बी के झा
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नई दिल्ली, 23 अगस्त
त्योहारों के मौसम से पहले देश में चीनी की बढ़ती कीमतें अब केवल महंगाई का मुद्दा नहीं रहीं, बल्कि केंद्र सरकार की एथेनॉल नीति पर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गई हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने मोदी सरकार के 12 वर्षों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “इन 12 सालों में अगर कुछ सस्ता हुआ है तो वह मौत, हादसे और आत्महत्याएं हैं।” उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
क्या है पूरा विवाद?
पिछले कुछ समय में कई राज्यों में चीनी के खुदरा दाम बढ़े हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की एथेनॉल मिश्रण नीति के कारण गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल बनाने में जा रहा है, जिससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि कीमतों में उतार-चढ़ाव के पीछे कई वैश्विक और मौसमी कारण हैं तथा एथेनॉल कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
संजय राउत का तीखा हमला
मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राउत ने कहा कि सरकार के मंत्री यदि वास्तविक स्थिति जानना चाहते हैं तो उन्हें विश्वविद्यालयों के बजाय आम परिवारों की रसोई में जाना चाहिए।
“युवाओं के घर जाइए, उनकी माताओं से पूछिए कि महंगाई ने रसोई का बजट कैसे बिगाड़ दिया है।”राउत ने आरोप लगाया कि आम जनता महंगाई से परेशान है जबकि सरकार उपलब्धियों का प्रचार कर रही है।
अशोक गहलोत ने उठाए तीन बड़े सवाल
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा कि बिना पर्याप्त तैयारी के एथेनॉल नीति लागू करने का खामियाजा जनता भुगत रही है।
उन्होंने तीन प्रमुख आरोप लगाए:—
गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल में जाने से चीनी महंगी हुई।
एथेनॉल मिश्रण से कुछ वाहनों के इंजन और माइलेज पर असर पड़ने की शिकायतें मिल रही हैं।
नीति का लाभ उद्योगों को, जबकि बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।उन्होंने कहा कि यह केवल महंगाई नहीं बल्कि आम आदमी की आय पर सीधा दबाव है।
भाजपा का पलटवार
भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को “भ्रामक राजनीति” बताया। पार्टी का कहना है कि एथेनॉल कार्यक्रम से किसानों को समय पर भुगतान मिला है, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटी है और पर्यावरणीय लाभ भी मिले हैं।भाजपा का तर्क है कि चीनी उत्पादन, बफर स्टॉक और निर्यात नीति के माध्यम से सरकार कीमतों को संतुलित रखने के लिए लगातार कदम उठा रही है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में चुनावी माहौल के बीच महंगाई विपक्ष के लिए सबसे प्रभावी राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार चीनी की कीमत केवल एथेनॉल से तय नहीं होती; इसमें मानसून, गन्ना उत्पादन, सरकारी स्टॉक नीति, निर्यात और मांग जैसे अनेक कारक शामिल होते हैं।
कानूनविदों का कहना है कि यदि किसी नीति के कारण आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है तो सरकार की पारदर्शिता और नियमित सार्वजनिक समीक्षा लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा होनी चाहिए।
उपभोक्ता अधिकार संगठनों ने मांग की है कि त्योहारों से पहले सरकार चीनी की उपलब्धता और मूल्य नियंत्रण पर स्पष्ट रोडमैप जारी करे ताकि कृत्रिम महंगाई और जमाखोरी पर रोक लगाई जा सके।
एथेनॉल पर दो ध्रुवों में बंटी बहस
| विपक्ष का दावा:———————सरकार का पक्ष:— गन्ना एथेनॉल में जाने से चीनी महंगी–
किसानों की आय बढ़ाने वाली नीति
रसोई का बजट प्रभावित—- ऊर्जा आयात में कमी उद्योगपतियों को लाभ—— हरित ईंधन को बढ़ावा कीमतों में तेज उछाल—— कई आर्थिक कारक जिम्मेदार
राजनीतिक महत्व
त्योहारों के समय चीनी, मिठाई और रसोई से जुड़े मुद्दे सीधे आम परिवारों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में महंगाई बनाम विकास की बहस एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। विपक्ष इसे जनता की जेब का सवाल बता रहा है, जबकि केंद्र सरकार एथेनॉल नीति को दीर्घकालिक आर्थिक और ऊर्जा सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
निष्कर्ष:
यह विवाद केवल चीनी की कीमत का नहीं, बल्कि कृषि, ऊर्जा, उपभोक्ता हित और चुनावी राजनीति के टकराव का प्रतीक बन चुका है।
आने वाले दिनों में सरकार के मूल्य नियंत्रण संबंधी कदम और विपक्ष की आक्रामकता—दोनों इस बहस की दिशा तय करेंगे।
