बी के झा
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सिलीगुड़ी/दार्जिलिंग, 23 अगस्त
भारत के सबसे संवेदनशील सामरिक गलियारों में शामिल सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को ऐसा संदेश दिया, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति, दार्जिलिंग की पहाड़ियों और पूर्वोत्तर की सुरक्षा—तीनों को एक साथ केंद्र में ला दिया। शाह ने सीमा सुरक्षा की उच्चस्तरीय समीक्षा करने के साथ-साथ गोरखा समुदाय की दशकों पुरानी राजनीतिक आकांक्षाओं के समाधान के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की।यह समिति भारतीय संविधान के दायरे में दार्जिलिंग पहाड़ियों के लिए स्थायी राजनीतिक समाधान का मसौदा तैयार करेगी।
क्या हुआ सुकना की अहम बैठक में?
सुकना स्थित बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में गोरखा संगठनों, राज्य सरकार और केंद्र के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में यह सहमति बनी कि वर्षों से लंबित गोरखा पहचान और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रश्न पर संवाद के माध्यम से अंतिम समाधान खोजा जाएगा।बैठक में प्रमुख रूप से मौजूद रहे:
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी
दार्जिलिंग सांसद राजू बिस्टा
जीजेएम प्रमुख बिमल गुरुंग
वरिष्ठ गोरखा नेता रोशन गिरि
जीएनएलएफ प्रमुख मान घिसिंग
पंकज कुमार सिंह के हाथ में कमान
समिति का नेतृत्व सेवानिवृत्त आईपीएस एवं पूर्व बीएसएफ महानिदेशक पंकज कुमार सिंह करेंगे, जो पहले उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रह चुके हैं। उनकी जिम्मेदारी विभिन्न पक्षों के बीच राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाना और अंतिम समझौते का प्रारूप तैयार करना होगी।
आखिर क्या है गोरखालैंड विवाद?
दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाला नेपाली भाषी गोरखा समुदाय 1980 के दशक से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग करता रहा है। उनका तर्क है कि उनकी भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला।समय-समय पर बने दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल और बाद में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) ने आंशिक समाधान दिया, लेकिन अलग राज्य की मांग पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
भाजपा का दावा, विपक्ष पर निशाना
दार्जिलिंग सांसद राजू बिस्टा ने कहा कि पहाड़ी समुदायों का संघर्ष चार दशक पुराना है और पूर्ववर्ती वाम तथा तृणमूल सरकारें उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहीं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार संवैधानिक ढांचे के भीतर सम्मानजनक समाधान के लिए प्रतिबद्ध है।
चिकन नेक: जहां सुरक्षा और राजनीति मिलती है
सिलीगुड़ी कॉरिडोर मात्र लगभग 20–22 किलोमीटर चौड़ा भूभाग है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के शेष हिस्से से जोड़ता है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन के निकट स्थित होने के कारण यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और तस्करी यहां लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रमुख विषय रहे हैं।
जमीनी आवाज: सेवानिवृत्त शिक्षक और स्थानीय पत्रकार की चेतावनी
नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ शिक्षक और एक स्थानीय पत्रकार ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा:–
“गृहमंत्री के इस कदम से सीमा तो सुरक्षित होगी ही, साथ ही अवैध घुसपैठ और अवैध तस्करी भी लगभग खत्म हो जाएगी।
”उन्होंने आगे कहा:–“हाँ, गृहमंत्री के इस कदम से कुछ अवैध ढंग से सीमा पार से व्यापार करने वालों के लिए संकट तो जरूर खड़ा होने वाला है। इसलिए स्थानीय प्रशासन को हमेशा इसके लिए सजग और सतर्क रहना होगा।”
दोनों ने सुरक्षा के साथ सामाजिक सौहार्द को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताते हुए आगाह किया:– “विक्षुब्ध मानसिकता के कुछ लोग कट्टरपंथी तत्वों के साथ मिलकर सीमावर्ती क्षेत्रों में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों को कुछ राजनीतिक दलों का समर्थन भी मिलता रहता है, जिन्हें समाज में शांति नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में फायदा दिखाई देता है।”
राजनीतिक विश्लेषण
विश्लेषकों के अनुसार अमित शाह का यह दौरा केवल गोरखा आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है—
पहला, दार्जिलिंग में लंबे समय से लंबित राजनीतिक संवाद को पुनर्जीवित करना;
दूसरा, चिकन नेक की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करना; और तीसरा, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण का संदेश देना।
यदि समिति समयबद्ध ढंग से सभी पक्षों को साथ लेकर अंतिम मसौदा तैयार करती है, तो यह दार्जिलिंग की राजनीति में वर्षों बाद सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पहल साबित हो सकती है।
