बी के झा
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अलवर ( राजस्थान), 23 अगस्त
राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र में एक सरकारी विद्यालय के प्रिंसिपल का कथित आपत्तिजनक वीडियो सामने आने के बाद पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया है। वायरल वीडियो में प्रिंसिपल 9वीं से 12वीं कक्षा की छात्राओं के साथ बांध के पानी में दिखाई दे रहा है। आरोप है कि उसने छात्राओं को गोद में उठाया और बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के उन्हें तैराकी के बहाने बांध में उतारा।
महत्वपूर्ण: वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, लेकिन उसकी प्रामाणिकता और उसमें दिखाई दे रहे घटनाक्रम की पुष्टि अभी पुलिस और शिक्षा विभाग की जांच के बाद ही होगी।
क्या है पूरा मामला?
ग्रामीणों के अनुसार घटना 15 अगस्त की है। स्वतंत्रता दिवस समारोह समाप्त होने के बाद प्रिंसिपल स्कूल के छात्र-छात्राओं को लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित भड़ाज बांध ले गया। वहां 20–25 छात्राएं भी मौजूद थीं।आरोप है कि भ्रमण और तैराकी सिखाने के नाम पर बच्चों को पानी में उतारा गया, जबकि कई छात्राओं को तैरना नहीं आता था और किसी को लाइफ जैकेट उपलब्ध नहीं कराई गई। इसी दौरान आसपास मौजूद युवकों ने वीडियो रिकॉर्ड कर लिया, जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
सुरक्षा नियमों पर गंभीर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि जिस बांध पर बच्चों को ले जाया गया, वहां पहले भी डूबने की घटनाएं हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कई वर्षों से इस स्थान पर जाने पर प्रशासनिक प्रतिबंध भी रहा है। ऐसे में स्कूली बच्चों को वहां ले जाना स्वयं एक गंभीर प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्न बन गया है।
पुलिस और शिक्षा विभाग की कार्रवाई
थानागाजी थाना पुलिस ने बताया कि अभी तक किसी छात्रा या अभिभावक की ओर से औपचारिक लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन वायरल वीडियो के आधार पर जांच शुरू कर दी गई है। प्रिंसिपल के बयान भी दर्ज किए गए हैं।उधर, शिक्षा विभाग ने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। जिला शिक्षा अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
कानून क्या कहता है?
कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि नाबालिग छात्राओं की गरिमा, सुरक्षा या शारीरिक मर्यादा का उल्लंघन हुआ है, तो मामला केवल विभागीय अनुशासन तक सीमित नहीं रहेगा।संभावित कानूनी पहलुओं में शामिल हो सकते हैं:
POCSO अधिनियम के प्रावधान (यदि यौन आशय या अनुचित स्पर्श सिद्ध हो)
भारतीय न्याय संहिता के तहत नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े अपराध
शिक्षा विभाग की सेवा आचार संहिता का उल्लंघन
विद्यार्थियों की सुरक्षा संबंधी सरकारी दिशानिर्देशों की अवहेलना
अंतिम धाराएं जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होंगी।
शिक्षाविदों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षक और छात्र के बीच विश्वास का संबंध अत्यंत संवेदनशील होता है। किसी भी शैक्षणिक भ्रमण या खेल गतिविधि में स्पष्ट अनुमति, महिला स्टाफ की उपस्थिति, सुरक्षा उपकरण और लिखित अभिभावक सहमति अनिवार्य मानी जाती है।उनका कहना है कि विद्यालय परिसर से बाहर नाबालिग छात्राओं की गतिविधियों के लिए स्थापित सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन न होना स्वयं गंभीर प्रशासनिक लापरवाही हो सकती है।
समाजसेवी संस्थाओं की मांग
बाल अधिकार और महिला सुरक्षा से जुड़े सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि:
पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक या उच्च स्तरीय जांच हो।
छात्राओं की पहचान और गोपनीयता पूरी तरह सुरक्षित रखी जाए।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
भविष्य में सभी सरकारी विद्यालयों के लिए सुरक्षित शैक्षणिक भ्रमण नीति लागू की जाए।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है।विपक्ष ने राज्य सरकार से पूछा है कि यदि बांध प्रतिबंधित क्षेत्र था तो बच्चों को वहां जाने की अनुमति कैसे मिली। विपक्ष ने शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय करने और दोषियों पर तत्काल निलंबन की मांग की है।
वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया है और बिना जांच पूरी हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। सरकार का दावा है कि दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा।
स्थानीय नागरिकों में रोष
ग्रामीणों ने स्कूल पहुंचकर विरोध जताया और प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग की। अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने बच्चों को शिक्षा के लिए विद्यालय भेजा है, जोखिम भरी गतिविधियों के लिए नहीं। स्थानीय लोगों ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु स्पष्ट जवाबदेही तय करने की मांग उठाई है।
निष्कर्ष
अलवर का यह मामला केवल एक वायरल वीडियो का विवाद नहीं, बल्कि विद्यालयों में बाल सुरक्षा, शिक्षक की नैतिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही की गंभीर परीक्षा बन गया है।
अब सबकी नजर पुलिस और शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट पर है, जो तय करेगी कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और किस स्तर पर कार्रवाई होगी।
