बिहार में IG-DIG-SP को मिल सकती है मजिस्ट्रेट की ताकत: ‘ऑन द स्पॉट’ फैसलों की तैयारी, तेज पुलिसिंग या बढ़ेगा पुलिसिया दबदबा?

बी के झा

पटना/भागलपुर, 12 अगस्त

बिहार में कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। प्रस्ताव के मुताबिक जोन और रेंज स्तर के IG और DIG, जबकि जिलों में तैनात SP और SSP को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने की कवायद अंतिम चरण में बताई जा रही है।

सरकार की दलील है कि त्योहार, चुनाव, जुलूस, धरना-प्रदर्शन, सांप्रदायिक संवेदनशीलता, वीआईपी मूवमेंट या अचानक उत्पन्न कानून-व्यवस्था की स्थिति में पुलिस अधिकारियों को मौके पर ही आवश्यक कानूनी निर्णय लेने की क्षमता मिलेगी। इससे पुलिस और जिला प्रशासन के बीच आदेश जारी करने की प्रक्रिया में लगने वाला समय कम हो सकता है। लेकिन प्रस्ताव के साथ एक बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक सवाल भी खड़ा हो गया है—

क्या कानून-व्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने के नाम पर पुलिस अधिकारियों को अतिरिक्त मजिस्ट्रियल अधिकार देना संतुलित व्यवस्था होगी, या इससे पुलिस शक्ति के केंद्रीकरण का खतरा पैदा होगा?

यही वह सवाल है जिसने बिहार की राजनीति और कानून के गलियारों में बहस तेज कर दी है।पहले समझिए—BNSS में वास्तव में क्या प्रावधान है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 यानी BNSS ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली है। इसमें कार्यपालक मजिस्ट्रेट से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं और राज्य सरकार आवश्यकतानुसार अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान कर सकती है।लेकिन यह समझना जरूरी है कि BNSS अपने आप हर IG, DIG, SP या SSP को मजिस्ट्रेट नहीं बना देता। किसी विशेष अधिकारी को ऐसी शक्तियां देने के लिए सक्षम सरकारी आदेश/अधिसूचना और उसके दायरे व शर्तों का निर्धारण आवश्यक होगा।इसलिए बिहार सरकार का प्रस्ताव लागू होने के बाद यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि अधिकार किस अवधि, किस क्षेत्र, किन परिस्थितियों और किन सीमाओं के साथ दिए जाते हैं।

सरकार का तर्क: संकट में ‘फाइल’ नहीं, फैसला चाहिए

सरकार के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क प्रशासनिक गति का है।मान लीजिए किसी जिले में अचानक हिंसा की स्थिति बनती है, हजारों लोग सड़क पर हैं, जुलूस का मार्ग विवादित हो गया है या किसी संवेदनशील इलाके में शांति भंग होने की आशंका पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति में पुलिस बल मौके पर मौजूद रहता है, लेकिन कुछ वैधानिक आदेशों के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि यदि पुलिस कप्तान के पास निर्धारित मजिस्ट्रियल अधिकार होंगे तो वह परिस्थितियों के अनुरूप तत्काल वैधानिक कार्रवाई कर सकेगा।

यानी तर्क सीधा है—पुलिस मौके पर है, अधिकारी मौके पर है, खतरा सामने है तो निर्णय लेने की शक्ति भी वहीं होनी चाहिए।यही व्यवस्था सरकार के मुताबिक ‘रिस्पॉन्स टाइम’ घटा सकती है।

निषेधाज्ञा से लेकर शांति व्यवस्था तक—कितनी ताकत मिलेगी?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है। प्रस्तावित अधिकारों की वास्तविक सीमा सरकारी अधिसूचना में स्पष्ट होगी। इसलिए अभी से यह कहना कि हर SP अपने स्तर पर ‘कर्फ्यू’, जमीन विवाद या हर तरह के अतिक्रमण पर अंतिम आदेश जारी कर सकेगा, कानूनी रूप से अतिशयोक्ति होगी।फिर भी, यदि अधिकारियों को BNSS के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट की उपयुक्त शक्तियां दी जाती हैं तो वे कानून में निर्धारित प्रावधानों के तहत शांति और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में आदेश पारित करने में सक्षम हो सकते हैं।विशेष रूप से शांति भंग की आशंका, भीड़ नियंत्रण, जुलूसों से संबंधित परिस्थितियां और निवारक कार्रवाई जैसे मामलों में यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है।लेकिन हर शक्ति के साथ प्रक्रिया, सुनवाई, रिकॉर्ड, अपील/पुनरीक्षण और न्यायिक समीक्षा जैसी संवैधानिक सीमाएं भी लागू रहेंगी।

असली बहस यहीं से शुरू होती है

सरकार इसे प्रशासनिक सुधार कह रही है।आलोचक इसे शक्ति के केंद्रीकरण की दिशा में कदम मान रहे हैं।यही दो दृष्टिकोण बिहार की राजनीति में आमने-सामने हैं।समर्थकों का कहना है कि कानून-व्यवस्था में देरी कभी-कभी हालात को बिगाड़ देती है। आलोचकों का सवाल है कि पुलिस का प्राथमिक काम कानून लागू करना है और मजिस्ट्रियल शक्ति के इस्तेमाल में निष्पक्षता तथा स्वतंत्र निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है।एक ही अधिकारी के पास पुलिस बल की कमान और कुछ कार्यपालक मजिस्ट्रियल शक्तियां आ जाने से निर्णय तेज हो सकते हैं, लेकिन उसी अनुपात में जवाबदेही की आवश्यकता भी बढ़ेगी।

कानूनविदों की सबसे बड़ी चिंता—शक्ति के साथ नियंत्रण

वरिष्ठ कानूनविदों के अनुसार, ऐसी व्यवस्था को केवल ‘अधिक अधिकार’ के रूप में देखना गलत होगा। असली सवाल है कि अधिकारों का इस्तेमाल किस प्रक्रिया के तहत होगा।किसी व्यक्ति को शांति भंग की आशंका के आधार पर नोटिस देना, प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करना या किसी सार्वजनिक गतिविधि पर रोक लगाना—ये सभी ऐसे कदम हैं जिनका नागरिकों के अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।इसलिए आदेश कारणयुक्त, रिकॉर्ड पर आधारित और कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर होना चाहिए।

कानूनविदों के अनुसार पुलिस अधिकारी द्वारा लिया गया कोई भी वैधानिक आदेश न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होगा। यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो न्यायालय में उसे चुनौती देने का रास्ता बना रहेगा।

शिक्षाविद: तेज व्यवस्था अच्छी, लेकिन ‘पुलिस राज्य’ नहीं

शिक्षा और प्रशासन के विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि आधुनिक शासन व्यवस्था में त्वरित निर्णय क्षमता जरूरी है। लेकिन लोकतांत्रिक शासन की पहचान सिर्फ तेजी से निर्णय लेना नहीं, बल्कि सही प्रक्रिया से निर्णय लेना भी है।यदि अधिकार दिए जाते हैं तो अधिकारियों के प्रशिक्षण, मानवाधिकार संबंधी संवेदनशीलता, लिखित आदेश, रिकॉर्डिंग और वरिष्ठ स्तर पर निगरानी की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत करनी होगी।एक शिक्षाविद की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि सरकार ‘speed of governance’ और ‘due process’ के बीच संतुलन कैसे कायम करती है।

समाजसेवी संगठनों का मत: जनता को तुरंत राहत मिल सकती है

सामाजिक संगठनों के नजरिए से देखें तो व्यवस्था का एक सकारात्मक पक्ष भी है।धरना, जुलूस, सड़क जाम, बाजारों में अतिक्रमण या अचानक पैदा हुए तनाव की स्थिति में यदि सक्षम अधिकारी मौके पर मौजूद होकर वैधानिक फैसला ले सके तो आम लोगों को राहत जल्दी मिल सकती है।लेकिन समाजसेवियों का एक दूसरा आग्रह भी उतना ही महत्वपूर्ण है—कानून का इस्तेमाल कमजोर, गरीब या विरोध की आवाज उठाने वाले नागरिकों को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए।लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; दोनों का संतुलन ही सुशासन की कसौटी है।

विपक्ष का हमला: ‘पुलिसिया राज’ की आशंका

प्रस्ताव को लेकर विपक्षी दल सरकार पर राजनीतिक हमला बोल सकते हैं और सवाल उठा सकते हैं कि पुलिस अधिकारियों को अतिरिक्त मजिस्ट्रियल अधिकार देने से प्रशासनिक शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण होगा।विपक्ष की ओर से उठाया जा सकने वाला सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून-व्यवस्था के नाम पर पुलिस को जरूरत से ज्यादा अधिकार दिए जा रहे हैं?

आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि यदि SP या अन्य पुलिस अधिकारी स्वयं कार्रवाई भी करें और उसी मामले में मजिस्ट्रियल आदेश भी जारी करें तो निष्पक्षता की धारणा कैसे कायम रखी जाएगी?

सम्राट सरकार’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती—

विश्वासराज्य में सरकार का नेतृत्व सम्राट चौधरी कर रहे हैं। प्रस्तावित व्यवस्था को यदि सरकार कानून-व्यवस्था में सुधार की दिशा में लागू करती है तो उसे जनता के सामने केवल ‘अधिक अधिकार’ की कहानी नहीं रखनी होगी, बल्कि यह भी बताना होगा कि इन अधिकारों पर नियंत्रण कैसे रहेगा।सरकार के लिए तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण होंगी—

पहली—अधिकारों की स्पष्ट सीमा।

दूसरी—हर आदेश की जवाबदेही।

तीसरी—दुरुपयोग की स्थिति में प्रभावी शिकायत और समीक्षा व्यवस्था।

यदि ये तीनों चीजें स्पष्ट रहती हैं तो व्यवस्था को प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने वाला कदम माना जा सकता है।लेकिन यदि अधिकारों की सीमा अस्पष्ट रही और निगरानी कमजोर रही तो वही व्यवस्था राजनीतिक विवाद और नागरिक अधिकारों की बहस का कारण बन सकती है।

त्योहारों और चुनावों में हो सकता है बड़ा असर

बिहार जैसे बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में त्योहारों और धार्मिक जुलूसों के दौरान कानून-व्यवस्था संभालना पुलिस प्रशासन के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहता है।दुर्गापूजा, मुहर्रम, छठ, सरस्वती पूजा, रामनवमी जैसे अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर आते हैं। इसके अलावा चुनाव, बड़े राजनीतिक कार्यक्रम और संवेदनशील इलाकों में तनाव की स्थिति में त्वरित निर्णय की आवश्यकता होती है।ऐसे में सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था पुलिस को मौके पर कानूनी प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाएगी।

लेकिन यहां भी एक सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए—कानून-व्यवस्था की तेजी का मतलब नागरिक अधिकारों में जल्दबाजी नहीं हो सकता।

DM-SP व्यवस्था पर भी पड़ेगा असर

बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की भूमिकाएं अलग-अलग होते हुए भी कानून-व्यवस्था में बेहद निकटता से जुड़ी हैं।यदि SP को कुछ कार्यपालक मजिस्ट्रियल शक्तियां मिलती हैं तो DM और SP के बीच समन्वय का स्वरूप भी बदल सकता है।यह जरूरी होगा कि दोनों अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र स्पष्ट हों और किसी संकट की स्थिति में आदेशों को लेकर प्रशासनिक टकराव न हो।

अन्यथा जिस ‘रिस्पॉन्स टाइम’ को कम करने के लिए व्यवस्था बनाई जाएगी, वही अधिकारों की अस्पष्टता के कारण विवाद में बदल सकता है।

राजनीतिक विश्लेषण: यह केवल पुलिस सुधार नहीं, सत्ता के विकेंद्रीकरण की परीक्षा भी है

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस प्रस्ताव को केवल कानून-व्यवस्था की तकनीकी कवायद के रूप में देखना अधूरा होगा।बिहार की राजनीति में प्रशासनिक नियंत्रण हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। ऐसे में पुलिस अधिकारियों को अतिरिक्त वैधानिक शक्ति देने का फैसला सरकार की governance philosophy को भी दर्शाएगा।

सरकार कह सकती है—‘अपराधी के खिलाफ कार्रवाई में देरी नहीं होगी।’

विपक्ष कह सकता है—‘सरकार पुलिस को जरूरत से ज्यादा शक्तिशाली बना रही है।’

जनता का सवाल इससे अलग होगा—क्या इससे उन्हें सुरक्षित, निष्पक्ष और तेज न्याय मिलेगा? यही इस पूरी व्यवस्था की अंतिम परीक्षा होगी।

‘ऑन द स्पॉट फैसला’ तभी अच्छा, जब ‘ऑन द रिकॉर्ड जवाबदेही’ भी हो

इस प्रस्ताव का सबसे मजबूत पक्ष यही है कि संकट के समय अधिकारी को निर्णय लेने में अनावश्यक देरी न हो।लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था का सिद्धांत यह भी कहता है कि जितनी बड़ी शक्ति, उतनी बड़ी जवाबदेही।यदि किसी नागरिक पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई होती है, किसी जुलूस को रोका जाता है या सार्वजनिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो उसके पीछे कानून, तथ्य और कारण स्पष्ट होने चाहिए।

‘ऑन द स्पॉट फैसला’ प्रशासन की ताकत हो सकता है।लेकिन ‘ऑन द रिकॉर्ड फैसला’ लोकतंत्र की सुरक्षा है।

निष्कर्ष:

बिहार को तेज पुलिसिंग चाहिए, लेकिन कानून की चौखट के भीतर

बिहार में IG, DIG, SP और SSP को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने की प्रस्तावित कवायद यदि स्पष्ट नियमों, प्रशिक्षण, निगरानी और न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था के साथ लागू होती है तो यह कानून-व्यवस्था की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने वाला कदम साबित हो सकती है।लेकिन यदि इसे केवल पुलिस को अतिरिक्त शक्ति देने के नजरिए से लागू किया गया और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त safeguards नहीं बनाए गए तो सवाल उठना स्वाभाविक है।सरकार के सामने चुनौती सिर्फ अपराधियों को तेजी से रोकने की नहीं है। चुनौती यह साबित करने की भी है कि मजबूत पुलिस व्यवस्था और मजबूत लोकतंत्र एक साथ चल सकते हैं।क्योंकि बिहार को निश्चित रूप से ऐसी पुलिस चाहिए जो संकट में सेकंडों में फैसला ले सके—लेकिन उतनी ही जरूरी ऐसी व्यवस्था है जिसमें उस फैसले का हिसाब भी कानून के सामने दिया जा सके।

तेज प्रशासन अच्छी बात है, मगर लोकतंत्र में गति की असली कीमत तभी है जब दिशा भी संविधान तय करे।

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