अमेरिकी आयोग का आरोप, भारत का करारा जवाब: RSS पर टिप्पणी को MEA ने बताया पक्षपाती एजेंडा

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 22 अगस्त

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की विवादास्पद टिप्पणियों पर भारत ने कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय ने आयोग को “पक्षपाती और एजेंडा-प्रेरित” बताते हुए उसकी टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि ऐसे संगठनों की विश्वसनीयता नहीं है, इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से लेने का कोई कारण नहीं है।यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब RSS प्रमुख मोहन भागवत की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं।

विदेश मंत्रालय का स्पष्ट संदेशविदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने द्वि-साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि USCIRF लंबे समय से भारत के बारे में अपमानजनक और उकसावे वाली टिप्पणियां करता रहा है।

“यह एक पक्षपाती संगठन है। इसका अपना एजेंडा है और इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है।”भारत ने संकेत दिया कि किसी बाहरी संस्था को देश के सामाजिक और धार्मिक ढांचे पर एकतरफा टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।### USCIRF ने क्या कहा था?

USCIRF के आयुक्त जीन मिल्स ने आरोप लगाया कि अमेरिका को RSS नेताओं को उच्च स्तरीय कूटनीतिक सम्मान नहीं देना चाहिए और संगठन से जुड़े लोगों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए।वहीं आयोग के प्रमुख आसिफ महमूद ने भी भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों को लेकर RSS पर आरोप लगाए। भारत ने इन आरोपों को बेबुनियाद और तथ्यहीन करार दिया है।

राजनीतिक विश्लेषण: कूटनीति बनाम वैचारिक दबाव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों में वैचारिक दबाव की राजनीति का भी हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में USCIRF ने भारत पर कई आलोचनात्मक रिपोर्ट जारी की हैं, जबकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि आयोग भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की वास्तविकता को नजरअंदाज करता है।

विश्लेषकों के अनुसार, किसी विदेशी आयोग की सिफारिश अपने आप में अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति नहीं होती, लेकिन ऐसी टिप्पणियां द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक विवाद पैदा कर सकती हैं।

कानूनविदों की राय

संवैधानिक कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और किसी भी संगठन के विरुद्ध कार्रवाई भारतीय कानून के आधार पर ही हो सकती है, न कि किसी विदेशी आयोग की अनुशंसा पर। उनका मत है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों का मूल्यांकन तथ्यों और निष्पक्षता के आधार पर होना चाहिए।

शिक्षाविदों और समाजसेवी संस्थाओं की प्रतिक्रिया

कई शिक्षाविदों ने कहा कि लोकतांत्रिक देशों के बीच मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता पर संवाद आवश्यक है, लेकिन वह पूर्वाग्रह और राजनीतिक एजेंडे से मुक्त होना चाहिए।

समाजसेवी संस्थाओं का मानना है कि भारत जैसे बहुधार्मिक समाज की जटिलताओं को समझे बिना दिए गए व्यापक आरोप सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने दोहरी प्रतिक्रिया दी है। कुछ नेताओं ने कहा कि भारत की संप्रभु संस्थाओं पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता, जबकि अन्य विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि देश के भीतर धार्मिक सद्भाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर संवाद जारी रहना चाहिए।

हालांकि, USCIRF की सिफारिशों को लेकर विपक्ष की ओर से कोई सर्वसम्मत आधिकारिक रुख सामने नहीं आया है।

समुद्री सुरक्षा पर भी भारत की चिंता

विदेश मंत्रालय ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य, यमन और सोमालिया के समुद्री क्षेत्रों में भारतीय नाविकों की सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत क्षेत्रीय तनाव का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से चाहता है।

निष्कर्ष

USCIRF और भारत के बीच यह टकराव एक बार फिर दिखाता है कि वैश्विक मंच पर मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे मुद्दे केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे कूटनीतिक और राजनीतिक महत्व भी रखते हैं।

फिलहाल भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह विदेशी आयोगों की पक्षपातपूर्ण टिप्पणियों के बजाय अपने संवैधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा करता है।

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