बी के झा
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नई दिल्ली/श्रीनगर , 19 अगस्त
जम्मू-कश्मीर में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का दौरा केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों और कश्मीर पर वैश्विक संदेश का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया। धारा 370 हटने के बाद पहली बार किसी अमेरिकी राजदूत की इस स्तर की यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “अपने देश की शिकायत किसी विदेशी राजदूत के सामने करना मेरी आदत नहीं है। हमारी समस्याओं का समाधान वाशिंगटन नहीं, नई दिल्ली करेगी।”उनके इस रुख की पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सराहना करते हुए इसे “बेहद समझदारी भरा और परिपक्व” बयान बताया।
उमर का संदेश: विकास पर बात, विवाद पर नहीं
सर्जियो गोर से मुलाकात के बाद उमर अब्दुल्ला ने कहा कि बातचीत का केंद्र विकास, निवेश, शिक्षा, पर्यटन और दोनों देशों के सहयोग की संभावनाएं रहीं। उन्होंने दोहराया कि राज्य का दर्जा बहाल करने सहित राजनीतिक मुद्दे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
अमेरिकी राजदूत का बड़ा बयान
मुलाकात के बाद सर्जियो गोर ने कहा:—
“जम्मू-कश्मीर भारत का अहम अंग है और अमेरिका भारत के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।”उन्होंने अपनी पहली आधिकारिक कश्मीर यात्रा को सकारात्मक बताया और कहा कि दोनों पक्षों के बीच रचनात्मक संवाद हुआ।
पूर्व राजनयिकों की राय
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में यह दौरा राजनीतिक रूप से संवेदनशील था, इसलिए उमर अब्दुल्ला का संयमित रवैया भारत के हित में है। उनके अनुसार किसी विदेशी राजदूत के सामने आंतरिक विवाद उठाने से बचना परिपक्व लोकतांत्रिक दृष्टिकोण है।
रक्षा विशेषज्ञ: रणनीतिक संकेत स्पष्ट
रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डी.एस. हुड्डा का मानना है कि अमेरिकी राजदूत का “कश्मीर भारत का अंग” कहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण संदेश है। हालांकि उन्होंने कहा कि भारत की संप्रभुता पर अंतिम निर्णय भारत का ही विषय है और सुरक्षा नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हितों से संचालित होगी।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय द्विवेदी कहते हैं कि उमर अब्दुल्ला ने एक साथ दो संदेश दिए—केंद्र से राजनीतिक असहमति बरकरार है, लेकिन उसका समाधान विदेशी हस्तक्षेप से नहीं बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर होगा।
कानूनविद और शिक्षाविद की प्रतिक्रिया
संवैधानिक विशेषज्ञ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि जम्मू-कश्मीर का संवैधानिक भविष्य संसद और न्यायिक प्रक्रिया से तय होगा, किसी विदेशी शक्ति से नहीं।शिक्षाविद डॉ. नीलिमा कौल के अनुसार अंतरराष्ट्रीय सहयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन तक सीमित रहे तो घाटी के युवाओं के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।
स्थानीय नागरिकों और समाजसेवी संस्थाओं की उम्मीद
श्रीनगर के व्यापारिक संगठनों और समाजसेवी संस्थाओं ने उम्मीद जताई कि अमेरिकी निवेश, पर्यटन और शैक्षणिक सहयोग बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा। वहीं कई नागरिकों ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराई।
भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का दृष्टिकोण
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत की नीति स्पष्ट है—जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक और अभिन्न हिस्सा है। विदेश मंत्रालय लगातार यही रुख दोहराता रहा है कि किसी भी द्विपक्षीय या अंतरराष्ट्रीय संवाद में भारत की संप्रभुता सर्वोपरि रहेगी।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत करने तथा राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में केंद्र को शीघ्र निर्णय लेना चाहिए। उनका तर्क है कि राजनीतिक स्थिरता ही दीर्घकालिक शांति का आधार बनेगी।
निष्कर्ष
सर्जियो गोर की यात्रा ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश दिया—अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताया, जबकि उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर के राजनीतिक प्रश्नों का समाधान नई दिल्ली और भारतीय संविधान के दायरे में ही खोजा जाएगा।
यही इस दौरे का सबसे बड़ा राजनीतिक और राजनयिक निष्कर्ष माना जा रहा है।
