बी के झा
शिमला , 22 अगस्त
हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र शनिवार को एक बार फिर राष्ट्रगान और वंदे मातरम् के सम्मान के मुद्दे पर तीखे राजनीतिक टकराव का गवाह बना। सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही विधानसभा परिसर नारेबाजी से गूंज उठा और यह गतिरोध सदन के भीतर भी जारी रहा। बढ़ते हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष को कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी।
विधानसभा परिसर से सदन तक गरमाया माहौल
कांग्रेस विधायक हाथों में तख्तियां लेकर विधानसभा पहुंचे और नारे लगाए कि “राष्ट्रगान का अपमान हिंदुस्तान नहीं सहेगा।” विपक्ष ने संकेत दिए कि वह इस मुद्दे को पूरे सत्र में प्रमुखता से उठाएगा। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रभावना के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया, जिससे दोनों दलों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
राजनीतिक विश्लेषण: राष्ट्रवाद बनाम राजनीतिक नैरेटिव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमाचल का यह विवाद केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ समय से वंदे मातरम् और राष्ट्रगान जैसे राष्ट्रीय प्रतीक विभिन्न राज्यों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बने हुए हैं। ऐसे मुद्दे चुनावी राजनीति में भावनात्मक प्रभाव डालते हैं, इसलिए सत्ता और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से जनता के सामने रखने की कोशिश करते हैं।विश्लेषकों के अनुसार, जब राष्ट्रीय प्रतीकों पर बहस सदन की कार्यवाही को बाधित करने लगे, तब लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
कानूनविदों की राय
संवैधानिक कानून के जानकारों का कहना है कि राष्ट्रगान और वंदे मातरम् दोनों का सम्मान भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इनके संदर्भ में किसी भी विवाद का समाधान संवैधानिक मर्यादा और संसदीय प्रक्रिया के भीतर होना चाहिए। उनका मत है कि विधानसभा का मंच राजनीतिक मतभेद व्यक्त करने का स्थान है, किंतु राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रश्न पर सभी दलों को संयम बरतना चाहिए।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
शिक्षाविदों ने कहा कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में राष्ट्रगान तथा वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और संवैधानिक महत्व की संतुलित शिक्षा दी जानी चाहिए। उनके अनुसार युवाओं में राष्ट्रप्रेम का निर्माण टकराव से नहीं, बल्कि जागरूकता और संवाद से होता है।
समाजसेवी संस्थाओं और आम नागरिकों की प्रतिक्रिया
कई समाजसेवी संगठनों ने अपील की कि राष्ट्रीय सम्मान के विषय को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम न बनाया जाए। स्थानीय नागरिकों का भी मानना है कि जनता महंगाई, रोजगार और विकास जैसे मुद्दों पर सार्थक बहस चाहती है, इसलिए सदन का समय हंगामे के बजाय जनहित के कार्यों में लगना चाहिए।
हिंदू संगठनों और धर्माचार्यों का मत
विभिन्न हिंदू संगठनों ने कहा कि वंदे मातरम् करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक आस्था और राष्ट्रभावना का प्रतीक है तथा इसका सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। कई धर्माचार्यों ने भी सभी दलों से आग्रह किया कि राष्ट्रीय प्रतीकों को दलगत राजनीति से ऊपर रखकर सामाजिक एकता को मजबूत किया जाए।
भाजपा और कांग्रेस के आरोप-प्रत्यारोप
कांग्रेस का आरोप है कि राष्ट्रगान और वंदे मातरम् के सम्मान के प्रश्न को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और सदन में इस पर स्पष्ट जवाब दिया जाए।भाजपा का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील विषय का राजनीतिकरण कर रही है तथा सदन की कार्यवाही बाधित करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है।
आगे क्या?
अब निगाहें विधानसभा की अगली कार्यवाही पर हैं। यदि सत्ता और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बनती, तो मानसून सत्र का बड़ा हिस्सा इसी गतिरोध की भेंट चढ़ सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह विवाद हिमाचल की राजनीति में राष्ट्रवाद और संसदीय मर्यादा—दोनों की नई परीक्षा बन गया है।
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