बी के झा
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‘ तेल अवीव/नई दिल्ली, 11 अगस्त
पश्चिम एशिया की राजनीति में इस समय गठबंधनों की नई बिसात बिछती दिखाई दे रही है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने के बीच इजरायल में एक सवाल तेजी से चर्चा का विषय बन रहा है—अगर भविष्य में अमेरिका के साथ इजरायल के संबंध किसी वजह से कमजोर पड़ते हैं, तो उसके पास दूसरा भरोसेमंद रणनीतिक सहारा कौन होगा?
इसी सवाल के बीच एक इजरायली विशेषज्ञ ने भारत को इजरायल की ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ करार देते हुए दोनों देशों के संबंधों को महज हथियारों की खरीद-बिक्री या कूटनीतिक दोस्ती से कहीं आगे का बताया है।इजरायली अखबार Israel Hayom में प्रकाशित विश्लेषण में डॉ. ओश्रित बिरवाडकर ने भारत-इजरायल संबंधों की मजबूती के पीछे साझा सुरक्षा चिंताओं, भूगोल, आतंकवाद और बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना को महत्वपूर्ण कारण बताया है।उनका तर्क है कि भारत और इजरायल दोनों ऐसे देशों के रूप में विकसित हुए हैं जिन्हें अपनी सुरक्षा के लिए लगातार जटिल क्षेत्रीय परिस्थितियों से जूझना पड़ता है।
नेतन्याहू की टिप्पणी ने क्यों खींचा ध्यान?
भारत को लेकर इजरायली चर्चा उस राजनीतिक प्रसंग से भी जुड़ी है जिसमें इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच कथित तौर पर अमेरिका की भूमिका को लेकर मतभेद की चर्चा हुई थी।नेतन्याहू की ओर से भारत के समर्थन का जिक्र किए जाने के बाद यह बहस तेज हुई कि इजरायल की रणनीतिक निर्भरता क्या हमेशा सिर्फ अमेरिका पर टिकी रह सकती है?
यहीं से भारत का महत्व सामने आता है
भारत अमेरिका का विकल्प नहीं है—और न ही नई दिल्ली खुद को किसी देश का ‘सुरक्षा सहारा’ घोषित करती है। लेकिन वैश्विक व्यवस्था में शक्ति के कई केंद्र उभर रहे हैं। ऐसे में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और सैन्य शक्तियों के साथ मजबूत रिश्ते इजरायल के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं।
इजरायली विशेषज्ञ ने भारत को ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ क्यों कहा?
डॉ. बिरवाडकर के विश्लेषण का मूल तर्क भूगोल और सुरक्षा पर आधारित है।अमेरिका की भौगोलिक स्थिति उसे समुद्रों और अपेक्षाकृत सुरक्षित पड़ोस का लाभ देती है। इसके विपरीत भारत और इजरायल दोनों ऐसे क्षेत्रीय वातावरण में मौजूद हैं जहां सुरक्षा चुनौतियां सीधे सीमाओं, आतंकवाद, अस्थिर पड़ोस और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़ी हुई हैं।विशेषज्ञ के अनुसार इसी कारण भारत और इजरायल की सुरक्षा सोच में कुछ महत्वपूर्ण समानताएं दिखाई देती हैं।भारत की स्थिति पाकिस्तान और चीन जैसे शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच है, जबकि इजरायल दशकों से पश्चिम एशिया के जटिल सुरक्षा वातावरण का सामना करता रहा है।यह समानता दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण वजहों में से एक है।
भारत-इजरायल रिश्ता सिर्फ हथियारों का कारोबार नहीं
भारत और इजरायल के संबंधों को अक्सर रक्षा सौदों के नजरिये से देखा जाता है। लेकिन पिछले वर्षों में यह रिश्ता कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, ड्रोन, मिसाइल रक्षा, खुफिया सहयोग, नवाचार और उच्च तकनीक तक विस्तृत हुआ है।इजरायल भारत के लिए रक्षा तकनीक का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है, जबकि भारत इजरायल के लिए एक बड़ा बाजार और रणनीतिक साझेदार है।दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए थे। इसके बाद संबंधों ने तेजी से विस्तार किया और रक्षा सहयोग इसकी सबसे मजबूत कड़ियों में शामिल हो गया।
मोदी सरकार के दौर में रिश्तों ने पकड़ी नई रफ्तार
भारत-इजरायल संबंधों को नई राजनीतिक गति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में मिली।प्रधानमंत्री मोदी 2017 में इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इसके बाद इजरायल के साथ संबंधों को भारत की विदेश नीति में अधिक सार्वजनिक और रणनीतिक स्थान मिला।इसका असर रक्षा सहयोग से लेकर तकनीकी और कृषि साझेदारी तक दिखाई दिया।इजरायल के नजरिये से भी भारत अब केवल एक हथियार खरीदार नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत से पश्चिम एशिया तक बदलती शक्ति-संरचना में एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
‘मोदी ने इजरायल का साथ दिया’- विशेषज्ञ का दावा
इजरायली विशेषज्ञ ने अपने विश्लेषण में प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी की इजरायल के प्रति राजनीतिक समझ और समर्थन का विशेष उल्लेख किया है।उनके अनुसार जब कई पश्चिमी देशों में इजरायल को लेकर राजनीतिक मतभेद बढ़े, तब भारत ने अपने रणनीतिक संबंधों को पूरी तरह खत्म करने की दिशा नहीं अपनाई।
हालांकि, भारत की आधिकारिक विदेश नीति को केवल किसी एक राजनीतिक दल के रुख से समझना सही नहीं होगा।भारत की नीति में एक तरफ इजरायल के साथ मजबूत रक्षा और रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ फिलिस्तीनी मुद्दे पर भारत लंबे समय से दो-राष्ट्र समाधान और फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों का समर्थन करता रहा है।
यही भारत की कूटनीति की खासियत है—इजरायल के साथ दोस्ती और फिलिस्तीन के प्रति समर्थन, दोनों को एक साथ आगे बढ़ाना।
क्या भारत अमेरिका का विकल्प बन सकता है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि इजरायली विशेषज्ञ ने भी भारत को अमेरिका का विकल्प नहीं बताया।अमेरिका और इजरायल का रणनीतिक संबंध दशकों पुराना है और रक्षा, खुफिया, वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग के स्तर पर बेहद गहरा है।भारत उस भूमिका को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।लेकिन सवाल विकल्प का नहीं, विविधीकरण का है।इजरायल के लिए अगर अमेरिका के अलावा भारत जैसे बड़े, प्रभावशाली और सैन्य क्षमता वाले देश के साथ रणनीतिक संबंध और मजबूत होते हैं तो उसे वैश्विक कूटनीति में अतिरिक्त रणनीतिक गुंजाइश मिलती है।इसी अर्थ में ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ वाली उपमा महत्वपूर्ण हो जाती है।
पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी समीकरण ने बढ़ाई चिंता?
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग ने पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की रणनीतिक गणित को नया आयाम दिया है।विशेष रूप से पाकिस्तान और तुर्किये की पहले से मौजूद सैन्य साझेदारी तथा सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंधों को देखते हुए इजरायल में इस घटनाक्रम का विश्लेषण होना स्वाभाविक है।भारत के नजरिये से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ा हुआ देश है।अगर पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरण एक-दूसरे से अधिक जुड़ते हैं तो भारत के लिए इजरायल के साथ रक्षा एवं तकनीकी सहयोग का रणनीतिक महत्व और बढ़ सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर में ड्रोन से मिसाइल डिफेंस तक साझेदारी
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भारत-इजरायल रक्षा सहयोग की सबसे बड़ी ताकत दोनों देशों की जरूरतों में दिखाई देने वाली समानता है।इजरायल ने लंबे समय तक मिसाइलों, ड्रोन, रॉकेट और आतंकवादी हमलों जैसी सुरक्षा चुनौतियों के बीच अपनी रक्षा तकनीक विकसित की है।भारत भी सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन, मिसाइल, निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।इसीलिए इजरायली तकनीक और भारतीय उत्पादन क्षमता का संयोजन दोनों देशों के लिए उपयोगी हो सकता है।
भविष्य में यह रिश्ता केवल ‘इजरायल से खरीदो’ तक सीमित रहने के बजाय भारत में उत्पादन, संयुक्त अनुसंधान और तकनीकी हस्तांतरण की दिशा में आगे बढ़ना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
शिक्षाविदों के सामने बड़ा सवाल- क्या दुनिया फिर दो ध्रुवों में बंट रही है?
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविदों के अनुसार मौजूदा वैश्विक व्यवस्था शीत युद्ध जैसी दोध्रुवीय व्यवस्था नहीं है।अमेरिका, चीन, भारत, रूस, यूरोप और क्षेत्रीय शक्तियां अपने-अपने हितों के आधार पर अलग-अलग साझेदारियां बना रही हैं।ऐसे में भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह किसी एक खेमे में पूरी तरह बंधने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे।
भारत के लिए इजरायल महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत के लिए अरब देश भी महत्वपूर्ण हैं। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, प्रवासी भारतीयों और पश्चिम एशिया में भारत के आर्थिक हितों को देखते हुए खाड़ी देशों के साथ संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।यही वजह है कि नई दिल्ली के लिए संतुलन साधना जरूरी है।
विदेश मंत्रालय का रुख: भारत की नीति किसी खेमे की नहीं
भारत के विदेश मंत्रालय की लंबे समय से यही नीति रही है कि भारत पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख पक्षों के साथ स्वतंत्र और संतुलित संबंध रखता है।इजरायल के साथ भारत के मजबूत संबंध हैं, लेकिन फिलिस्तीन के साथ भी भारत के ऐतिहासिक संबंध कायम हैं।इसलिए किसी इजरायली विशेषज्ञ के ‘भारत इजरायल की इंश्योरेंस पॉलिसी है’ वाले विश्लेषण को भारत सरकार की आधिकारिक नीति मानना सही नहीं होगा।
नई दिल्ली की रणनीति ज्यादा व्यापक है—इजरायल से रक्षा सहयोग,खाड़ी से ऊर्जा और व्यापार,फिलिस्तीन के लिए राजनीतिक समर्थन,और अमेरिका के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी।यही बहुस्तरीय कूटनीति भारत को अपने हित सुरक्षित रखने में मदद करती है।
विपक्ष के लिए भी कूटनीतिक सवाल
भारत में इस मुद्दे पर विपक्ष का नजरिया स्वाभाविक रूप से सरकार से अलग हो सकता है।विपक्ष की ओर से अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि भारत को किसी एक देश के साथ अत्यधिक नजदीकी के बजाय सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए।
वहीं सरकार का तर्क रहा है कि भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होती है और किसी भी देश के साथ संबंध दूसरे देश के खिलाफ नहीं हैं।इस खास इजरायली विशेषज्ञ की टिप्पणी पर प्रमुख विपक्षी दलों की कोई आधिकारिक ताजा प्रतिक्रिया उपलब्ध न होने के कारण उनके नाम से कोई काल्पनिक बयान देना उचित नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक बहस का मूल प्रश्न यही रहेगा—क्या भारत-इजरायल की बढ़ती दोस्ती भारत की रणनीतिक ताकत है या इससे पश्चिम एशिया के दूसरे साझेदारों के साथ संतुलन की चुनौती बढ़ सकती है?
भारत के लिए भी इजरायल क्यों अहम है?
भारत की दृष्टि से इजरायल केवल पश्चिम एशिया का एक छोटा देश नहीं है।वह—रक्षा तकनीक का महत्वपूर्ण स्रोत है,ड्रोन और मिसाइल रक्षा में विशेषज्ञता रखता है,साइबर सुरक्षा में अग्रणी देशों में गिना जाता है,कृषि और जल प्रबंधन में उपयोगी तकनीक उपलब्ध कराता है,आतंकवाद विरोधी अनुभव रखता है,और अमेरिका तथा पश्चिमी तकनीकी नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।
भारत के लिए यह साझेदारी विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब देश रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और आधुनिक युद्ध तकनीक पर तेजी से जोर दे रहा है।
लेकिन भारत को ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ बनने से आगे सोचना होगा
इजरायली विशेषज्ञ की टिप्पणी जितनी प्रशंसात्मक है, उतनी ही वह भारत के लिए एक रणनीतिक संकेत भी देती है।भारत को किसी दूसरे देश की सुरक्षा जरूरतों का ‘बीमा’ बनने से ज्यादा अपनी रणनीतिक क्षमता और स्वायत्तता मजबूत करनी होगी।भारत का लक्ष्य होना चाहिए कि वह दुनिया की ऐसी शक्ति बने जिसके साथ अमेरिका, इजरायल, रूस, यूरोप, खाड़ी देश और इंडो-पैसिफिक की शक्तियां अपने हितों के लिए साझेदारी करना चाहें।
यानी भारत किसी का विकल्प बनने के बजाय स्वयं एक विकल्प बने।
निष्कर्ष:
पश्चिम एशिया की नई बिसात में भारत की कीमत बढ़ी
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग, अमेरिका की बदलती पश्चिम एशिया नीति और इजरायल के सामने बढ़ती कूटनीतिक चुनौतियों के बीच भारत की रणनीतिक अहमियत पर चर्चा का बढ़ना कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं है।इजरायली विशेषज्ञ का ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ वाला बयान दरअसल एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की ओर संकेत करता है।अमेरिका इजरायल का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार बना हुआ है, लेकिन इजरायल अब अपनी वैश्विक साझेदारियों को केवल एक धुरी तक सीमित रखने के बजाय बहुध्रुवीय दुनिया में नए भरोसेमंद साझेदार तलाश रहा है।
और इस बदलती तस्वीर में भारत का महत्व लगातार बढ़ रहा है।लेकिन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह किसी खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपनी वही पुरानी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे, जिसने उसे एक साथ अमेरिका, रूस, इजरायल, ईरान, सऊदी अरब और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध कायम रखने की क्षमता दी है।
क्योंकि 21वीं सदी की असली ताकत किसी एक देश का ‘सहारा’ बनने में नहीं, बल्कि ऐसा देश बनने में है जिसके बिना कोई भी बड़ी रणनीतिक गणित पूरी न हो सके।
