बी के झा
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सीतापुर/लखनऊ, 18 अगस्त
उत्तर प्रदेश के सीतापुर में शहर कांग्रेस कमेटी को बड़ा झटका लगा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने नगर पालिका के बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मामला घंटाघर स्थित नजूल भूमि पर बने उस कार्यालय का है, जहां कांग्रेस 1971 से संचालित होने का दावा करती है। नगर पालिका का आरोप है कि पिछले 55 वर्षों में केवल एक बार 320 रुपये किराया जमा हुआ, इसके बाद कोई वैध भुगतान या आवंटन अभिलेख नहीं मिला।कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सरकारी जमीन पर लंबे समय का कब्जा अपने आप में कानूनी अधिकार नहीं बन जाता, जब तक उसके समर्थन में वैध आवंटन आदेश या कानूनी दस्तावेज मौजूद न हों।
क्या है पूरा विवाद?
घंटाघर की ऐतिहासिक इमारत की पहली मंजिल पर स्थित कार्यालय नजूल भूखंड संख्या 244/1 पर बना है। नगर पालिका परिषद की प्रभारी अधिशासी अधिकारी सीमा सिंह ने कांग्रेस को कार्यालय खाली करने का नोटिस जारी किया था। कांग्रेस ने दावा किया कि तत्कालीन सरकार ने 1971–72 में कार्यालय आवंटित किया था और किराएदारी भी थी, लेकिन नगर पालिका ने कहा कि उसके रिकॉर्ड में ऐसा कोई आवंटन उपलब्ध नहीं है।
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने कहा कि:- “सरकारी संपत्ति पर दशकों पुराना कब्जा भी तब तक वैध नहीं माना जा सकता, जब तक उसके समर्थन में कानूनी आवंटन का प्रमाण प्रस्तुत न किया जाए।”पीठ ने अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए राज्य सरकार और नगर पालिका से तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा मांगा है।
भाजपा और योगी सरकार की प्रतिक्रिया
भाजपा नेताओं ने इसे “कानून के राज की जीत” बताया। उनका कहना है कि योगी सरकार की नीति स्पष्ट है कि सरकारी जमीन पर चाहे कोई भी संगठन या व्यक्ति हो, अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस ने दशकों तक सरकारी संपत्ति का लाभ उठाया और अब दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पा रही है।
कांग्रेस का पक्ष
कांग्रेस का कहना है कि यह कार्यालय ऐतिहासिक रूप से पार्टी को उपलब्ध कराया गया था और पुराने अभिलेख समय के साथ गायब हो गए। पार्टी नेताओं का आरोप है कि नगर पालिका राजनीतिक दबाव में कार्रवाई कर रही है और अंतिम सुनवाई में वे अपने दावों को सिद्ध करेंगे।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने प्रशासनिक कार्रवाई के समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि वास्तव में रिकॉर्ड विवादित है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए, लेकिन राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका भी दूर की जानी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह मामला केवल किराए का नहीं, बल्कि दस्तावेज बनाम परंपरागत कब्जे की बहस बन गया है। यदि अदालत अंतिम निर्णय में नगर पालिका के पक्ष को सही ठहराती है तो उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि पर वर्षों से संचालित अनेक राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं की स्थिति भी जांच के दायरे में आ सकती है।
शिक्षाविद और समाजसेवियों की राय
शिक्षाविदों का मानना है कि सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। वहीं समाजसेवी संगठनों का कहना है कि यदि किसी संस्था ने लंबे समय तक सार्वजनिक भवन का उपयोग किया है तो उसके रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और वैधानिक सत्यापन आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न हों।
स्थानीय प्रशासन का रुख
नगर पालिका परिषद का कहना है कि उपलब्ध अभिलेखों में 6 फरवरी 1971 की 320 रुपये की रसीद के अलावा कोई नियमित किराया जमा होने का प्रमाण नहीं मिला। इसलिए नियमानुसार बेदखली की कार्रवाई की गई।
स्थानीय नागरिक क्या कहते हैं?
घंटाघर क्षेत्र के कई नागरिकों का मानना है कि ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण और सरकारी संपत्तियों का वैध उपयोग सुनिश्चित होना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि दशकों पुराने मामलों का समाधान राजनीतिक विवाद से अधिक कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए।
आगे क्या होगा?
फिलहाल हाई कोर्ट ने बेदखली पर रोक नहीं दी है। अब राज्य सरकार और नगर पालिका अपना जवाब दाखिल करेंगे, जिसके बाद मामले की नियमित सुनवाई होगी।
अंतिम फैसला यह तय करेगा कि कांग्रेस का दशकों पुराना कार्यालय कानूनी अधिकार था या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा।
