने अंदाज के कारण सुर्खियां बटोर रहा हो, लेकिन इसके पीछे बिहार की चुनावी राजनीति का एक दिलचस्प पहलू छिपा है।

विधान परिषद का स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सामान्य विधानसभा क्षेत्र से अलग होता है। यहां मतदाताओं का दायरा बड़ा होता है और उम्मीदवारों को अलग-अलग इलाकों में अपनी पहुंच बनानी पड़ती है। ऐसे में किसी नेता का व्यक्तिगत प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन केवल उसी के आधार पर जीत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

अनंत सिंह का अनुज सिंह के समर्थन में उतरना और नीरज कुमार के मुकाबले उनके पक्ष में प्रचार करना चुनाव को दिलचस्प बनाता है। वहीं, नीतीश कुमार को अपना गुरु बताने वाला उनका बयान यह भी दिखाता है कि व्यक्तिगत सम्मान और चुनावी पसंद के बीच अंतर हो सकता है।

अब देखना होगा कि अनंत सिंह का समर्थन अनुज सिंह के लिए कितना प्रभावी साबित होता है और मतदाता किस उम्मीदवार के पक्ष में अपना फैसला सुनाते हैं।

फिलहाल रसगुल्ले का खर्च बचाने की बात कहकर चर्चा में आए अनंत सिंह के सामने असली परीक्षा चुनावी नतीजे की है।

क्योंकि सियासत में मिठाई बांटने का फैसला नेता कर सकता है, लेकिन जीत का स्वाद चखाने का अधिकार मतदाताओं के पास ही होता है।

एनएसके न्यूज डेस्क

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