बी के झा
NSK news Ind

ढाका/नई दिल्ली, 11 अगस्त
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत और ढाका के रिश्तों में जो तनाव, अविश्वास और रणनीतिक असमंजस दिखाई दे रहा था, उसके बीच सोमवार की दो हाई-प्रोफाइल मुलाकातों ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।एक तरफ भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) प्रमुख पराग जैन ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के रक्षा मामलों के सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल (रिटायर्ड) डॉ. एकेएम शम्सुल इस्लाम से मुलाकात की। दूसरी ओर उसी दिन भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। बांग्लादेशी मीडिया ने इन दोनों बैठकों को मौजूदा तनावपूर्ण संबंधों के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताया है।दिलचस्प बात यह है कि R&AW प्रमुख के नेतृत्व में चार सदस्यीय भारतीय सुरक्षा एवं खुफिया प्रतिनिधिमंडल बांग्लादेशी सैन्य खुफिया एजेंसी DGFI के निमंत्रण पर ढाका पहुंचा था।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह सिर्फ खुफिया सहयोग की नियमित बैठक थी या भारत-बांग्लादेश संबंधों में किसी बड़े ‘रीसेट’ की पटकथा लिखी जा रही है?
एक दिन, दो मुलाकातें और तीसरा बड़ा सवाल—शेख हसीनाइस घटनाक्रम को इसलिए और महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारतीय उच्चायुक्त के साथ हुई बैठक में शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा भी उठने की खबर है।रिपोर्टों के मुताबिक तारिक रहमान ने भारत से हसीना की वापसी के मामले में सकारात्मक जवाब की उम्मीद जताई और भारत को ऐसे कदमों से बचने की सलाह दी जो द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।यानी एक तरफ भारत के राजनयिक प्रतिनिधि प्रधानमंत्री से बातचीत कर रहे थे और दूसरी तरफ भारत की खुफिया एजेंसी के प्रमुख बांग्लादेश के रक्षा मामलों के सलाहकार से मिल रहे थे।
यह संयोग है या रणनीतिक संदेश?
इसका जवाब अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है।लेकिन दक्षिण एशिया की कूटनीति में ऐसे उच्चस्तरीय संपर्कों को केवल औपचारिक मुलाकात मानकर नजरअंदाज करना भी मुश्किल है।
RAW प्रमुख की यात्रा क्यों अहम?
R&AW और DGFI के बीच संपर्क कोई असामान्य घटना नहीं है। दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, उग्रवाद, संगठित अपराध, मानव तस्करी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर संपर्क रखती रही हैं।लेकिन इस समय परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं।5 अगस्त 2024 को शेख हसीना सत्ता से बाहर हुईं और भारत आ गईं। इसके बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हुआ। अब बांग्लादेश की सत्ता तारिक रहमान के नेतृत्व में है और ढाका लगातार हसीना की वापसी की मांग करता रहा है।ऐसे समय में भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारी का ढाका जाना अपने आप में रणनीतिक महत्व रखता है।
क्या हसीना की वापसी का रास्ता तैयार हो रहा है?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सनसनीखेज पहलू है।कुछ मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि भारतीय सुरक्षा अधिकारियों और बांग्लादेशी अधिकारियों के बीच शेख हसीना की संभावित वापसी, उसकी तारीख और सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है।हसीना ने स्वयं दिसंबर में बांग्लादेश लौटने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जताई है। जुलाई में उन्होंने Reuters को कहा था कि वह दिसंबर के आसपास देश लौटकर अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने की योजना रखती हैं।5 अगस्त को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में भी उन्होंने दिसंबर में लौटने की बात दोहराई थी।
लेकिन—RAW और बांग्लादेशी सरकार के बीच वापसी की कोई निश्चित तारीख तय हो गई है—इसकी अभी सार्वजनिक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।इसलिए इसे फिलहाल संभावित कूटनीतिक बातचीत के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा, न कि तय हो चुके वापसी प्लान के रूप में।
हसीना के लिए वापसी आसान नहीं
शेख हसीना के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी है।वह बांग्लादेश में गंभीर आपराधिक मामलों और अदालत से मिली सजा का सामना कर रही हैं। Reuters के अनुसार उन्होंने खुद कहा था कि लौटने पर उन्हें गिरफ्तारी या उससे भी गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।ऐसे में यदि वह वास्तव में लौटती हैं तो यह केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री की वापसी नहीं होगी।
यह होगा—बांग्लादेश की न्यायपालिका की परीक्षा,तारिक रहमान सरकार की राजनीतिक परीक्षा,भारत की कूटनीतिक परीक्षा,और पूरे दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति की परीक्षा।
तारिक रहमान के लिए हसीना सिर्फ प्रत्यर्पण का मुद्दा नहीं
प्रधानमंत्री तारिक रहमान के लिए शेख हसीना की वापसी का सवाल कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।BNP लंबे समय तक हसीना और अवामी लीग की राजनीति का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रहा है। तारिक रहमान की राजनीति में हसीना शासन की आलोचना केंद्रीय मुद्दों में रही है। उनके सार्वजनिक बयानों में हसीना सरकार पर भ्रष्टाचार, दमन और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई के आरोप लगाए जाते रहे हैं।लेकिन सत्ता में आने के बाद तस्वीर बदल जाती है।अब तारिक रहमान को केवल विपक्षी नेता की तरह नहीं, बल्कि भारत के साथ संबंध संभालने वाले प्रधानमंत्री की तरह निर्णय लेना है।यहीं भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत के सामने सबसे कठिन कूटनीतिक संतुलन
नई दिल्ली के सामने एक साथ कई हित हैं।
एक तरफ—बांग्लादेश के साथ सीमा सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा।
दूसरी तरफ—शेख हसीना के साथ लंबे समय से बने राजनीतिक और रणनीतिक संबंध।
तीसरी तरफ—बांग्लादेश में बढ़ते चीन के प्रभाव और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन।
और चौथी तरफ—बांग्लादेश के भीतर कट्टरपंथी राजनीति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़े सवाल।इसलिए भारत के लिए हसीना का भविष्य केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है।यह भारत की पूर्वी सीमा की दीर्घकालिक रणनीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
भारत सरकार क्या कह रही है?
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत सरकार की ओर से R&AW प्रमुख की बैठक के एजेंडे या हसीना की वापसी की किसी तारीख की सार्वजनिक पुष्टि सामने नहीं आई है।यह भी महत्वपूर्ण है कि नई दिल्ली ने हसीना के हालिया दिल्ली कार्यक्रम से खुद को अलग करते हुए संकेत दिया था कि वह कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा आयोजित नहीं था। बांग्लादेश सरकार ने उस कार्यक्रम पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था।इसलिए भारत के लिए सबसे सुरक्षित कूटनीतिक रास्ता यही दिखाई देता है कि—हसीना के मामले को कानूनी प्रक्रिया और द्विपक्षीय कूटनीति के बीच संतुलित रखा जाए।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर में बैठक का दूसरा पहलू
रक्षा विशेषज्ञों के लिए R&AW-DGFI संपर्क का महत्व केवल हसीना प्रकरण तक सीमित नहीं है।भारत और बांग्लादेश की लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है। सीमा पर अवैध घुसपैठ, तस्करी, मानव तस्करी, हथियारों की आवाजाही और उग्रवादी नेटवर्क जैसी चुनौतियां दोनों देशों के सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए चिंता का विषय रही हैं।इसके अलावा बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता भी भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा है।इसलिए एक संभावित भारत-बांग्लादेश सुरक्षा संवाद में हसीना के अलावा कई अन्य मुद्दे भी हो सकते हैं।यही कारण है कि किसी खुफिया बैठक के एजेंडे को केवल मीडिया में चल रही एक राजनीतिक कहानी से जोड़ देना जल्दबाजी होगी।
शिक्षाविदों का विश्लेषण: रिश्ते व्यक्तियों से नहीं, भूगोल से चलते हैं
दक्षिण एशिया के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों के अनुसार भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे को बदल नहीं सकते।बांग्लादेश भारत से तीन तरफ से घिरा हुआ है और उसकी अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा, नदी जल, परिवहन तथा सीमा सुरक्षा के हित भारत से गहराई से जुड़े हैं।दूसरी ओर भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वोत्तर तक कनेक्टिविटी और बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक पहुंच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।इसलिए चाहे ढाका में सत्ता किसी की हो, नई दिल्ली और ढाका को अंततः बातचीत की मेज पर लौटना ही पड़ेगा।यही कारण है कि मौजूदा बैठकों को संभावित ‘रीसेट’ की शुरुआत के रूप में भी देखा जा रहा है।
कानूनविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल—प्रत्यर्पण और न्याय
कानून विशेषज्ञों की नजर में यदि भविष्य में हसीना की वापसी या प्रत्यर्पण का प्रश्न आगे बढ़ता है तो भारत को कई कानूनी और मानवीय पहलुओं पर विचार करना होगा।
किस मामले में प्रत्यर्पण की मांग की गई है?
क्या आरोप राजनीतिक प्रतिशोध से प्रभावित हैं?
क्या आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिलेगी?
क्या उसकी सुरक्षा की पर्याप्त गारंटी होगी?
और भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण व्यवस्था के तहत क्या कानूनी आधार बनता है?
इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक घोषणा से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया से मिलेगा।इसलिए ‘हसीना की वापसी तय’ जैसी घोषणा करना अभी जल्दबाजी होगी।
विपक्ष की नजर में भारत की चुनौती
भारत में विपक्षी दल इस घटनाक्रम को सरकार की विदेश नीति, बांग्लादेश में भारत के हितों और शेख हसीना को लेकर नई दिल्ली की रणनीति के संदर्भ में देख सकते हैं।लेकिन इस समय इस खास RAW बैठक पर प्रमुख भारतीय विपक्षी दलों की कोई स्पष्ट और सत्यापित आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।ऐसे में किसी दल के नाम से बयान जोड़ना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
हालांकि राजनीतिक बहस में संभावित सवाल जरूर सामने आएंगे—क्या भारत तारिक रहमान सरकार के साथ नए सिरे से संबंध मजबूत कर रहा है?
क्या हसीना का मुद्दा दोनों देशों के बीच समझौते का हिस्सा बन सकता है?
क्या भारत हसीना की सुरक्षा और न्यायिक अधिकारों को प्राथमिकता देगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नई दिल्ली ढाका से संबंध सुधारने के लिए हसीना मामले में कोई नया रास्ता तलाश रही है?
समाजसेवी संगठनों के लिए अल्पसंख्यक सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा
बांग्लादेश की राजनीति पर नजर रखने वाले सामाजिक संगठनों के लिए केवल सत्ता परिवर्तन महत्वपूर्ण नहीं है।वे यह भी देख रहे हैं कि राजनीतिक संघर्ष के बीच—अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कैसी है,राजनीतिक हिंसा कितनी नियंत्रित हुई,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति क्या है,कानून का शासन कितना मजबूत है,और राजनीतिक विरोधियों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है।
यदि हसीना लौटती हैं तो उनके समर्थकों और विरोधियों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।इसलिए किसी भी संभावित वापसी के लिए सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक स्थिरता तीनों को साथ लेकर चलना होगा।
चीन और पाकिस्तान भी इस कहानी के मौन दर्शक
बांग्लादेश की राजनीति में भारत अकेला बाहरी खिलाड़ी नहीं है।चीन पहले से ही बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे, रक्षा और आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।पाकिस्तान के साथ भी ढाका के संबंधों में हाल के वर्षों में नई सक्रियता दिखाई दी है।ऐसे में भारत-बांग्लादेश संबंधों में कोई भी बड़ा बदलाव केवल द्विपक्षीय घटना नहीं रहेगा।अगर भारत और तारिक रहमान सरकार के बीच संबंध सुधरते हैं तो इसका असर चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश समीकरण पर भी पड़ सकता है।
और यदि संबंध बिगड़ते हैं तो बीजिंग और इस्लामाबाद के लिए ढाका में अपनी रणनीतिक जगह बढ़ाने का अवसर पैदा हो सकता है।
BRICS भी बन सकता है अगला बड़ा कूटनीतिक मंच
तारिक रहमान के भारत आने और BRICS से जुड़े कार्यक्रम में उनकी संभावित भागीदारी को लेकर भी अटकलें चल रही हैं।भारत ने उन्हें BRICS से जुड़े कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन ढाका के अंतिम निर्णय को लेकर अनिश्चितता की खबरें हैं। हसीना प्रकरण के कारण यह यात्रा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गई है।अगर तारिक रहमान भारत आते हैं तो दोनों देशों के बीच सीधे राजनीतिक संवाद का एक बड़ा अवसर पैदा होगा।और अगर वह नहीं आते, तो यह भी अपने आप में भारत-बांग्लादेश संबंधों की वर्तमान स्थिति का राजनीतिक संदेश होगा।
असली कहानी क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम को तीन स्तरों पर पढ़ना चाहिए।
पहला—सुरक्षा संवादR&AW और DGFI के बीच संपर्क यह संकेत देता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुरक्षा चैनल बंद नहीं हुए हैं।
दूसरा—हसीना फैक्टरतारिक रहमान सरकार के लिए हसीना की वापसी बड़ा राजनीतिक और कानूनी मुद्दा है, जबकि भारत के लिए यह संवेदनशील कूटनीतिक प्रश्न है।
तीसरा—भारत-बांग्लादेश रीसेटदोनों देशों को यह समझना होगा कि राजनीतिक नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन भूगोल नहीं बदलता।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते जितने खराब होंगे, उसका लाभ तीसरी शक्तियों को मिल सकता है।
निष्कर्ष:
ढाका में बंद दरवाजों के पीछे क्या बात हुई, इसका इंतजार रहेगा
R&AW प्रमुख पराग जैन की ढाका यात्रा और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के रक्षा सलाहकार से उनकी मुलाकात ने निश्चित रूप से अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। उसी दिन भारतीय उच्चायुक्त की तारिक रहमान से मुलाकात ने इस घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया।लेकिन अभी सबसे महत्वपूर्ण अंतर यही है—बैठक हुई है, लेकिन एजेंडा सार्वजनिक नहीं है।
हसीना ने दिसंबर में लौटने की इच्छा जताई है, लेकिन भारत और ढाका के बीच उनकी वापसी की तारीख तय होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं है।इसलिए फिलहाल इसे ‘हसीना की वापसी का अंतिम प्लान’ कहना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इतना जरूर है कि भारत और बांग्लादेश के बीच पर्दे के पीछे संवाद के चैनल सक्रिय हैं।और अगर आने वाले दिनों में तारिक रहमान भारत आते हैं, हसीना के प्रत्यर्पण पर कोई नया फॉर्मूला सामने आता है या दोनों देशों के सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है, तो आज की ये मुलाकातें दक्षिण एशिया की एक बड़ी कूटनीतिक कहानी की शुरुआती कड़ी साबित हो सकती हैं।
क्योंकि ढाका की राजनीति में चेहरा भले बदल गया हो, लेकिन दिल्ली की चुनौती वही है—बांग्लादेश को अपने खिलाफ जाने से रोकना और अपने पूर्वी पड़ोस को स्थिर रखना।
